भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 734, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें७२४ भक्तिसुधा अभय भगवान्में अज्ञोंको भय होता है। देखा जाता है कि प्राणियोंको स्थूल पदार्थोंका ही आधिक्येन भान होता है, इसीलिये नील, पीत, हरित रूपोंकी जैसी स्फुट प्रतीति होती है; वैसी अनेक रूपोंका प्रकाश करनेवाली प्रभाकी स्फुटता नहीं होती। प्रभाका प्रकाश करनेवाले नेत्रालोकका विज्ञान उससे भी अधिक दुर्लभ है। कोई ही यह समझता है कि जैसे प्रभाके न होनेपर रूपका प्रकाश नहीं हुआ और प्रभाके होनेपर रूपका प्रकाश हुआ, अतः प्रभा रूपसे पृथक् है, वैसे ही नेत्र-निमीलन-कालमें प्रभाका भी भान नहीं था और नेत्रोन्मीलन-कालमें प्रभाकी प्रतीति हुई, अतः नेत्रके उन्मीलन-कालमें एक अति सूक्ष्म नेत्रालोक ही प्रभापर व्याप्त होकर प्रभाका प्रकाशन करता है। अस्तु, इसके उपरान्त भी नेत्रालोककी मन्दता और पटुताका प्रकाश करनेवाला मानसालोक (मानस-प्रकाश) नेत्रालोकसे पृथक् ही है, जिससे कि मेरी नेत्र-ज्योति मन्द है या तीव्र है, यह जाना जाता है। मनुष्य मनके काम, संकल्प, संशय आदि अनेक विकारोंको जानकर निश्चयात्मिका बुद्धिसे निश्चय करता है कि मैं स्थिर बुद्धिसे मन और उसके विकारोंको निरुद्ध करूँगा। यहाँ स्पष्टतया तीनों अंशोंकी प्रतीति होती है—जिसका निरोध या नाश करेंगे, वह मन और उसके संशयादि विकार, जिससे निरोध करेंगे, वह साधनरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि जिसके विषयमें उसकी बुद्धि मन्द या अत्यन्त सूक्ष्म है, इस तरहके अनुभव होते हैं और जो बुद्धिद्वारा मनका निरोध करनेवाला है, वह 'अहं' अर्थात् 'मैं'। इसी प्रकारसे 'अहं बुद्ध्या मनः संयच्छामि' (मैं बुद्धिसे मनका नियन्त्रण करूँगा) ऐसे अनुभवमें 'मैं', 'बुद्धि' और 'मन' इन तीनोंकी प्रतीति होती है। अतः ये सभी तो प्रतीतिके विषय हो गये, इनकी प्रतीति या भान इनसे अवश्य पृथक् है; क्योंकि एकमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकता। इसीलिये प्रकाश्यसे प्रकाशक भिन्न होता है, यह बात लोकमें प्रसिद्ध है। प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान 'स्वयंप्रकाश' कहा जाता है। मन, बुद्धि और 'मैं' का भासक, अकेला शुद्ध भान तो भास्य न होनेसे स्वयंप्रकाश है। अतः यह भान ही सर्वदा प्रकाशान्तर-निरपेक्ष भासमान होकर स्थिर है और तदतिरिक्त सभी भास्य अस्थिर हैं। इसीलिये जाग्रत् और स्वप्नमें 'अहं' और 'बुद्धि' एवं 'मन' यद्यपि उपलब्ध होते हैं, परंतु सुषुप्तिमें इन सबका अभाव हो जाता है। उस समय भी जाग्रत् और स्वप्नमें सकल दृश्यके भावका और सुषुप्तिमें समस्त व्यक्त दृश्यके अभावका प्रकाश करनेवाला एवं सर्व दृश्यके विलयनका आधारभूत, सुषुप्ति एवं गाढ़ निद्रा या अज्ञानका भासन करनेवाला, कूटस्थ भानरूप आत्मा ही विराजमान रहता है। इसीका संकेत भागवतमें इस तरह किया है— सन्ने यदीन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ (श्रीमद्भा० १२।३।३२) स्वयं श्रुतिने इस तथ्यका प्रकाश किया है— 'नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्य- यमहमस्मीति।' (छान्दोग्य० ८।११।१) इस प्रकार अखण्ड, अनन्त, परमसूक्ष्म वस्तुका बोध अत्यन्त दुर्लभ है। जिन स्थूल पदार्थोंका बोध प्राणियोंको है, उनके नाशमें सर्वनाश या आत्मनाशकी प्रतीति होनी युक्त ही है। इसीलिये श्रीगौडपादाचार्य भगवान् कहते हैं कि—'अस्पर्शयोगो वै नामैष दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः। योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः॥' (माण्डुक्य० ३९) सर्वस्पर्श, सर्वदृश्य- सम्बन्धसे रहित, भास्य-विवर्जित, परमसूक्ष्म, अखण्डानन्दरूप काल्पनिक सर्वभाव तथा अभावोंका भासक, कूटस्थ भानस्वरूप आत्मा तत्त्वज्ञसे भिन्न समस्त योगियोंके लिये दुर्दर्श है; क्योंकि दृश्य ही जिनका सर्वस्व है, दृश्यसे भिन्न स्वप्रकाश अखण्डानन्द द्रष्टापर जिनकी कभी दृष्टि गयी ही नहीं, उन्हें दृश्यके नाशसे परमानन्दसुधासिन्धुके सर्वतोभावेन