भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन वेदान्तरससार मंगलाचरण जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः। दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः॥ वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श वेदशास्त्रार्थपरिशीलन-संस्कृतमानस महानुभावोंसे यह तिरोहित नहीं है कि प्राणियोंके चतुर्वर्गकी अविकलरूपसे प्राप्तिका अति सुन्दर पथ वेदोंने प्रदर्शित किया है। विशेषतः धर्म और ब्रह्मके बोधमें तो एकमात्र वेद ही प्रमाणभूत है। अतएव 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (जैमिनीयसूत्र १।१।२) (प्रवर्तक और निवर्तक वैदिक वाक्योंसे लक्षित, अनर्थ श्येनादिसे व्यावर्तित, अग्निहोत्र-दर्श-पौर्णमासादि अर्थ ही धर्म है), 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (गीता १६।२३), 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते' (गीता १६।२४), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृहदारण्यक० ३।९।२६), 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) इत्यादि श्रौत-स्मार्त वचनोंसे धर्म और ब्रह्मको वेदादिशास्त्रैकसमधिगम्य माना गया है। वेद अनादि-अविच्छिन्नसम्प्रदाय परम्परासे प्राप्त हैं। कोई भी पुरुष स्वातन्त्र्येण उनका निर्माण करनेवाला नहीं है। परमात्मा भी पूर्वकल्पीयवेदानुपूर्वी सापेक्ष ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वीका निर्माण करते हैं। अतः प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भपुरःसर निर्मातृत्व- रूप कर्तृत्व उन परमात्मामें भी नहीं है। अतः अपौरुषेय वेदोंका ही सकल पुंदोषशंकाकलंक- पंकसे असंस्पृष्ट होनेके कारण सर्वानपेक्ष (सर्वथा निरपेक्ष) प्रामाण्य है। अतएव परमेश्वरनिर्मितत्व वेदोंके प्रामाण्यका प्रयोजक नहीं है, अपितु परमेश्वरके स्वरूपादिकी सिद्धि ही वेदोंके अधीन है। अन्यथा वैदिक जिन- जिन युक्तियोंसे वेदकारको परमेश्वर या तदवतार मानकर तन्निर्मितत्वेन वेदोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे, उन्हीं-उन्हीं युक्तियोंसे भिन्न-भिन्न मतवादी भी अपने धर्मग्रन्थ-रचयिताको परमेश्वर सिद्ध करके उससे निर्मित अपने धर्मग्रन्थोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे। अस्तु, इन सब बातोंके कथनका आशय यही है कि वेदोंका धर्म और ब्रह्मस्वरूपके निर्णयमें अनपेक्ष प्रामाण्य है। कल्पसूत्र, स्मृत्यादि और अन्यान्य आर्षग्रन्थोंका प्रामाण्य वेदसापेक्ष ही है। अतएव वेदके साथ जिन वचनोंका विरोध होता है, उनका प्रामाण्य कभी भी स्वीकार नहीं किया जाता, चाहे वे वचन किसी भी आर्षग्रन्थके क्यों न हों। वेदोंमें अवान्तर अनेक भेदोंके होते हुए भी प्रधान रूपसे मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग हैं। शाखाभेद होनेसे उनमें अनेकता होनेपर भी विषय प्रायः सबका समान ही है। प्रायेण मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र साथ ही चलते हैं। यद्यपि उन सभीका महातात्पर्य सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद परिपूर्ण परमानन्दघन भगवान्में ही है, यथा 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) तथापि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, परमसूक्ष्म भगवत्तत्त्वकी उपलब्धि और उसमें स्थिति बहिर्मुख प्राणियोंके लिये कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है। अतः योग्यता-सम्पादनके लिये अनेक प्रकारके कर्म और उपासनाओंकी अत्यन्त आवश्यकता है। अतः वेदोंका अवान्तर तात्पर्य उनमें भी है। वेदोंके महातात्पर्यके विषयभूत परमानन्दघन भगवान्में ही सकल प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और प्रतीति होती है, अतः जैसे तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें जल ही भरपूर होता है, वैसे ही भोक्ता-भोग्य सकल प्रपंचके भीतर, बाहर, मध्यमें परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भरपूर हैं। किं बहुना एक आनन्द-सुधा-सिन्धु भगवान् ही अपनी