भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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७१६ भक्तिसुधा


मायाशक्तिरूप ही है। जैसे 'चित्', 'अचित्' इन दोनों शब्दोंसे चेतन और जड़ दोनों भावरूप ही गृहीत होते हैं, वैसे ही ज्ञान-अज्ञान इन दोनों शब्दोंसे परमात्मा और उसकी शक्ति अनिर्वचनीय माया गृहीत होती है। वह शक्ति जैसे सद्विलक्षण है, वैसे ही चित्से भी विलक्षण है, अतः 'अचित्' जड़ समझी जाती है। उसके द्वारा सच्चिदानन्दात्मक (सत्-चित्स्वरूप) तत्त्वका अनित्य जड प्रपंचरूपसे विवर्त होता है।

ज्ञानस्वरूपविमर्श

जैसे शक्तिकी स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अपने आधारभूत शक्तिमान्से ही सुलभ होते हैं, वैसे ही अचित्की स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अचित्के आधारभूत ही सुलभ होते हैं। यह स्पष्ट ही है कि अचित्की प्रवृत्ति और स्फूर्ति चित्से ही सम्भव है। यदि वह स्वतःप्रकाश हो, तब तो उसे अचित् ही नहीं कह सकते। ऐसे ही अज्ञानकी स्थिति, प्रवृत्ति और स्फूर्ति ज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही सम्भव है। अतएव 'मैं अज्ञ (अज्ञानी) हूँ' इस प्रकार अज्ञानका प्रकाश नित्य अखण्ड ज्ञानस्वरूप साक्षीसे ही होता है। यहाँ यह समझना चाहिये कि ज्ञान दो प्रकारका है। एक तो अन्तःकरणकी चैतन्यप्रतिबिम्बोपेत वृत्तिरूप, जो उत्पन्न होनेवाले और विनाशीरूपसे लोकमें शब्द-ज्ञान, स्पर्श-ज्ञानादिरूपसे प्रसिद्ध है और दूसरा स्वप्रकाश चैतन्यान्द ब्रह्मरूप, जो लौकिक ज्ञान और निद्रा-अज्ञानादिका भासक, कूटस्थरूप, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयो० २।१), 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहदारण्यक० ३।९।२८) इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। ब्रह्मरूप ज्ञान ही अचिच्छक्तिरूप अज्ञान एवं तत्कार्यरूप सकल प्रपंचको सत्त्व और प्रकाश देकर कार्यकारणक्षम बनाता है। इस तरह परमानन्द रसात्मक भगवान्से ही सत्ता, स्थिति, स्फूर्ति प्राप्त करके नीरस, असत्, स्फूर्तिरहित प्रपंच सरस, सत्य, स्फूर्तिमान्-सा प्रतीत हो रहा है। अतएव जैसे दहन-सामर्थ्यशून्य लौहपिण्डको अनित्य और सातिशय दहन-सामर्थ्य प्रदान करनेवाला, नित्यनिरतिशय दहन- सामर्थ्यसम्पन्न अग्नि दग्धाका भी दग्धा कहा जाता है और जैसे अनेक प्रान्ताधिपतियोंको राजा बनानेवाला सर्वाधिपति राजराज कहा जाता है, वैसे ही अनित्योंको नित्य, अचेतनोंको चेतन, असत्योंको सत्य बनानेवाले वेदान्त-वेद्य परमानन्द रसात्मक भगवान् नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य, सुखोंके सुख और रसोंके रस कहे जाते हैं। जैसे सर्वाधिपति राजराजसे निर्मित राजगण प्रजाकी अपेक्षा राजा होते हुए भी सम्राट्की अपेक्षा प्रजा ही हैं; वैसे ही नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य भगवान्से निर्मित व्यावहारिक नित्य, चेतन, सत्यपदार्थ प्रातिभासिक रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा चेतन, नित्य, सत्य होते हुए भी परमनित्य, सत्य, चैतन्यकी अपेक्षा अनित्य, असत्य, अचेतन ही हैं। जैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति-सिद्ध है तथापि क्षणिक पदार्थोंकी अपेक्षा वह स्थिर है, अतः उसको न्यायसिद्धान्तानुसार नित्य कहते हैं; जैसे उत्पत्ति- विनाशवाले, साभासवृत्तिरूप ज्ञान जड होते हुए भी घटादिकी अपेक्षा चेतन कहे जाते हैं, वैसे ही लोकसिद्ध मिथ्या रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा अबाध्य होनेके कारण रज्ज्वादि तथा घटादि भी सत्य कहे जाते हैं। इन्हीं आपेक्षिक नित्य-चेतन, सत्य, सरस पदार्थोंको वेदान्ती सकल सत्शास्त्रोंके महातात्पर्यका विषयीभूत, निखिल रसोंके समुद्गम-स्थान, भगवान्की अपेक्षा अनित्य, जड़, नीरस, दुःखरूप या व्यवहारोपयुक्त, व्यावहारिक नित्य, व्यावहारिक सत्य, व्यावहारिक चेतन अथवा व्यावहारिक सुख कहते हैं।

भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन

पारमार्थिक सत्य, चैतन्य, नित्य आनन्दरस- स्वरूप तो भगवान् ही हैं, इसी अभिप्रायसे 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनाम्' (कठ० २।२।१३), 'सत्यस्य सत्यम्' (बृहदारण्यक० २।३।६) इत्यादि श्रुति-वचन भगवान्को नित्य-