भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 725

वेदान्तरससार ७१५ अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिके प्रभावसे नाना जैसे आनन्दस्वरूप चैतन्यात्मक ब्रह्मसे जड़ तथा दृश्य रूपमें प्रतीत होते हैं, यथा- 'आनन्दाद्धयेव दुःखात्मक प्रपंचका होना सम्मत है, वैसे ही खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि परमार्थसत्य परमात्मासे मिथ्या प्रपंचका प्रादुर्भाव जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीय० मानना युक्त है। इन विवेचनोंसे सिद्ध हुआ कि ३।६) 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' (छान्दो० परमानन्द स्वप्रकाश परमार्थसत्य भगवान्से दुःखात्मक, ६।२।३) इत्यादि। जडात्मक, मिथ्या अर्थात् अपरमार्थिक व्यवहारोपयोगी, ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और व्यावहारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है। जगत्की असच्चिदानन्दरूपता मायाकी अनिर्वचनीयता जैसे आनन्दस्वरूपसे दुःखात्मक प्रपंच प्रादुर्भूत जैसे अग्निकी दाहिका-शक्ति अग्निसे विलक्षण होता है, वैसे ही चैतन्यसे जड प्रपंचका प्रादुर्भाव होती है, वैसे ही त्रिकालाबाध्य सद्रूप ब्रह्मकी होता है। यह बात अभिन्ननिमित्तोपादान कारणवादियोंको प्रपंचोत्पादिनी शक्ति ब्रह्मसे विलक्षण है। अतः माननी पड़ती है और उसी तरह त्रिकालाबाध्य त्रिकालाबाध्यरूप सत्से विलक्षण उसकी शक्ति शुद्ध परमार्थ सत्य भगवान्से अनृतात्मक प्रपंचका प्रादुर्भाव सद्रूप अधिष्ठानके बोधसे बाधित होती है। साथ ही होता है, यह भी मानना चाहिये। क्वचिदपि कथंचिदपि (कहीं भी, किसी प्रकार भी) प्रपंच आनन्दसे उत्पन्न होनेवाला और आनन्दमें न प्रतीत होनेवाले अत्यन्त असत् खपुष्पादि (आकाश- विलीन होनेवाला है, यह उपर्युक्त श्रुतिसे स्पष्ट कुसुमादि)-से भी विलक्षण सत्की शक्ति है; क्योंकि सिद्ध होता है। जैसे समुद्रसे उत्पन्न और उसमें वही सकल प्रपंचकी जननी है। इस तरह जिससे विलीन होनेवाला तरंग समुद्र ही है, वैसे ही परमात्मा अपने-आपको सकल प्रपंचरूपसे व्यक्त आनन्दसे उत्पन्न और उसीमें विलीन होनेवाला करता है, परमात्मनिष्ठ वह शक्ति सत् और असत् प्रपंच भी आनन्दात्मक ही होना चाहिये तथा दोनोंसे विलक्षण है, अतएव उसको अनिर्वचनीय सर्वप्रकाशक चैतन्यघनसे उत्पन्न होनेवाला प्रपंच कहते हैं। चेतनात्मक ही होना चाहिये। परंतु प्रपंचमें दुःखरूपता इस शक्तिको ही 'माया', 'प्रकृति', 'अविद्या', और जड़ता सर्वानुभवसिद्ध एवं सर्वमान्य है, अतः 'अज्ञान' आदि शब्दोंसे कहा जाता है। जैसे कहना पड़ता है कि कारणगत अनिर्वचनीय शक्तिसे 'योगमायासमावृतः' (गीता ७।२५) इत्यादि वचनोंसे कार्यमें अनिर्वचनीय विलक्षणता होती है। इसी मायाद्वारा ज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मका आवरण कहा है, वास्ते यद्यपि स्पष्ट देखते हैं कि जलसे भिन्न बर्फ वैसे ही 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५)- और तन्तुसे भिन्न पट कोई पृथक् पदार्थ नहीं है तो इस वाक्यसे अज्ञानको भी आवरक कहा है। जैसे भी जल और तन्तुओंकी अपेक्षा उनमें (बर्फ और 'मायामेतां तरन्ति ते' (गीता ७।१४)- इस वाक्यमें पटमें) विलक्षणता अवश्य है। इसीलिये आनन्द मायाको तरण कहा है, वैसे ही 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं और स्वप्रकाशचैतन्यरूप परमात्मासे भिन्न (विलक्षण) येषां नाशितमात्मनः' (गीता ५।१६)- इस वचनसे जड़ और दुःखरूप प्रपंच उत्पन्न होता है। ज्ञानको अज्ञानका नाशक कहा है। अब यह देखना चाहिये कि दुःख तथा ज्ञानाभावरूप अज्ञान आवरणकर्तृत्व नहीं हो जडरूप प्रपंच सत्य है या मिथ्या? यदि पूर्वोक्त सकता, भावाभावके असमकालिक (एक कालमें न्यायसे विचार करें तो स्पष्ट विदित होगा कि कार्य अनवस्थित) होनेसे ज्ञानसे ज्ञानाभावरूप अज्ञानका और कारणमें अनिर्वचनीय विलक्षणता है। अतः नाश भी नहीं हो सकता, अतः अज्ञान सदसद्विलक्षण

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