भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 729

वेदान्तरससार ७१९ महाकाशसे भेद और उसमें गमनागमनादि नाना प्रकारकी कार्यकारणक्षमता यह सब घटोपाधिकृत हैं, जैसे महासमुद्रसे तरंगका भेद और उसका चांचल्यादि वायुरूप उपाधिसे जन्य है, जैसे प्रतिबिम्बमें बिम्बका भेद एवं मलिनता, चंचलता आदि जलदर्पणादि उपाधिजन्य है, उसी तरह जीवमें निर्विकार, परमचैतन्यतानन्द, रसात्मक भगवान्से भिन्नता कर्तृत्व- भोक्तृत्व, सुखित्व-दुःखित्वादि नाना अनर्थोंका योग एवं अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिकृत है। उपाधिके विलयनमें एक परमानन्द भगवान् ही अवशेष रहता है। इस प्रकारसे तत्त्वकी अद्वितीयता, अनन्तता और लोकसिद्ध व्यवहारकी उपपत्ति दिखलानेके लिये अनेक प्रकारके दृष्टान्तोंका उपपादन है। जिसकी बुद्धिमें जिस दृष्टान्तसे पारमार्थिक अभेद और व्यावहारिक भेद बुद्ध्यारूढ़ हो, उसके लिये वही दृष्टान्त प्राधान्येन उपादेय है; क्योंकि शास्त्रोंका किसी दृष्टान्तमें तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य तो केवल व्यावहारिक भेदोपपादनपूर्वक पारमार्थिकाद्वैत-बोधनमें ही है। इस प्रकार यही सिद्ध होता है कि परमानन्द- रसात्मक भगवान् ही चिदानन्दमयी जीवशक्तिके भीतर, बाहर तथा मध्यमें भरपूर हैं। किं बहुना जीवशक्ति विशुद्धस्वरूप भगवान् ही है। आनन्दसुधासिन्धु भगवान्की लहरीरूप जीवशक्ति भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) ही है। जैसे बर्फकी पुतली सिन्धुके बीचमें रहकर प्यासकी रटन रटे, किंवा जैसे निखिल रसामृतसिन्धुसारसर्वस्व कृष्णसुधामें अहर्निश सर्वांगीण संश्लेषरूप अवगाहन करती हुई भी कृष्णप्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी अधिरूढ़ महाभावकी विलक्षण अवस्था-विशेष परवश होकर 'हा प्राणवल्लभ, कहाँ हो?' इस प्रकार मिलनके लिये व्यग्र होती हैं—'अङ्कस्थितेऽपि दयिते किमपि प्रलापं हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात्' (राधासुधा ४६) वैसे ही प्रियतमकी मोहिनीमायाशक्तिसे परमानन्दरसार्णव भगवान्में बर्फ पुतलीकी तरह निमग्न जीव-शक्ति, प्रियतमको भूलकर, अनन्त संतापोंमें निमग्न सन्तप्त हो रही है। शास्त्र तथा आगमोंके प्रबोधनसे ही अज्ञानजन्य विस्मरण तथा विभ्रमकी निवृत्ति होती है—'आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) 'सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥' (रा०च०मा० ७।१११।६) तू वही है, तुझमें-उसमें किंचित् भी भेद नहीं है, जैसे जल और बीचिका भेद 'कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) कहनेको भिन्न है, वस्तुतः अभिन्न ही है। श्रीमद्भागवतके पुरंजन और पुरंजनीके आख्यानमें, जिस समय जीवरूप पुरंजन मायावश अपने परम अन्तरंग प्रियतम सखाको भूलकर बुद्धिरूपा पुरंजनीका अत्यन्त अनुरागी होकर अनवरत पुरंजनीके चिन्तनमें तन्मय हो गया, उस समय पुण्यपरिपाकसे, पतिरूप गुरुकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर श्रीहंसरूपधारी भगवान्ने प्रकट होकर पूछा कि तुम हमें जानती हो? पुरंजनीने कहा— 'प्रभो! मैं आपको नहीं जानती।' इसपर भगवान्ने कहा—'ठीक है, मेरे विस्मरणका ही तो यह फल है। मुझे भूलनेसे ही अनेकानर्थमूल संसृतिचक्रमें प्राणियोंको भटकना पड़ता है। देखो—'अहं भवान् न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः। न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि॥' (श्रीमद्भा० ४।२८।६२) मैं ही तुम्हारा पारमार्थिक स्वरूप हूँ, तुम मुझसे पृथक् नहीं हो। मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ। इस भावको गम्भीरतासे देखो। कवि लोग हमारे और तुम्हारेमें कभी किंचिन्मात्र भी भेद नहीं देखते।' श्रीपरीक्षित्की भी अन्तमें 'अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्माहं परमं पदम्।' (श्रीमद्भा० १२।५।११) ऐसी ही दृढ़ धारणा हुई। अन्यान्य वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंकी भी ऐसी धारणा है—'अहं वै भगवो देवते त्वमसि त्वं वै भगवो देवते अहमस्मि।' हे भगवन्! मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ; क्योंकि जो लोग प्रेम करते हैं तो उन्हें यही

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