भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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मनकी चंचलतासे संतप्त होता है, तब उसके भी निग्रहका उपाय ढूँढता है और निश्चयात्मिका बुद्धि- द्वारा संकल्प-विकल्पात्मक मनका भी निग्रह करता है। जब प्राणीको मन आदि करणग्रामके निरोध या उसकी निर्व्यापारताका आनन्द अनुभव होने लगता है, तब तो वह दुःखात्मक दृश्यके प्रतीति-निरोधके लिये बुद्धिको भी निगृहीत करनेकी चेष्टा करने लगता है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इस रीतिसे क्रमशः आत्माके सन्निहित अतएव अन्तरंग बुद्ध्यादिके उद्वेग-निराकरण एवं अनुकूलता- सम्पादन करनेके लिये बहिरंग करणोंका निग्रह किया जाता है। शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता अध्यात्मशास्त्रोंमें मनोनाश वासनाक्षय प्रसिद्ध ही है। यहाँतक कि जो यह 'अहं' पदका वाच्यार्थ है, वह भी अन्तःकरणके अहंकारांशसे उपहित आत्माका औपाधिक रूप है। अतः वह भी असह्य होनेके कारण निर्ग्राह्य हो जाता है; क्योंकि 'अहं' पदका लक्ष्यार्थरूप जो निरुपाधिक शुद्ध स्वरूप है, वही मन, बुद्धि एवं अहमर्थ और उसके सुखित्व, दुःखित्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि सर्व दृश्यका भासक और मिथ्याभूत समस्त भास्यके बाधका साक्षी, वस्तुतः भास्यभासकातीत, सर्वोपप्लव-विवर्जित, त्रिकालाबाध्य, स्वप्रकाश परमानन्द चिदात्मा है। उसके स्वाभाविक अखण्डानन्दकी अभिव्यक्तिमें 'अहमर्थ' भी प्रतिबन्धक ही है। अभिप्राय यह है कि यद्यपि कुछ दार्शनिकोंके मतमें 'अहं' का वाच्यार्थ ही आत्मा है, जो कि 'अहं कर्ता', 'अहं भोक्ता' 'अहं सुखी', 'अहं दुःखी' इस रूपसे अनुभवमें आ रहा है, अतः उसका नाश आत्माका ही नाश है। मेरी देह, मेरी इन्द्रियाँ, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार—इस प्रकार जो ममताके आस्पद हैं, वे अनात्मा हैं और मेरी बुद्धि सुस्थिर है, मैं अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको निगृहीत करूँगा, इस प्रकार जो 'अहंता' का आस्पद 'अहमर्थ' है, वही शुद्ध आत्मा है। उससे परे जीवका अपना कोई स्वरूप नहीं है, अतः 'अहमर्थ' का नाश करना आत्माका ही नाश करना है। तथापि अभिज्ञ वेदान्तीका सिद्धान्त है कि 'अहं' का वाच्यार्थ आत्मा नहीं है, किंतु लक्ष्यार्थ ही आत्मा है अर्थात् जैसे अग्निके सम्बन्धसे अग्निकी दाहकता, प्रकाशकता आदि शक्तियोंसे युक्त होनेसे लौहपिण्डमें अग्निका भ्रममात्र होता है, शुद्ध निरुपाधिक अग्नि लौहपिण्डसे पृथक् है, वैसे ही आत्माके घनिष्ठ संसर्गसे अहमर्थ (मैं)-में प्रेमास्पदता और चेतनता अधिक प्रतीत होती है, अतएव उसमें आत्माकी भ्रान्तिमात्रता है। वस्तुतस्तु मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा सुख, मेरा दुःख, मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी या केवल मैं, ये सभी भास्य हैं, इनकी प्रतीति होती है, इनका सुस्पष्ट भान होता है। भास्यसे भासक या भान पृथक् ही है। जिस रीतिसे चार्वाक प्रभृतिको देहमें ही आत्मबुद्धि हुई; क्योंकि आत्माके ही पारम्परीण सम्बन्धसे देहमें भी किंचित् चेतनता, इष्टता या प्रेमास्पदता भासित होती है और उसीसे उन अत्यन्त अज्ञ, लौकिक, पामर एवं चार्वाकोंको देह-नाशमें ही आत्म-नाशकी बुद्धि हुई, उसी प्रकार 'अहमर्थनाश' में 'आत्मनाश' की बुद्धि इतर दार्शनिकोंको भी हुई। 'अहं श्यामो', 'अहं गौरः' मैं काला हूँ, मैं गौर हूँ, स्थूल हूँ, कृश हूँ—इस तरह स्थौल्यादि धर्मवान् देहमें जैसे अहमर्थके अभेदका अध्यास होता है, वैसे ही चिज्जडग्रन्थि अहमर्थमें चैतन्यान्दघन भगवान्का अभेदाध्यास होता है। इसी वास्ते सर्वस्पर्शविहीन ('स्पृश्यन्ते इति स्पर्शाः विषयाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार समस्त दृश्य ही स्पर्श हैं) अर्थात् सर्वदृश्यविहीन, परम सूक्ष्म, सर्वावभासक, स्वप्रकाश, चैतन्यान्दघन, परम