भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

७१८ भक्तिसुधा पुरूरूप ईयते' (बृहदारण्यक० २।५।१९) अर्थात् अजायमान और एक ही परमतत्त्व मायासे बहुरूपमें जायमान-सा प्रतीत होता है। जो इस अजायमान अखण्डैकरस, अद्वितीय वस्तुमें वस्तुतः जायमानता और नानात्व देखता है. जो ब्रह्मकी निर्विकारकूटस्थता और अखण्डैकरसताका व्यापादन या उसे कलंकित करना चाहता है. वह प्राणी उसी अपराधसे पुनः- पुनः मृत्युको प्राप्त होता है। अतः इसे परमार्थतः एक रूपसे ही देखना चाहिये। 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥' (कठ० २।१।१०) अर्थात् जो भगवान्‌में थोड़ा भी भेदकी कल्पना करता है, उसे भय होता है। 'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। (तैत्तिरीय० २।७), द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥' (बृहदारण्यक० १।४।२) इतना ही नहीं, संसारमें ब्रह्म और धर्म, लोक एवं वेद, किं बहुना जिस किसी भी पदार्थको प्रभुसे भिन्न या पृथक् देखा जाता है, वह पदार्थ ही अपना घोर अपमान समझकर भिन्नदर्शीको परमार्थसे प्रच्युत कर देता है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' (बृहदारण्यक० २।४।६) प्रियतमका विप्रयोग किसीके लिये भी सह्य नहीं है। प्रेमकी पराकाष्ठा यही है कि प्रियतमसे वियुक्त होकर प्रेमी क्षणभर भी अपना जीवन न रख सके। श्रीव्रजांगनाओंका अपने प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगमें एक क्षण भी अनन्त कोटि कल्पके समान प्रतीत होता था। परमार्थ दृष्टिसे तो प्रियतमका वियोग होते ही प्रेमीका स्वरूप ही नहीं रह सकता। क्या बिम्बसे वियुक्त होकर प्रतिबिम्बका और महाकाशसे वियुक्त होकर घटाकाशका एवं महासमुद्रसे वियुक्त होकर तरंगका स्वरूप रह सकता है ? इनमें तो कहनेके लिये भेद है, वस्तुतः भेद नहीं है। इसीलिये श्रीगोस्वामीजीने श्रीराम और जनकनन्दिनीमें जल और बीचिका दृष्टान्त रखकर अभेद सिद्ध किया है- 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) फिर कोई भी तत्त्व भगवान्‌की सत्ता और स्फूर्तिसे वियुक्त होकर अपना स्वरूप कैसे रखे; क्योंकि सत्ता- स्फूर्तिसम्बन्धशून्य होनेपर सभी तत्त्व निःसत्त्व और निःस्फूर्ति हो जाते हैं। स्फूर्ति और सत्तारहित पदार्थका स्वरूप ही क्या हो सकता है, अतः जिन पदार्थोंको परमार्थ सद्रूप, स्वयंप्रकाश, स्फूर्तिरूप भगवान्‌से भिन्न समझा जाता है, उन्हें मानो उनके प्रियतमसे वियुक्त किया जाता है। उन्हें सत्तास्फूर्तिविहीन तथा निःसत्त्व, निःस्फूर्ति बनाकर अपमानित किया जाता है। अतः वे पदार्थ उन भिन्नदर्शीको स्वार्थसे प्रच्युत कर देते हैं। इन्हीं श्रुति-स्मृति-सिद्ध-पारमार्थिक अभेद और काल्पनिक व्यवहारमें आनेवाले व्यावहारिक भेदको सिद्ध करनेके लिये वेदान्तोंमें बिम्ब-प्रतिबिम्ब, घटाकाश-महाकाश, समुद्र-तरंग आदि अनेक दृष्टान्त जीव और भगवान्‌के स्वरूपमें रखे गये हैं। दृष्टान्त एकदेशी हुआ करते हैं। उनका सर्वांश दाष्ट्रान्तिकमें नहीं संगत हुआ करता। इसी वास्ते जैसे घटके गमनमें, जिस आकाशके साथ घट-सम्बन्ध विच्छिन्न हुआ, वह महाकाश हुआ और जो महाकाश था, वही घटके संसर्गसे घटाकाश हो गया। इसी तरह अन्तःकरणके गमनमें पूर्वदेशस्थ अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य मुक्त हो गया एवं उत्तर-देशस्थ अन्तःकरणा- वच्छिन्न अपूर्व चेतन बद्ध हो गया। जब नीरूप निरवयव पदार्थ न प्रतिबिम्बित होता है और न प्रतिबिम्बका आधार होता है। फिर आत्मा और अन्तःकरण ये दोनों ही नीरूप एवं निरवयव हैं। आत्माका प्रतिबिम्ब कैसे होगा एवं अन्तःकरणकी प्रतिबिम्बाधारता कैसे होगी इत्यादि शंकाएँ निर्मूल हैं, कारण कि अलौकिक अर्थमें लौकिक पदार्थ पूर्णरूपसे दृष्टान्त नहीं हुआ करते। केवल विवक्षित अंशमें दृष्टान्त-दाष्ट्रान्तिकी समता होती है। यहाँ केवल उपाधिद्वारा उपहितमें काल्पनिक भेद तथा उपाधिगत दूषण या भूषणका भान होना और परमार्थतः अभेद तथा सर्वोपाधिदोषादिविवर्जित होना-इतना ही अंश विवक्षित है। जैसे घटाकाशका

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 728, कुल 778 में से · BharatKosha