भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरपूर होनेपर भी सर्वस्वनाश होनेकी ही प्रतीति होती है। किसी भिक्षुकीके सौन्दर्यपर मुग्ध होकर किसी सम्राट्ने उसे साम्राज्ञी होनेको कहा; किंतु भिक्षुकी यह समझकर कि हमारी भिक्षा माँगनेकी सामग्री और भिक्षाका आनन्द चला जायगा, साम्राज्ञी बननेसे डर गयी। कारण कि साम्राज्ञीके सुखकी कल्पना कभी उसकी दृष्टिमें हुई ही नहीं, उसे तो भिक्षा और उसके ही आनन्दका सर्वदा संस्कार रहा। ठीक इसी तरह जिन्हें कभी अखण्डानन्दमय, निर्विकार दृक्के अनन्त सौख्यकी अनुभूति हुई ही नहीं, केवल कटु दृश्यके ही अक्षुण्ण संस्कार प्राप्त हो रहे हैं, उनको दृश्य ही सरस प्रतीत होता है। परमात्मस्वरूप उन्हें उद्वेजक प्रतीत होता है। जैसे सेंधा नमकका ढेला पानीमें मिल जानेसे नष्ट हुआ कहा जाता है, वास्तवमें उपाधिके साथ संसर्ग मिटनेसे केवल उसका औपाधिक रूप ही मिटता है, वैसे ही पंचकोशादि उपाधि मिटनेसे चेतनमें तत्कृत अवच्छेद ही मिटता है, आत्मतत्त्व शुद्ध निर्विकार भानरूपमें तो विद्यमान ही रहता है। जैसे नीमके कीड़ेको नीममें ही स्वाद आता है और मिसरी या चीनीमें उसे उद्वेग होता है, वैसे ही दृश्य-रागीको अत्यन्त कटु दृश्यमें ही प्रीति होती है। सर्व दृश्य- रूप उपद्रवसे रहित, परमानन्दघन भगवान्से उसे घबराहट होती है। जैसे पुत्र कलत्रादि कुटुम्बके अनुरागी विषयी प्राणियोंको स्वर्ग या वैकुण्ठ भी रुचिकर प्रतीत नहीं होता, वैसे ही सप्रपंच सुखके रागियोंको निरावरण अद्वैतानन्दमें रुचि नहीं होती। इसीलिये वे अद्वैत, अखण्ड, अनन्त, ब्रह्मानन्दरूप मुक्तिसे घबराते हैं। किसी-किसीका तो यहाँतक कथन है कि चाहे वृन्दावनमें शृगाल भले ही हो जायें, परंतु अद्वैतियोंका निर्विशेष मोक्ष हमें नहीं चाहिये। ठीक ही है, विषयीका तो सर्वस्व विषय ही है। अतः जहाँ विषयका अत्यन्त अभाव हो, ऐसे ब्रह्म या मोक्षसे उसका क्या सम्बन्ध ? जिस मोक्षमें नृत्य, वादित्र, गीत और सरस रूप एवं मधुररसकी अनुभूति नहीं, ऐसे नीरस, निर्विषय मोक्षमें उन्हें शुष्क पाषाण-बुद्धि क्यों न हो? वस्तुतः यह उनके संस्कारोंका ही दोष है। सप्रपंच, सातिशय, क्षुद्र साधन-परतन्त्र सुखका ही उन्हें अनुभव है। उन्हींमें उन्हें संस्कार या राग है तो फिर तद्विलक्षण, निष्प्रपंच, निरतिशय, अनन्त, स्वतन्त्र, आनन्दाम्बुधिकी कल्पना भी उनके मनमें कैसे हो? ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता अति स्वल्प भी विवेचन करनेपर विवेकियोंको निरायास, निष्प्रपंच, अपरिच्छिन्न आनन्दकी महत्ताका ज्ञान हो जाता है। जब किसी रसिकको अत्यन्त अभिलषित रसमय पदार्थ एवं रसमयी कान्ताकी प्राप्ति होती है, तब किंचित् काल उसे अत्यन्त हर्ष होता है। परंतु अन्तमें उसे छोड़कर वही पुरुष सोनेके लिये प्रवृत्त होता है। क्यों? यह क्या बात है? जिस प्रियतमा कान्ताके मिलनके लिये पहले उसे इतनी व्यग्रता, इतनी व्याकुलता थी, आज उसी प्रेयसीके सम्मिलनमें केवल उसीमें उसकी तल्लीनता होनी चाहिये, पर अब वह निद्राको बुलाता है। मनुष्यकी तो कौन कहे, ब्रह्मा और विष्णुकी भी जिनके सन्निधानमें दिव्यातिदिव्य रमण-सामग्रियाँ विद्यमान हैं, द्वैत प्रपंचमें जितनी भी उच्च-से-उच्च कोटिकी सौख्य-सामग्रियाँ हैं, वे सभी वहाँ विद्यमान हैं, फिर भी उन अद्भुत सप्रपंच सौख्योंको छोड़कर सुषुप्तिमें क्यों प्रवृत्ति होती है? इसीलिये कि वहाँ निष्प्रपंच, अद्वैत सुखकी अनुभूति होती है, जिनकी एक छायामात्र ही सातिशय प्रपंच सुखमें परिलक्षित होती है। किं बहुना भगवद्भावापन्न, अत्यन्त उच्च कोटिके अनुरागी, जिन्हें अपने प्रियतम प्राणधनके वियोगमें मरणसे भी अनन्त कोटि गुणित संताप होता है; जिनके क्षणमात्रके प्रियतम-वियोगजन्य तीव्र तापको निरीक्षण करके अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त पाप यह सोचकर संतापसे दुर्बल हो जाते हैं कि हम सभी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त प्राणियोंके