भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 730

७२० भक्तिसुधा कहना पड़ता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिये, केवल प्रभुप्रेममें या प्रभुस्वरूपके सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासमा- स्वादनमें मुझे लोकोत्तर रस आता है। ऐसी स्थितिमें विवेकी जनोंको स्पष्ट हो जाता है कि वह प्रेमी अपने आनन्दके लिये ही प्रभुमें प्रेम करता है, प्रभु-स्वरूप- सम्बन्धी सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतके आस्वादनसे ही उसकी आत्माको आनन्द होता है। इसीलिये जिनके ऐसे भी भाव हैं कि प्रियतम मुझसे अनुकूल हों या प्रतिकूल, सर्वगुणसम्पन्न हों या सर्वगुणरहित, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हों या सौन्दर्य-माधुर्य-विहीन, सब प्रकारसे हमारे ध्येय, ज्ञेय, प्रियतम प्रभु ही हैं— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्ममायम्॥ (उज्ज्वलनीलमणि-स्थायिभाव २९) उनकी आत्माको सुख और शान्ति सब प्रकारसे प्रभुसमाश्रयणमें ही होता है। इसलिये ये समस्त भाव आत्माके लिये हुए। प्रभुके लिये लोक- परलोक सब प्रकारकी सुखशान्तिका, किं बहुना प्राणादि समस्त प्रियतम वस्तुओंका त्याग किया जाता है। यहाँपर भी सूक्ष्म रूपसे देखनेपर यही विदित होता है कि उस प्रेमीकी आत्माको ऐसा ही करनेपर सुख मिलता है, अतः यह सब कुछ आत्माके लिये ही है। भगवत्तत्त्वकी आत्मरूपता लोकमें कोई धार्मिक पुरुष धर्म-रक्षाके लिये आत्माकी आहुति दे देते हैं। वेदोंमें भी एक यज्ञ ऐसा है, जिसमें यजमान अपना सर्वस्व ब्राह्मणोंको देकर स्वयं अपनेको अग्निकुण्डमें समर्पण कर देता है। परंतु इन सभी स्थलोंमें इस प्रकारके उत्कट त्याग और तपस्याओंका लक्ष्य अन्तरात्माकी अनन्त शान्तिमें ही है। इसी प्रकारके भावोंको लक्ष्यमें रखकर आत्माके औपाधिक चिदाभासस्वरूपके बाधके लिये साधिष्ठान चिदाभाससे ही प्रयत्न किया जाता है। इसीलिये भगवती श्रुतिने स्पष्ट निर्णय करके यहाँ भी सर्वोपप्लव- विवर्जित, परमानन्दरूप चिदात्माका शेष रहना लक्ष्य रखा है—'आत्मानमेव प्रियमूपासीत।' (बृहदारण्यक० १।४।८) अर्थात् प्रिय रूपसे आत्माकी ही उपासना करनी चाहिये। 'योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीति' (बृहदारण्यक० १।४।८) आत्मासे भिन्नको जो प्रिय कहता है, उसे प्रियके लिये रुदन करना पड़ता है। जब ब्रह्माने श्रीकृष्णके गोवत्सों और वत्सपालोंका हरण किया, तब एक वर्षपर्यन्त श्रीकृष्ण ही वत्स और वत्सपालके रूपमें व्यक्त हुए। उस समय समस्त गौओंको अपने-अपने बछड़ोंमें और व्रजदेवियोंको अपने-अपने शिशुओंमें ऐसा अभूतपूर्व लोकोत्तर प्रेम हुआ, जैसा कभी अपने मुख्य अंगजोंमें नहीं हुआ था। इस बातको श्रीशुकदेवके मुखारविन्दसे श्रवण करके जब श्रीपरीक्षित्जीने आश्चर्य प्रकट करते हुए इसका कारण पूछा, तब श्रीशुकदेवजीने यही कहा कि राजन्! संसारमें समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा आत्मा ही प्रिय होता है; तदितर पुत्र, वित्त, कलत्रादि आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं, देहको ही आत्मा माननेवाले जो देहात्मवादी हैं, उन्हें भी जितना देह प्रिय है, उतने देह-सम्बन्धी पुत्रादि नहीं। श्रीकृष्ण समस्त जीवोंके अन्तरात्मा हैं, अतः समस्त प्राणियोंके निरतिशय एवं निरूपाधिक प्रेमके आस्पद हैं, उनमें अपने आत्मजोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम होना युक्त ही है। सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव वल्लभः। इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि॥ 'देहात्मवादिनां पुंसामपि राजन्यसत्तम।' 'कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।५०, ५२, ५५) जिसमें प्रेम किसी दूसरेके लिये होता है, उसमें कभी प्रेमका अभाव भी हो जाता है; क्योंकि वह औपाधिक प्रेम होता है। अतएव अनित्य एवं सातिशय होता है, जैसे अनुष्ण जलमें उष्णता अग्निके संसर्गसे होती है, स्वतः नहीं, अतएव