भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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जलमें औपाधिक उष्णता अनित्य एवं सातिशय है, परंतु जिस अग्निके संसर्गसे जलमें उष्णता व्यक्त हुई, उस अग्निमें तो उष्णता नित्य एवं निरतिशय है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम आत्माके संसर्गसे ही होता है। वित्त, क्षेत्र, साम्राज्यादिमें प्राणियोंको प्रेम नहीं होता; क्योंकि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें, साम्राज्यादि अनेक प्रकारके अभ्युदयसम्बन्धी साधन हैं ही। मान लीजिये कि हम और हमारा देश किसी राष्ट्रके बिल्कुल परतन्त्र हो, हमारा सर्वस्व किसीने अपहरण कर लिया हो तो भी सम्पत्ति और राष्ट्र या साम्राज्य आक्रमणकारी अपहर्ताके पास तो हैं ही, उसमें हमें सन्तोष क्यों नहीं होता ? यहाँ विज्ञसम्मत हेतु यही हो सकता है कि यद्यपि कहीं-न-कहीं तो सब कुछ है सही तथापि वह हमारा तो नहीं है। वित्त, क्षेत्र, राष्ट्र या साम्राज्यमात्रमें ही हमारा प्रेम नहीं होता, किंतु हमारा 'अपने' वित्त, क्षेत्र, राष्ट्रादिमें प्रेम होता है। इस तरह स्वसम्बन्धसे ही स्वदेश, स्वराज्य, स्ववित्त, स्वक्षेत्रमें प्राणियोंको अधिक प्रेम होता है। सुन्दर पुत्रकलत्रमें भी स्वसम्बन्ध होनेसे ही प्रेम होता है। सुन्दरी कामिनीमें भी 'यह मुझे मिले, मेरी हो जाय' इस तरह स्वसम्बन्धित्वापादनकी ही रुचि होती है। इसी तरह 'उच्च-से-उच्च ऐश्वर्य मुझे, मेरे देशको, मेरे सम्बन्धियोंको हो' इस प्रकार स्वसम्बन्धीमें ही, स्वानुकूलमें ही, प्रेम दृष्टिगोचर होता है। किंबहुना अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् ही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र एवं श्रीकृष्णचन्द्रस्वरूपमें प्रकट होते हैं, परंतु उनमें भी स्वसम्बन्धसे प्रेमका तारतम्य देखा जाता है। जो अपने इष्टदेव हैं, उनके सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य एवं चरित्रादिमें जितना प्रेम, जितना आकर्षण होता है, उतना अन्यमें नहीं। और तो क्या, कृष्णस्वरूपमें ही महानुभावोंने पाँच भेदोंकी कल्पनाकर डाली है। वे द्वारकास्थ, मथुरास्थ कृष्णके अतिरिक्त 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' के अनुसार पूर्ण, पूर्णतर, पूर्णतम भेदसे व्रजस्थ, वृन्दावनस्थ, लीलानिकुञ्जस्थ श्रीकृष्णमें भेद स्वीकारकर पूर्णतम लीलानिकुञ्जनायक श्रीकृष्णमें ही अपना हृदय आसक्त करते हैं। अन्यके स्वरूपसौन्दर्यादिमें उनके चित्त आकर्षित नहीं होते हैं। अतएव एक बार लीलया किसी निकुंजमें छिपे हुए श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाएँ जब मनमोहनके पास पहुँच गयीं, तब श्रीकृष्णने शीघ्र ही विष्णुस्वरूपमें प्रकट होकर अपने उस व्रजराजकुमारस्वरूपको छिपा लिया और अपने-आपको सर्वगुणसमलंकृत श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट किया; पर श्रीव्रजांगनाओंका मन उस रूपमें किंचित् भी आकर्षित नहीं हुआ, किंतु उन्हें प्रणामकर वे 'हे देव ! हमारे प्रियतमको मिला दो' यह कहकर वहाँसे अपने प्रियतमको ढूँढती हुई आगे चली गयीं। वस्तुके उत्कर्षसे उसमें प्रेम नहीं होता है, किंतु स्वसम्बन्धसे ही वस्तुकी उत्कृष्टता भी व्यक्त होती है। अतएव 'गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा' इत्यादि वचनोंसे पहले ही कह आये हैं कि 'अनन्त गुणसमलंकृत हो या सर्वगुणविहीन हो, जो अपना है, वही सर्वस्व है।' पूर्णतम होनेके कारण ही उनकी ओर सभीका चित्त आकर्षित नहीं होता है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) जिसमें स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता हो गयी, वही सर्वस्व है। जिसमें जितनी-जितनी स्वानुकूलता है, उसमें ही प्रेमकी उतनी अधिकता होती है और जिसमें जितनी स्वप्रतिकूलता है, उसमें ही द्वेषकी उतनी अधिकता होती है। कोई व्यापारी बहुत दिनोंके बाद अपने घरको लौट रहा था। मार्गमें किसी सरायमें उसने निवास किया। दैवात् उसी सरायमें रातको उसकी स्त्री अपने अत्यन्त रुग्ण पुत्रको लेकर आयी। रुग्ण बालक दुःखसे घबराकर, चीख मारकर रो रहा था। उस व्यापारीने अपनी