भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार ७१७ का-नित्य, सत्य-का-सत्य कहते हैं। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी भी अपने रामको प्राण-के-प्राण, जीव-के-जीव, सुख-के-सुख कहते हैं— आनँदहू के आनँद दाता॥ प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० १।२१७।२; २।२९०) जैसे घटाकाशका जीवन महाकाश और तरंगका जीवन समुद्र है, वैसे ही जीवके जीवन भगवान् हैं। अस्तु, इस तरह सिद्ध हुआ कि परमार्थतः सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्से भिन्न जो कुछ प्रतीत होता है, वह मिथ्या ही है। जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है, वैसे ही परमात्मामें प्रपंचका भ्रम है। यही सत्यसे मिथ्या पदार्थकी उत्पत्तिका प्रकार है। इसी सिद्धान्तको श्रीगोस्वामीजीने भी श्रीरामचरितमानसमें पुष्ट किया है— झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ (रा०च०मा० १।११२।१) अतः सिद्ध हुआ कि परमानन्दघन भगवान्से भिन्न होकर परमार्थ सत्य कोई भी पदार्थ नहीं है। जैसे वायु आदि क्रमसे आकाशके द्वारा ही समुद्भूत घटरूप उपाधिसे आकाशमें महाकाश और घटाकाश ये दो भेद हो जाते हैं, वैसे ही परमात्मासे समुद्भूत उपाधियोंके द्वारा चैतन्यानन्दघन भगवान्में ही जीव और परमेश्वर ये दो भेद हो जाते हैं। वस्तुतः घट, आकाशका कार्य होनेसे उससे पृथक् नहीं है। अतएव इस तथ्यको मर्मज्ञ विद्वान् तैत्तिरीयो- पनिषद्की विधासे जैसे घटरूप कार्यको पृथिव्यादि विलोमक्रमसे चरमोपादान आकाशरूप कारणमें प्रलीन करके, घटरूप उपाधिको आकाशमें बाधितकर घटाकाश और महाकाशके भेदको बाधित कर देते हैं; वैसे ही अधिष्ठानरूप, शुद्ध सत्यके बोधसे, सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय शक्ति एवं तत् कार्यरूप उपाधियोंको सद्रूप ब्रह्ममें ही बाधित करके, जीव और परमेश्वरके भेदका भी निराकरण कर देते हैं अर्थात् जैसे घटको पृथ्वीमें, पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें एवं वायुको आकाशमें लय करनेपर महाकाशसे भिन्न न घटरूप उपाधि रहता है और न घटोपहित घटाकाश ही रहता है, वैसे ही सुबालोपनिषदादिकी प्रक्रियासे आकाशको अहंतत्त्वमें, अहंतत्त्वको महत्तत्त्वमें और उसको अव्यक्तमें, अव्यक्तको सत्तत्त्वमें विलीन कर देनेपर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अज्ञानरूप उपाधि तथा इन उपाधियोंसे उपहित जीव, ये सभी अखण्डानन्द-रस भगवान् ही हो जाते हैं। भगवान्से भिन्न उनका कोई भी स्वरूप नहीं रहता। इसी वास्ते भगवती श्रुतिने कहा है—‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत’, ‘ऐतदात्म्यमिदꣳ सर्वं···· स आत्मा तत्त्वमसि’, (छान्दोग्य० ३।१४।१; ६।८।७) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (माण्डूक्य० २), ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (बृहदारण्यक० २।५।१९; १।४।१०) अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है, क्योंकि तज्ज, तल्ल, तदन है— स्वातिरिक्त सबका उत्पत्ति, लय और स्थितिस्थान है। ब्रह्मसे ही समस्त प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति एवं संहृति सम्भव है। यह सर्व दृश्य प्रपंच इस आत्माका स्वरूप ही है, ब्रह्म ही समस्त प्रपंचकी आत्मा है और ब्रह्म ही तुम हो। यह आत्मा ब्रह्म है। ‘अहं’ पद लक्ष्यार्थ प्रत्यगात्मा ब्रह्म ही है। किं बहुना ‘सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः’, (मुण्डक० २।१।२) ‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ (गीता १३।१५) अर्थात् चराचर सकल प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म ही है और जिस चराचर प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म है, वह चराचर प्रपंच भी ब्रह्म ही है। सर्वदृश्यरूप क्षेत्र और द्रष्टारूप क्षेत्रज्ञ—ये सभी भगवान् ही हैं। श्रीभगवान्की भी उक्ति है—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।’ (गीता १३।२) बाह्याभ्यन्तर कार्यकारण सब कुछ अज अव्यक्त ब्रह्म ही है। ‘अजायमानो बहुधा वि जायते’, (यजु० ३१।१९) ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘इन्द्रो मायाभिः