भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
जलमें औपाधिक उष्णता अनित्य एवं सातिशय है, परंतु जिस अग्निके संसर्गसे जलमें उष्णता व्यक्त हुई, उस अग्निमें तो उष्णता नित्य एवं निरतिशय है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम आत्माके संसर्गसे ही होता है। वित्त, क्षेत्र, साम्राज्यादिमें प्राणियोंको प्रेम नहीं होता; क्योंकि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें, साम्राज्यादि अनेक प्रकारके अभ्युदयसम्बन्धी साधन हैं ही। मान लीजिये कि हम और हमारा देश किसी राष्ट्रके बिल्कुल परतन्त्र हो, हमारा सर्वस्व किसीने अपहरण कर लिया हो तो भी सम्पत्ति और राष्ट्र या साम्राज्य आक्रमणकारी अपहर्ताके पास तो हैं ही, उसमें हमें सन्तोष क्यों नहीं होता ? यहाँ विज्ञसम्मत हेतु यही हो सकता है कि यद्यपि कहीं-न-कहीं तो सब कुछ है सही तथापि वह हमारा तो नहीं है। वित्त, क्षेत्र, राष्ट्र या साम्राज्यमात्रमें ही हमारा प्रेम नहीं होता, किंतु हमारा 'अपने' वित्त, क्षेत्र, राष्ट्रादिमें प्रेम होता है। इस तरह स्वसम्बन्धसे ही स्वदेश, स्वराज्य, स्ववित्त, स्वक्षेत्रमें प्राणियोंको अधिक प्रेम होता है। सुन्दर पुत्रकलत्रमें भी स्वसम्बन्ध होनेसे ही प्रेम होता है। सुन्दरी कामिनीमें भी 'यह मुझे मिले, मेरी हो जाय' इस तरह स्वसम्बन्धित्वापादनकी ही रुचि होती है। इसी तरह 'उच्च-से-उच्च ऐश्वर्य मुझे, मेरे देशको, मेरे सम्बन्धियोंको हो' इस प्रकार स्वसम्बन्धीमें ही, स्वानुकूलमें ही, प्रेम दृष्टिगोचर होता है। किंबहुना अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् ही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र एवं श्रीकृष्णचन्द्रस्वरूपमें प्रकट होते हैं, परंतु उनमें भी स्वसम्बन्धसे प्रेमका तारतम्य देखा जाता है। जो अपने इष्टदेव हैं, उनके सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य एवं चरित्रादिमें जितना प्रेम, जितना आकर्षण होता है, उतना अन्यमें नहीं। और तो क्या, कृष्णस्वरूपमें ही महानुभावोंने पाँच भेदोंकी कल्पनाकर डाली है। वे द्वारकास्थ, मथुरास्थ कृष्णके अतिरिक्त 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' के अनुसार पूर्ण, पूर्णतर, पूर्णतम भेदसे व्रजस्थ, वृन्दावनस्थ, लीलानिकुञ्जस्थ श्रीकृष्णमें भेद स्वीकारकर पूर्णतम लीलानिकुञ्जनायक श्रीकृष्णमें ही अपना हृदय आसक्त करते हैं। अन्यके स्वरूपसौन्दर्यादिमें उनके चित्त आकर्षित नहीं होते हैं। अतएव एक बार लीलया किसी निकुंजमें छिपे हुए श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाएँ जब मनमोहनके पास पहुँच गयीं, तब श्रीकृष्णने शीघ्र ही विष्णुस्वरूपमें प्रकट होकर अपने उस व्रजराजकुमारस्वरूपको छिपा लिया और अपने-आपको सर्वगुणसमलंकृत श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट किया; पर श्रीव्रजांगनाओंका मन उस रूपमें किंचित् भी आकर्षित नहीं हुआ, किंतु उन्हें प्रणामकर वे 'हे देव ! हमारे प्रियतमको मिला दो' यह कहकर वहाँसे अपने प्रियतमको ढूँढती हुई आगे चली गयीं। वस्तुके उत्कर्षसे उसमें प्रेम नहीं होता है, किंतु स्वसम्बन्धसे ही वस्तुकी उत्कृष्टता भी व्यक्त होती है। अतएव 'गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा' इत्यादि वचनोंसे पहले ही कह आये हैं कि 'अनन्त गुणसमलंकृत हो या सर्वगुणविहीन हो, जो अपना है, वही सर्वस्व है।' पूर्णतम होनेके कारण ही उनकी ओर सभीका चित्त आकर्षित नहीं होता है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) जिसमें स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता हो गयी, वही सर्वस्व है। जिसमें जितनी-जितनी स्वानुकूलता है, उसमें ही प्रेमकी उतनी अधिकता होती है और जिसमें जितनी स्वप्रतिकूलता है, उसमें ही द्वेषकी उतनी अधिकता होती है। कोई व्यापारी बहुत दिनोंके बाद अपने घरको लौट रहा था। मार्गमें किसी सरायमें उसने निवास किया। दैवात् उसी सरायमें रातको उसकी स्त्री अपने अत्यन्त रुग्ण पुत्रको लेकर आयी। रुग्ण बालक दुःखसे घबराकर, चीख मारकर रो रहा था। उस व्यापारीने अपनी
नींदमें बाधक समझकर बालक और उसकी माँको रोषके साथ खरी-खोटी सुनायी। परंतु प्रातःकाल होनेपर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि यह तो मेरी ही स्त्री और मेरा ही पुत्र है, तब तो उनके साथ ही वह अपने-आप भी रोने लगा। इस तरह विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि निकृष्ट-से-निकृष्ट वस्तुमें भी आत्माके स्वसम्बन्धकी घनिष्ठतासे प्रेमकी अतिशयता और अत्यन्त उत्कृष्ट वस्तुमें भी स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता न होनेसे प्रेमकी न्यूनता होती है। इतना ही नहीं, दूसरेकी उत्कृष्ट वस्तुमें द्वेष या ईर्ष्या-पर्यन्तका संचार हो जाता है। तभी तो ये कट्टर नवीन शैव-वैष्णव परस्पर एक-दूसरेके इष्टका उत्कर्ष नहीं सहन कर सकते हैं। अब सोचनेकी बात है कि जिसके सम्बन्धसे निकृष्टमें भी लोकोत्तर प्रेम और जिसके सम्बन्धके बिना परम उत्कृष्टमें भी द्वेष या ईर्ष्या होती है, वह निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है कि नहीं। जब शर्कराके सम्बन्धसे स्वभावतः माधुर्य-शून्य पदार्थोंमें भी मधुरिमाका अनुभव होता है, तब क्या शर्करामें मधुरिमाका अभाव कहा जा सकता है? जब स्वस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे प्रेमके अयोग्य पदार्थोंमें भी प्रेम होता है, तब क्या आत्मामें अन्यशेषता या प्रेमकी अपकर्षता कही जा सकती है? प्रत्युत स्पष्ट रूपसे यही कहा जा सकता है कि आत्माके सन्निहितमें प्रेमका आधिक्य और विप्रकृष्टमें प्रेमकी न्यूनता होती है। तभी देखते हैं कि प्रियतम, कलत्र एवं पुत्रकी रक्षाके लिये अनेकानेक प्रयत्नसे उपार्जन की हुई रत्नादि सम्पत्तियोंको त्याग देनेमें विलम्ब नहीं होता, किंतु कलत्र, पुत्र प्रभृति यदि अपने शरीरके प्रतिकूल प्रतीत होते हैं तो अप्रिय ही नहीं, अपितु शत्रु समझे जाते हैं। किसी गृहमें अग्नि लग रही है, पता चलता है कि अत्यन्त प्रिय पुत्र गृहके भीतर रह गया है। गृहपति अत्यन्त व्याकुल होता है, रुदन करता है, लोगोंसे कहता है—'भाई, चाहे कोई हमारा समस्त धन-धान्य रत्नादि ले ले, परंतु हमारे प्रिय पुत्रको जलते हुए भवनसे निकाल लाये।' यह सब कुछ होते हुए भी अपना शरीर इतना प्रिय है कि कोई अत्यन्त धनके लोभसे भी उसका नाश नहीं सहन कर सकता। जिसका प्रिय पुत्र है, वह स्वयं जलते हुए घरमें प्रवेश नहीं करता; केवल बाहर दूर खड़ा तड़फड़ाता है। ठीक ही है, संसारके समस्त नाते इस देहके ही साथ हैं, उसके नष्ट होनेपर समस्त नाते मिट जाते हैं। नहीं तो इस अपार संसारमें अनन्त जन्मके देह-सम्बन्धियोंका यदि स्मरण रहे तब कितनी माताएँ, कितने पिता और कितने पुत्र- कलत्रादि कुटुम्बी कहाँ-कहाँ हैं, उन सभीके सुख- दुःखमें कितना सुख-दुःख देखना (भोगना) पड़े। एक ही जन्मके कुटुम्बियोंके सम्बन्धमें क्या दशा हो रही है। अस्तु, देहके नष्ट होते ही स्त्री, पुत्र, धन- धान्य तथा अखण्ड साम्राज्यसे सम्बन्ध छूट जाता है। कदाचित् दूसरे जन्ममें किसीको स्मरण भी रहे कि यह साम्राज्य और विशाल धवलधाम सब मेरे ही हैं। पर अब बिना वर्तमान अधिपतिकी आज्ञाके उसे अपने ही निर्मित उस धवलधाममें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है और गत जन्ममें उसके नियुक्त भृत्य ही उसे प्रवेश नहीं करने देते हैं। ठीक है, देहतक ही समस्त सांसारिक सम्बन्ध हैं। अतः समस्त पुत्र, कलत्रादि बहिरंग पदार्थोंकी अपेक्षा देह प्रिय होती है। ऐसे ही देहकी अपेक्षा इन्द्रियाँ, उनकी अपेक्षा मन, मनकी अपेक्षा बुद्धि एवं बुद्धिसे भी अहमर्थ और उससे भी अन्तरंग विशुद्ध चिदात्मा प्रिय है। इन्द्रिय-शक्तिके बिना शरीर मृतकप्राय हो जानेके कारण भाररूप हो जाता है। जब मन किन्हीं कांचन, कामिनी प्रभृति विषयोंकी ओर खिंच जाता है, तब प्राणी मनःसन्तोषार्थ देह और इन्द्रियोंकी भी परवाह नहीं करते। किसी प्रकारकी अकीर्ति आदिसे यदि मनको उद्वेग होता है, तब देहादि-त्यागके लिये विष या शस्त्रका प्रयोग किया जाता है। जब प्राणी
मनकी चंचलतासे संतप्त होता है, तब उसके भी निग्रहका उपाय ढूँढता है और निश्चयात्मिका बुद्धि- द्वारा संकल्प-विकल्पात्मक मनका भी निग्रह करता है। जब प्राणीको मन आदि करणग्रामके निरोध या उसकी निर्व्यापारताका आनन्द अनुभव होने लगता है, तब तो वह दुःखात्मक दृश्यके प्रतीति-निरोधके लिये बुद्धिको भी निगृहीत करनेकी चेष्टा करने लगता है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इस रीतिसे क्रमशः आत्माके सन्निहित अतएव अन्तरंग बुद्ध्यादिके उद्वेग-निराकरण एवं अनुकूलता- सम्पादन करनेके लिये बहिरंग करणोंका निग्रह किया जाता है। शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता अध्यात्मशास्त्रोंमें मनोनाश वासनाक्षय प्रसिद्ध ही है। यहाँतक कि जो यह 'अहं' पदका वाच्यार्थ है, वह भी अन्तःकरणके अहंकारांशसे उपहित आत्माका औपाधिक रूप है। अतः वह भी असह्य होनेके कारण निर्ग्राह्य हो जाता है; क्योंकि 'अहं' पदका लक्ष्यार्थरूप जो निरुपाधिक शुद्ध स्वरूप है, वही मन, बुद्धि एवं अहमर्थ और उसके सुखित्व, दुःखित्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि सर्व दृश्यका भासक और मिथ्याभूत समस्त भास्यके बाधका साक्षी, वस्तुतः भास्यभासकातीत, सर्वोपप्लव-विवर्जित, त्रिकालाबाध्य, स्वप्रकाश परमानन्द चिदात्मा है। उसके स्वाभाविक अखण्डानन्दकी अभिव्यक्तिमें 'अहमर्थ' भी प्रतिबन्धक ही है। अभिप्राय यह है कि यद्यपि कुछ दार्शनिकोंके मतमें 'अहं' का वाच्यार्थ ही आत्मा है, जो कि 'अहं कर्ता', 'अहं भोक्ता' 'अहं सुखी', 'अहं दुःखी' इस रूपसे अनुभवमें आ रहा है, अतः उसका नाश आत्माका ही नाश है। मेरी देह, मेरी इन्द्रियाँ, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार—इस प्रकार जो ममताके आस्पद हैं, वे अनात्मा हैं और मेरी बुद्धि सुस्थिर है, मैं अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको निगृहीत करूँगा, इस प्रकार जो 'अहंता' का आस्पद 'अहमर्थ' है, वही शुद्ध आत्मा है। उससे परे जीवका अपना कोई स्वरूप नहीं है, अतः 'अहमर्थ' का नाश करना आत्माका ही नाश करना है। तथापि अभिज्ञ वेदान्तीका सिद्धान्त है कि 'अहं' का वाच्यार्थ आत्मा नहीं है, किंतु लक्ष्यार्थ ही आत्मा है अर्थात् जैसे अग्निके सम्बन्धसे अग्निकी दाहकता, प्रकाशकता आदि शक्तियोंसे युक्त होनेसे लौहपिण्डमें अग्निका भ्रममात्र होता है, शुद्ध निरुपाधिक अग्नि लौहपिण्डसे पृथक् है, वैसे ही आत्माके घनिष्ठ संसर्गसे अहमर्थ (मैं)-में प्रेमास्पदता और चेतनता अधिक प्रतीत होती है, अतएव उसमें आत्माकी भ्रान्तिमात्रता है। वस्तुतस्तु मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा सुख, मेरा दुःख, मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी या केवल मैं, ये सभी भास्य हैं, इनकी प्रतीति होती है, इनका सुस्पष्ट भान होता है। भास्यसे भासक या भान पृथक् ही है। जिस रीतिसे चार्वाक प्रभृतिको देहमें ही आत्मबुद्धि हुई; क्योंकि आत्माके ही पारम्परीण सम्बन्धसे देहमें भी किंचित् चेतनता, इष्टता या प्रेमास्पदता भासित होती है और उसीसे उन अत्यन्त अज्ञ, लौकिक, पामर एवं चार्वाकोंको देह-नाशमें ही आत्म-नाशकी बुद्धि हुई, उसी प्रकार 'अहमर्थनाश' में 'आत्मनाश' की बुद्धि इतर दार्शनिकोंको भी हुई। 'अहं श्यामो', 'अहं गौरः' मैं काला हूँ, मैं गौर हूँ, स्थूल हूँ, कृश हूँ—इस तरह स्थौल्यादि धर्मवान् देहमें जैसे अहमर्थके अभेदका अध्यास होता है, वैसे ही चिज्जडग्रन्थि अहमर्थमें चैतन्यान्दघन भगवान्का अभेदाध्यास होता है। इसी वास्ते सर्वस्पर्शविहीन ('स्पृश्यन्ते इति स्पर्शाः विषयाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार समस्त दृश्य ही स्पर्श हैं) अर्थात् सर्वदृश्यविहीन, परम सूक्ष्म, सर्वावभासक, स्वप्रकाश, चैतन्यान्दघन, परम
७२४ भक्तिसुधा अभय भगवान्में अज्ञोंको भय होता है। देखा जाता है कि प्राणियोंको स्थूल पदार्थोंका ही आधिक्येन भान होता है, इसीलिये नील, पीत, हरित रूपोंकी जैसी स्फुट प्रतीति होती है; वैसी अनेक रूपोंका प्रकाश करनेवाली प्रभाकी स्फुटता नहीं होती। प्रभाका प्रकाश करनेवाले नेत्रालोकका विज्ञान उससे भी अधिक दुर्लभ है। कोई ही यह समझता है कि जैसे प्रभाके न होनेपर रूपका प्रकाश नहीं हुआ और प्रभाके होनेपर रूपका प्रकाश हुआ, अतः प्रभा रूपसे पृथक् है, वैसे ही नेत्र-निमीलन-कालमें प्रभाका भी भान नहीं था और नेत्रोन्मीलन-कालमें प्रभाकी प्रतीति हुई, अतः नेत्रके उन्मीलन-कालमें एक अति सूक्ष्म नेत्रालोक ही प्रभापर व्याप्त होकर प्रभाका प्रकाशन करता है। अस्तु, इसके उपरान्त भी नेत्रालोककी मन्दता और पटुताका प्रकाश करनेवाला मानसालोक (मानस-प्रकाश) नेत्रालोकसे पृथक् ही है, जिससे कि मेरी नेत्र-ज्योति मन्द है या तीव्र है, यह जाना जाता है। मनुष्य मनके काम, संकल्प, संशय आदि अनेक विकारोंको जानकर निश्चयात्मिका बुद्धिसे निश्चय करता है कि मैं स्थिर बुद्धिसे मन और उसके विकारोंको निरुद्ध करूँगा। यहाँ स्पष्टतया तीनों अंशोंकी प्रतीति होती है—जिसका निरोध या नाश करेंगे, वह मन और उसके संशयादि विकार, जिससे निरोध करेंगे, वह साधनरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि जिसके विषयमें उसकी बुद्धि मन्द या अत्यन्त सूक्ष्म है, इस तरहके अनुभव होते हैं और जो बुद्धिद्वारा मनका निरोध करनेवाला है, वह 'अहं' अर्थात् 'मैं'। इसी प्रकारसे 'अहं बुद्ध्या मनः संयच्छामि' (मैं बुद्धिसे मनका नियन्त्रण करूँगा) ऐसे अनुभवमें 'मैं', 'बुद्धि' और 'मन' इन तीनोंकी प्रतीति होती है। अतः ये सभी तो प्रतीतिके विषय हो गये, इनकी प्रतीति या भान इनसे अवश्य पृथक् है; क्योंकि एकमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकता। इसीलिये प्रकाश्यसे प्रकाशक भिन्न होता है, यह बात लोकमें प्रसिद्ध है। प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान 'स्वयंप्रकाश' कहा जाता है। मन, बुद्धि और 'मैं' का भासक, अकेला शुद्ध भान तो भास्य न होनेसे स्वयंप्रकाश है। अतः यह भान ही सर्वदा प्रकाशान्तर-निरपेक्ष भासमान होकर स्थिर है और तदतिरिक्त सभी भास्य अस्थिर हैं। इसीलिये जाग्रत् और स्वप्नमें 'अहं' और 'बुद्धि' एवं 'मन' यद्यपि उपलब्ध होते हैं, परंतु सुषुप्तिमें इन सबका अभाव हो जाता है। उस समय भी जाग्रत् और स्वप्नमें सकल दृश्यके भावका और सुषुप्तिमें समस्त व्यक्त दृश्यके अभावका प्रकाश करनेवाला एवं सर्व दृश्यके विलयनका आधारभूत, सुषुप्ति एवं गाढ़ निद्रा या अज्ञानका भासन करनेवाला, कूटस्थ भानरूप आत्मा ही विराजमान रहता है। इसीका संकेत भागवतमें इस तरह किया है— सन्ने यदीन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ (श्रीमद्भा० १२।३।३२) स्वयं श्रुतिने इस तथ्यका प्रकाश किया है— 'नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्य- यमहमस्मीति।' (छान्दोग्य० ८।११।१) इस प्रकार अखण्ड, अनन्त, परमसूक्ष्म वस्तुका बोध अत्यन्त दुर्लभ है। जिन स्थूल पदार्थोंका बोध प्राणियोंको है, उनके नाशमें सर्वनाश या आत्मनाशकी प्रतीति होनी युक्त ही है। इसीलिये श्रीगौडपादाचार्य भगवान् कहते हैं कि—'अस्पर्शयोगो वै नामैष दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः। योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः॥' (माण्डुक्य० ३९) सर्वस्पर्श, सर्वदृश्य- सम्बन्धसे रहित, भास्य-विवर्जित, परमसूक्ष्म, अखण्डानन्दरूप काल्पनिक सर्वभाव तथा अभावोंका भासक, कूटस्थ भानस्वरूप आत्मा तत्त्वज्ञसे भिन्न समस्त योगियोंके लिये दुर्दर्श है; क्योंकि दृश्य ही जिनका सर्वस्व है, दृश्यसे भिन्न स्वप्रकाश अखण्डानन्द द्रष्टापर जिनकी कभी दृष्टि गयी ही नहीं, उन्हें दृश्यके नाशसे परमानन्दसुधासिन्धुके सर्वतोभावेन
भरपूर होनेपर भी सर्वस्वनाश होनेकी ही प्रतीति होती है। किसी भिक्षुकीके सौन्दर्यपर मुग्ध होकर किसी सम्राट्ने उसे साम्राज्ञी होनेको कहा; किंतु भिक्षुकी यह समझकर कि हमारी भिक्षा माँगनेकी सामग्री और भिक्षाका आनन्द चला जायगा, साम्राज्ञी बननेसे डर गयी। कारण कि साम्राज्ञीके सुखकी कल्पना कभी उसकी दृष्टिमें हुई ही नहीं, उसे तो भिक्षा और उसके ही आनन्दका सर्वदा संस्कार रहा। ठीक इसी तरह जिन्हें कभी अखण्डानन्दमय, निर्विकार दृक्के अनन्त सौख्यकी अनुभूति हुई ही नहीं, केवल कटु दृश्यके ही अक्षुण्ण संस्कार प्राप्त हो रहे हैं, उनको दृश्य ही सरस प्रतीत होता है। परमात्मस्वरूप उन्हें उद्वेजक प्रतीत होता है। जैसे सेंधा नमकका ढेला पानीमें मिल जानेसे नष्ट हुआ कहा जाता है, वास्तवमें उपाधिके साथ संसर्ग मिटनेसे केवल उसका औपाधिक रूप ही मिटता है, वैसे ही पंचकोशादि उपाधि मिटनेसे चेतनमें तत्कृत अवच्छेद ही मिटता है, आत्मतत्त्व शुद्ध निर्विकार भानरूपमें तो विद्यमान ही रहता है। जैसे नीमके कीड़ेको नीममें ही स्वाद आता है और मिसरी या चीनीमें उसे उद्वेग होता है, वैसे ही दृश्य-रागीको अत्यन्त कटु दृश्यमें ही प्रीति होती है। सर्व दृश्य- रूप उपद्रवसे रहित, परमानन्दघन भगवान्से उसे घबराहट होती है। जैसे पुत्र कलत्रादि कुटुम्बके अनुरागी विषयी प्राणियोंको स्वर्ग या वैकुण्ठ भी रुचिकर प्रतीत नहीं होता, वैसे ही सप्रपंच सुखके रागियोंको निरावरण अद्वैतानन्दमें रुचि नहीं होती। इसीलिये वे अद्वैत, अखण्ड, अनन्त, ब्रह्मानन्दरूप मुक्तिसे घबराते हैं। किसी-किसीका तो यहाँतक कथन है कि चाहे वृन्दावनमें शृगाल भले ही हो जायें, परंतु अद्वैतियोंका निर्विशेष मोक्ष हमें नहीं चाहिये। ठीक ही है, विषयीका तो सर्वस्व विषय ही है। अतः जहाँ विषयका अत्यन्त अभाव हो, ऐसे ब्रह्म या मोक्षसे उसका क्या सम्बन्ध ? जिस मोक्षमें नृत्य, वादित्र, गीत और सरस रूप एवं मधुररसकी अनुभूति नहीं, ऐसे नीरस, निर्विषय मोक्षमें उन्हें शुष्क पाषाण-बुद्धि क्यों न हो? वस्तुतः यह उनके संस्कारोंका ही दोष है। सप्रपंच, सातिशय, क्षुद्र साधन-परतन्त्र सुखका ही उन्हें अनुभव है। उन्हींमें उन्हें संस्कार या राग है तो फिर तद्विलक्षण, निष्प्रपंच, निरतिशय, अनन्त, स्वतन्त्र, आनन्दाम्बुधिकी कल्पना भी उनके मनमें कैसे हो? ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता अति स्वल्प भी विवेचन करनेपर विवेकियोंको निरायास, निष्प्रपंच, अपरिच्छिन्न आनन्दकी महत्ताका ज्ञान हो जाता है। जब किसी रसिकको अत्यन्त अभिलषित रसमय पदार्थ एवं रसमयी कान्ताकी प्राप्ति होती है, तब किंचित् काल उसे अत्यन्त हर्ष होता है। परंतु अन्तमें उसे छोड़कर वही पुरुष सोनेके लिये प्रवृत्त होता है। क्यों? यह क्या बात है? जिस प्रियतमा कान्ताके मिलनके लिये पहले उसे इतनी व्यग्रता, इतनी व्याकुलता थी, आज उसी प्रेयसीके सम्मिलनमें केवल उसीमें उसकी तल्लीनता होनी चाहिये, पर अब वह निद्राको बुलाता है। मनुष्यकी तो कौन कहे, ब्रह्मा और विष्णुकी भी जिनके सन्निधानमें दिव्यातिदिव्य रमण-सामग्रियाँ विद्यमान हैं, द्वैत प्रपंचमें जितनी भी उच्च-से-उच्च कोटिकी सौख्य-सामग्रियाँ हैं, वे सभी वहाँ विद्यमान हैं, फिर भी उन अद्भुत सप्रपंच सौख्योंको छोड़कर सुषुप्तिमें क्यों प्रवृत्ति होती है? इसीलिये कि वहाँ निष्प्रपंच, अद्वैत सुखकी अनुभूति होती है, जिनकी एक छायामात्र ही सातिशय प्रपंच सुखमें परिलक्षित होती है। किं बहुना भगवद्भावापन्न, अत्यन्त उच्च कोटिके अनुरागी, जिन्हें अपने प्रियतम प्राणधनके वियोगमें मरणसे भी अनन्त कोटि गुणित संताप होता है; जिनके क्षणमात्रके प्रियतम-वियोगजन्य तीव्र तापको निरीक्षण करके अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त पाप यह सोचकर संतापसे दुर्बल हो जाते हैं कि हम सभी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त प्राणियोंके
अनन्त पाप एकत्रित होकर भी, अनन्त कल्पोंमें भी रौरवादि महानरकोंद्वारा इतना सन्ताप नहीं सम्पादन कर सके, जितना सन्ताप (कष्ट) इन्हें एक क्षणके प्रियतम-वियोग-जन्य तीव्र तापमें हुआ है। जिन प्रेमियोंको केवल ध्यानमें प्राप्त प्रियतमके मानस आलिंगनमें ऐसा अद्भुत आनन्द होता है, जिसे देखकर अनन्त ब्रह्माण्डके पुण्यपुंज यह सोचकर क्षीण हो जाते हैं कि हम सभी पुण्य मिलकर भी क्या अनन्त कल्पोंमें किसीको इतना आनन्द दे सकते हैं, जितना आनन्द इन्हें अपने प्रियतमके मानस परिष्वंगसे एक क्षणमें हुआ है? वे ही प्रेमी सौभाग्यवश जब अपने प्रियतमके चिर अभिलषित उस मंगलमय धाममें पहुँच जाते हैं, जहाँ-कहीं मरकतमयी भूमिपर सुवर्णवर्णा लतावल्ली एवं अद्भुत अनन्त ज्योतिर्मय वृक्ष हैं। कहीं कनकमयी भूमिपर मरकतमयी लताप्रतान एवं परम मनोहर श्यामल दूर्वाएँ हैं। अपनी दिव्य दीप्तियोंसे सूर्य-चन्द्रकी दीप्तियोंको भी तिरस्कार करनेवाले मणि तथा रत्न प्रकाश कर रहे हैं, हंस, सारस, कारण्डव, पिकादि कलरव कर रहे हैं; कहीं नाना प्रकारके अद्भुत खग-मृग विचरते हैं। कहीं मरकत मणियोंके समान वृक्षोंपर कनकमयी वल्लियाँ शोभायमान हो रही हैं, कहीं कनकमय मंजुल-कुंजोंपर मरकतमयी लताएँ विराजमान हैं, कहीं पद्मराग मणिके वृक्ष स्फटिकमयी लताओंसे परिवेष्टित हैं और अनेक प्रकारकी विचित्र मणिमयी शाखाओंसे शोभित हो रहे हैं। प्रत्येक शाखा अद्भुत अनन्त रंगोंके विचित्र मणिमय पल्लवोंसे भूषित है। प्रत्येक पल्लव नाना रंगोंके पुष्पस्तबकोंसे शोभायमान है तथा प्रत्येक पुष्पपर नाना प्रकारके सौगन्ध्यमधुलुब्ध भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे दीप्यमान प्रकट पुष्पोंसे शोभित मधुमयी मनोरम लताएँ विलक्षण शोभा फैलाती हैं। समस्त वृक्ष और लताएँ एक कालमें ही मुकुलित, प्रफुल्लित, फलित एवं पक्व फलोंसे भी युक्त हो रहे हैं। वहाँके अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्यादि गुणोंका वर्णन शारदाके लिये भी अशक्य है। ऐसे मंगलमय धाममें प्रेमी अपने सर्वस्व चिराभिलषित प्रियतमका परिष्वंग करके फूले नहीं समाते हैं। परंतु यदि प्रियतम और उनकी मंगलमयी लीलाकी मंजु सामग्री अखण्ड अनन्त आनन्दस्वरूप ही है, तब तो उस अपरिमित रसके आस्वादनसे उनको विरति नहीं हो सकती; क्योंकि वह अद्वैत आनन्दैकरस ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं। यदि वस्तुतः पारमार्थिक अखण्डैकरस अद्वैत आनन्दसे पृथक् है, तब तो वही बात हुई कि जैसे लोकमें किसीको दुष्प्राप्य धवलधाम और मनोहर उद्यान देखकर उनकी प्राप्तिके लिये बड़ी उत्कण्ठा होती है और उनके मिलनेपर कुछ क्षण बड़ा हर्ष भी होता है, परंतु कुछ ही कालमें चित्त अन्य विषयोंके चिन्तनमें व्यग्र हो जाता है और वे समस्त सौख्य-सामग्रियाँ सामने होनेपर भी अपना प्रभाव उसके चित्तपर नहीं डाल सकतीं। फिर तो वह और ही चिन्तामें ग्रस्त हो जाता है। दूसरेकी दृष्टिमें वह बहुत सुखी होनेपर भी अपनी दृष्टिमें दुःखी होता है। ठीक वैसे ही थोड़ी देरमें नाना प्रकारके रसास्वादनके अनन्तर मन कुछ और चाहने लगता है। वहाँ भी यदि नींदमें बाधा पड़ी, तब तो प्रजागर दोष समझा जाने लगता है। कहनेका आशय यही है कि प्रियतमासे मिलकर भी प्रेमीकी सोनेके लिये प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः जिनके पास जितनी अधिक भोग-सामग्री है, वे उतना ही अधिक सोनेमें प्रवृत्त होते हैं। यह सब इसीलिये कि चाहे कितना ही सुख क्यों न हो, परंतु वह दुःखरूप ही है। दृश्यदर्शनमें श्रम है, अतः उससे परिश्रान्त होकर प्राणी निरायास, अखण्ड, आनन्द ब्रह्ममें विश्रान्ति चाहता है। वास्तवमें सभी तत्त्व अपने अधिष्ठानभूत परमात्मासे वियुक्त होकर संतप्त होते हैं। जैसे किसी सूत्रमें बँधा हुआ कोई पक्षी प्रतिदिशामें भ्रमण करनेसे परिश्रान्त होकर विश्रान्तिके लिये बन्धनसूत्रके आश्रय काष्ठका ही
वेदान्तरससार ७२७ समाश्रयण करता है, वैसे ही नाना प्रकारके कर्मोंसे परतन्त्र होकर जीव जाग्रत् एवं स्वप्नकी अवस्थाओंमें स्वाश्रयभूत प्रभुसे वियुक्त होकर भिन्न-भिन्न विषयोंमें भटकता है। जाग्रत् एवं स्वप्नके हेतुभूत अविद्या, काम कर्मोंके क्षीण होनेपर वह पुनः विश्रान्तिके लिये भगवान्का ही अवलम्बन करता है। श्रुतियोंमें जीवको प्रभुका अंश बतलाया है और कहा है कि जैसे अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारी)-का निर्गम होता है, उसी तरह परमात्मासे जीवोंका निर्गम होता है। 'यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति।' (बृहदारण्यक० २।१।२०) अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता निष्कल, निरवयव, अखण्ड, अनन्त परमात्मामें छेदन-भेदनादिद्वारा किसी तरहसे भी खण्ड होना असम्भव होनेसे मुख्य अंश-अंशिभाव तो सम्पन्न नहीं होता। अतः काल्पनिक अंश-अंशिभाव लोग मानते हैं। अन्यान्य लोग कहते हैं कि जैसे चन्द्रमाका शतांश गुरु है, वैसे ही परमात्माका अंश जीव है। इनके मतमें 'तत्सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वम्' यही अंश-कथनका आशय है। परंतु अद्वैतवादियोंका कहना है कि चन्द्रमाका और गुरुका अंश-अंशिभाव बहुत बाह्य एवं औपचारिक है। अतएव शुक्रका चन्द्रमासे उद्गम न होनेसे उसके साथ शुक्रका कोई विशेष सम्बन्ध होना सिद्ध नहीं होता, किंतु परमात्मासे उद्गम और उससे विशेष सम्बन्ध रखनेवाले जीवका अंश-अंशिभाव अन्तरंग ही होना चाहिये। अतः जैसे घटोपाधिसे घटाकाश महाकाशका अंश कहा जाता है, वायु उपाधिसे तरंग महासमुद्रका अंश है, उसी तरह अविद्या या अन्तःकरण उपाधिसे जीव परमात्माका अंश कहा जाता है। उपाधियोंके विक्षोभमें उपहितका अनुपहितसे पार्थक्य और उनकी उपशान्तिमें उपहितका अनुपहितसे ऐक्य होता है। जिस समय आकाशसे वायु-जलादि क्रमेण घट उत्पन्न होता है, उस समय घटाकाशकी उत्पत्ति एवं महाकाशसे उसके पार्थक्यकी प्रतीति होती है। घटका विलयन होनेपर घटाकाशका महाकाशके साथ सम्मिलन प्रतीत होता है। वायुके स्पन्दनकालमें महासमुद्रसे तरंगकी उत्पत्ति एवं उसकी समुद्रसे भिन्नता प्रतीत होती है और वायुके निःस्पन्दनकालमें तरंगका विलयन प्रतीत होता है। निरावरण तथा द्रवीभूत जलकी अभिव्यक्तिमें बिम्बसे प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति एवं बिम्बसे भिन्नता प्रतीत होती है और जलके सावरण होनेपर या शैत्ययोगसे घनीभूत होनेपर प्रतिबिम्बकी बिम्बभावापत्ति होती है। इन सभी उदाहरणोंसे केवल यही बात दिखलायी जाती है कि जैसे स्वभावसे घटाकाश, तरंग तथा प्रतिबिम्ब महाकाश एवं महासमुद्र बिम्बसे पृथक् नहीं हैं, उनसे भिन्नता एवं विलक्षणता उपाधियोगसे प्रतीत होती है, वैसे ही जीव स्वभावतः ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसमें भिन्नता एवं परमात्मासे विलक्षणता केवल उपाधियोंसे प्रतीत होती है। जैसे महाप्रलयमें समस्त प्रपंच समष्टि सबीज ब्रह्ममें विलीन होता है, वैसे ही सुषुप्तिमें भी समस्त प्रपंचका विलयन श्रुतिने कहा है। 'सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति।' (कैवल्योपनिषत् १३) अतः सुषुप्तिमें उपाधियोंके विलीन होनेपर तमस्से अभिभूत जीव परमात्मासे मिलता है। जबतक जल मलिन एवं द्रुत रहता है, तबतक उसकी मलिनता एवं चंचलतासे प्रतिबिम्ब भी मलिन एवं चंचल प्रतीत होता है। ऐसे ही अन्तःकरण जबतक मलिन एवं चंचल-स्वरूपेण व्यक्त रहता है, तबतक उसमें प्रतिबिम्बित चिदानन्दतत्त्व भी उसकी मलिनता तथा चंचलतासे मलिन तथा चंचल रहता है। यही बात 'ध्यायतीव लेलायतीव' (बृहदारण्यक० ४।३।७) इस श्रुतिमें कही गयी है। परंतु जिस समय अविद्यापरिणाम अन्तःकरण अविद्यामें विलीन हो जाय या निद्रारूप गाढ़ आवरणसे आवृत हो जाय, उस समय जैसे जलके सावरण एवं घनीभावमें
प्रतिबिम्ब बिम्ब ही हो जाता है, बिम्बसे पृथक् रहता ही नहीं, अतः उससे किसी प्रकारके अनर्थका सम्बन्ध नहीं होता; ठीक वैसे ही सुषुप्तिमें जीव परमात्मामें मिल जाता है, पृथक् उसका स्वरूप ही नहीं रहता। अतएव किसी प्रकारके अनर्थका योग उस समय उसको नहीं होता। इसीलिये श्रुति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छान्दोग्य० ६।८।१) इत्यादि वचनोंसे उस स्थितिको स्पष्ट सिद्ध कर रही है। (अभिप्राय यह है कि निर्मल, निश्चल तथा निरावरण जलपर सूर्यादिका प्रतिफलन स्फुटरीतिसे होता है। तद्वत् निर्मल, निश्चल और निरावरण चित्तपर चिदात्मतत्त्वका प्रतिफलन भी स्फुटरीतिसे होता है। जैसे मलिन, चंचल तथा सावरण जलपर सूर्यादिके प्रतिफलनका अवरोध होता है; वैसे ही मलिन, चंचल और सावरण अन्तःकरणपर चिदात्मतत्त्वके प्रतिफलनका अवरोध होता है। रजःकण, वायु आदिके आघात और सेवारादिके योगसे जल मलिन, चंचल तथा सावरण होता है। तद्वत् तमस्, रजस् और गाढ़ तमस्के योगसे अन्तःकरण मलिन, चंचल और घनीभूत सावरण होता है। मलिन जल ही नहीं, अपितु निर्मल जल भी प्रवाह और वायु आदि निमित्तक आघातके योगसे चंचल होता है। कर्म और वासनात्मक कुत्सित संस्कार एवं मृदु तथा मध्यम तमोगुणके योगसे चित्त मलिन होता है। शुद्ध या अशुद्ध संकल्प-विकल्पके अविरल आघातसे चित्त चंचल होता है। तमोगुणकी प्रगल्भताकी दशामें चित्त मलिन, घनीभूत और निःसंकल्पताके कारण निश्चल होता है। सुषुप्तिमें बीजभावापन्न अवधारणस्वभाव घनीभूत चित्तमें तादात्म्यापन्न चिदात्माकी प्राज्ञ संज्ञा होती है।) जीव जाग्रत् और स्वप्नमें कर्मोंके वश होनेसे अद्वैत निष्प्रपंच परमात्मसुखसे वंचित होकर द्वैतरूप दुःखसागरमें भटकते-भटकते परिश्रान्त हो जाता है और विश्रान्तिके लिये फिर कर्मोंके उपरत होनेपर 'सत्' पदवाच्य सबीज परमात्मामें मिलता है। अतः दृश्यमें, द्वैतमें वस्तुतः सुखका लेश भी नहीं है, केवल अज्ञोंने भ्रान्तिसे उसमें सुखकी कल्पना की है। श्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता लौकिक विषयानन्दमें भी जहाँ जितना भेद- भाव मिटता है, वहाँ उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। चंचल चित्तमें अधिक मात्रामें द्वैतका भान होता है, अतः उस अवस्थामें अधिक दुःख होता है। अभिलषित विषयकी प्राप्तिमें तृष्णाकण्टकके अपगमसे चित्तमें स्वस्थता, एकाग्रता एवं कुछ अन्तर्मुखता होती है, कुछ मात्रामें द्वैत मिटता है, अतएव कुछ मात्रामें आनन्दकी प्राप्ति होती है। समाधिमें द्वैतकी प्रतीति अधिक मिटती है, अतएव वहाँ अधिक आनन्द मिलता है। सौषुप्तसुखके भी उत्कर्षमें द्वैतकी अप्रतीति हेतु है। अतएव वहाँ दृष्टान्त भी उसी ढंगका है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) अर्थात् जैसे प्रियतमासे विप्रयुक्त कोई नायक चिरकालसे अभिलषित अपनी प्रेयसीकी प्राप्ति होनेपर उसके परिरम्भणसे आनन्दोद्रेकमें बाह्य-आभ्यन्तर सर्वविध दृश्यको भूल जाता है; जगत् क्या है, मैं क्या और कहाँ हूँ, इसका उसे ज्ञान ही नहीं रहता, वैसे ही जाग्रत् एवं स्वप्नके द्वैत प्रपंचसे उद्विग्न जीव भी निष्प्रपंच प्राज्ञ परमात्माके परिरम्भणसे दृश्य क्या और कहाँ है और मैं क्या हूँ, इत्यादि आन्तर-बाह्य सब प्रकारके प्रपंचको भूल जाता है। दुःखरूप द्वैतमें केवल अपेक्षाकृत सुखकी कल्पना है। रज-तमके उद्रेकमें तृष्णा, मोह-विषादका विस्तार होता है। उसकी अपेक्षा सत्त्वके उद्रेकसे अन्तर्मुखतामें अर्थात् द्वैत-प्रतीतिकी कमीमें सुखका व्यवहार होता है और तो क्या कहें, अनन्तकोटि
वेदान्तरससार ७२१ ब्रह्माण्डनायक भगवान्को भी दृश्यकी प्रतीतिमें सन्ताप ही होना है। अतएव श्रुतिने कहा है कि ‘द्वैतका ज्ञान होना ही परमात्माका तप है’—‘यस्य ज्ञानमयं तपः’ (मुण्डक० १।१।९)। जैसे हम सबके लिये कृच्छ्रादिरूप तप है, वैसे ही परमात्माके लिये द्वैत ज्ञान ही तप है। यह ठीक ही है; क्योंकि जो बात बहिर्मुखोंके लिये नगण्य है, वही अन्तर्मुखोंको और ही प्रकारसे अनुभूत होती है। देखते ही हैं कि और अंगोंमें दण्डके आघातसे भी उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि नेत्रमें ऊर्णा तन्तुके निक्षेपसे होता है। जिन दोषों एवं दृश्य-प्रतीतियोंसे बहिर्मुखोंको कुछ भी सन्ताप नहीं होता, उन्हींसे अन्तर्मुख योगियोंको बहुत विक्षेप होता है। तो फिर योगेश्वर भगवान्के लिये दृश्यदर्शन कृच्छ्रादिकोंकी तरह घोर तप हो तो इसमें क्या आश्चर्य है ! कठोरोंके लिये जो कुछ नहीं, वही सुकुमारोंके लिये बहुत है, इसीलिये आचार्योंने कहा है कि— निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ (भामती-मंगलाचरण २) अर्थात् भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, वीक्षणसे ही पंचभूतोंकी सृष्टि होती है, स्मित (मन्दहास)-से ही सकल चराचर जगत् बन जाता है और प्रभुकी सुषुप्तिमें ही समस्त प्रपंचका प्रलय हो जाता है। प्रभुके वीक्षण एवं मन्दहास (मुसकराहट)-से कितने अद्भुत अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका प्राकट्य होता है। प्रभुके वीक्षणादिमें जैसा अद्भुत प्रभाव है, वैसे ही प्रभुकी सुकुमारता भी अद्भुत है। अतः वीक्षणमें ही उन्हें इतना श्रम तथा कष्ट होता है कि वही तप हो जाता है। बस, वीक्षण और मन्दहासमें ही परिश्रान्त होकर वे विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिमें पहुँच जाते हैं। वीक्षण करके थोड़ा-सा मुस्करा देना और सो जाना, बस इतना ही उनका कार्य है। अब सहृदय महापुरुष कल्पना करें कि अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान्को भी जब वीक्षण और मुसकराहटके अनन्तर ही विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिकी आवश्यकता है, तब फिर द्वैतमें सुख है या अद्वैतमें? द्वैतमें चाहे जहाँ भी जितना भी जो कुछ भी सुख है, वह निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखकी अपेक्षा न्यून ही नहीं, अपितु दुःखरूप है। सर्व- सौख्य-सम्पन्न द्वैतदर्शनसे उद्विग्न होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् विश्रान्तिके लिये अद्भुत अद्वैत सुखका समाश्रयण करते हैं, फिर उनके भक्तोंको दुःखरूप द्वैतमें ही आनन्द हो, यह कैसे हो सकता है? अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त जीवों एवं उन सबके नियामक तथा आराध्य भगवान्को द्वैतदर्शनमें सुखका लेश भी नहीं है। जो कुछ भी सुखकी कल्पना है, वह केवल राजस-तामस भावोंके उद्रेकसे चांचल्य और द्वैतदर्शनके आधिक्यरूप दुःखकी अपेक्षासे ही है। जितनी-जितनी प्रपंचकी निवृत्ति एवं अन्तर्मुखता होती है, उतने-उतने अंशोंमें सुखकी कल्पना है। सुषुप्तिमें द्वैतदर्शनकी पर्याप्त निवृत्ति होती है, अतः वहाँ सुख भी पर्याप्त होता है। इसीलिये जीव और उनके भगवान् दोनोंकी प्रवृत्ति स्वरूपभूत निष्प्रपंच सुखके लिये होती है। जिस जीवको एक दिन नींद नहीं आती, वह घबरा जाता है और उसे प्रजागर दोष समझकर नींदके लिये सहस्रों उपचार करता है। उस समय चाहे कितनी भी दिव्यातिदिव्य सौख्यसामग्रियाँ क्यों न प्राप्त हों, सब-की-सब बेकार प्रतीत होती हैं, उनकी प्रतीति भी खटकती है, परंतु सब कुछ छोड़कर केवल सोनेके लिये ही जीव व्यग्र हो उठता है। यह क्या निष्प्रपंच अद्वैत सुखकी महत्ता नहीं है? अब कृतप्रज्ञ यह सोच सकते हैं कि जब सावरण निष्प्रपंच अद्वैत सुखमें सबका इतना आकर्षण है, तब निरावरण, निरतिशय, निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखमें सभीका कितना प्रेम होगा? यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि सौषुप्त निष्प्रपंच ब्राह्मसुख सावरण एवं सबीज है, इसीलिये इसे प्राप्तकर भी जीवोंका
७३० भक्तिसुधा पुनरुत्थान होता है और जीवोंको ही कर्मफल देनेके लिये लीलया भगवान्का भी उत्थान होता है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे जिन लोगोंके अज्ञानरूप बीजकी निवृत्ति होती है, उन निर्बीज ब्रह्मभावापन्नोंका पुनरुत्थान नहीं होता। सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता सबीजसे ही समस्त प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है—जैसे अखण्ड, अनन्त नभोमण्डलमें एक अतिक्षुद्र मेघका अंकुर होता है, उसी तरह अनन्त, अखण्ड, परिपूर्ण, परमानन्द स्वप्रकाश भगवान्के अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्त अचिन्त्य दिव्य महामाया शक्ति होती है। उसके भी अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-जननी अनन्त अवान्तर शक्तियाँ होती हैं। एक-एक शक्तिमें सत्त्व, रज, तमके प्राधान्याप्राधान्यसे विद्या-अविद्या तामसी प्रकृति आदि अनेक भेद हो जाते हैं। रज और तमके लेशसे भी अनाक्रान्त अतएव विशुद्धसत्त्वप्रधाना शक्तिको माया या विद्या कहते हैं एवं रज तथा तमसे संस्पृष्ट अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना शक्तिको अविद्या कहते हैं और तमःप्रधाना शक्ति तामसी प्रकृति कही जाती है। यद्यपि कहीं-कहीं मूल प्रकृतिमें भी माया और अविद्या पदका प्रयोग होता है, जैसे 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' (श्वेताश्वतर० ४।१०) 'माया स्वाव्यतिरिक्तानि परिपूर्णानि क्षेत्राणि दर्शयित्वा जीवेशावाभासेन करोति माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ९) इत्यादि तथापि उसे कार्य और कारणके अभेदसे औपचारिक समझना चाहिये। जैसे मीमांसक गोविकार पयमें भी गो- पदका प्रयोग उपचारसे मानते हैं, यथा—'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' वैसे ही कहीं कार्यका प्रयोग कारणमें हो जाता है। अतः मूल महाशक्तिकी अवान्तर शक्तियोंके विभागमें विद्या-अविद्या आदि पदोंका प्रयोग शास्त्रसम्मत है। विद्या या मायारूप उपाधिसे उपहित चैतन्य ईश्वर-चैतन्य है और अविद्या उपाधिसे उपहित चैतन्य जीव-चैतन्य है। तामसी प्रकृतिसे भोग्यवर्गका प्रादुर्भाव होता है। इस तामसी प्रकृतियुक्त परमात्मासे महत्तत्त्व एवं महत्तत्त्वसे अहंतत्त्वकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि श्रुतियोंमें 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः।' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि वचनोंद्वारा सीधे परमात्मासे ही आकाशकी उत्पत्ति होना प्रतीत होता है तथापि—'बुद्धेरात्मा महान् परः ॥,' 'महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।' (कठ० १।३।१०-११) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि 'परमात्मा और उनकी शक्ति अव्यक्तके अनन्तर एवं आकाशके पहले महत्तत्त्व तथा अहं तत्त्व नामक पदार्थ भी हैं।' गीताने भी 'महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।' (गीता १३।५) इस श्लोकसे अपंचीकृत (परस्पर असम्मिलित) आकाशादि पृथिव्यन्त पंचमहाभूत एवं अहंकार (अहंतत्त्व), बुद्धि (महत्तत्त्व) तथा 'अव्यक्त तत्त्व' इन आठ प्रकृतियोंके रूपमें उन्हींका वर्णन किया है। उन्हींका 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥' (गीता ७।४) इस श्लोकमें भी वर्णन किया है। इस श्लोकमें मन शब्दसे आकाशके कारण अहंतत्त्वको ही समझना चाहिये, बुद्धि पदसे अहंतत्त्वका कारण महत्तत्वको समझना चाहिये और अहंकारसे महत्तत्त्वका कारण अव्यक्तको समझना चाहिये; क्योंकि ऐसा ही प्रकृति-विकृतिभाव सर्वत्र प्रसिद्ध है। यथाश्रुत मन, बुद्धि एवं अहंकारका कार्य-कारण भाव कहीं भी प्रसिद्ध नहीं है और यहाँ 'भिन्ना प्रकृतिरष्टधा' से भिन्न-भिन्न आठ प्रकृतियाँ विवक्षित हैं। यह तभी सम्भव है, जब भूमिको जलसे, जलका अनल (तेज) से, अनलका वायुसे एवं वायुका आकाशसे, आकाशका अहंतत्त्वसे, उसका महत्तत्त्वसे और महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्वसे आविर्भाव माना जाय। अतएव 'महाभूतान्यहङ्कारो
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बुद्धिरव्यक्तमेव च' (गीता १३।५) इस गीता- वचनमें स्पष्ट ही अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्वका वर्णन है। इस तरह श्रुति-स्मृतिके तात्पर्य-विवेचनसे स्पष्ट विदित होता है कि साक्षात् परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति नहीं हुई, अपितु महत्तत्त्व आदिके क्रमसे ही हुई है। अतएव जहाँ- कहीं सतत्त्व परमात्मासे सीधे तेजकी ही उत्पत्ति श्रुत है, वहाँ भी आकाश एवं वायुकी उत्पत्तिके अनन्तर आकाश-वायुरूपमें आविर्भूत परमात्मासे तेजकी उत्पत्ति समझनी चाहिये। श्रुतियोंमें जो 'तदैक्षत एकोऽहं बहु स्याम्' (छान्दोग्य० ६।२।३)परमात्माने ईक्षण=निरीक्षण (विचार) किया कि एक मैं बहुत हो जाऊँ इत्यादि रूपसे ईक्षण और अहंका उल्लेख मिलता है, इससे भी अहंतत्त्व एवं महत्तत्त्वका ही द्योतन होता है। किसी कार्यके निर्माणमें ज्ञान एवं अहंकारकी आवश्यकता होती है। व्यष्टिद्वारा ही समष्टि-भाव समझे जाते हैं। समष्टि-तत्त्वको बुद्ध्यारूढ़ करनेके लिये प्रथम व्यक्तिका ही अवलम्बन करना पड़ता है। इसी वास्ते श्रुतिने ही 'स एकाकी न रेमे स द्वितीयमैच्छत्' (उस पुरुषको एकाकी होनेके कारण अरति हुई) इसी कारण अब भी प्राणियोंको अकेले होनेपर रमण, आनन्द नहीं होता। 'तस्मादेकाकी न रमते' (बृहदारण्यक० १।४।३) ऐसा कहा है। यही कारण है कि उपासनाओंमें जैसे प्रत्यक्ष शालग्राममें अप्रत्यक्ष विष्णुकी बुद्धि की जाती है, वैसे ही प्रत्यक्ष व्यष्टि जाग्रत्-अवस्था एवं स्थूल शरीराभिमानी विश्वमें समष्टि स्थूल प्रपंचाभिमानी वैश्वानरकी दृष्टि एवं व्यष्टि, स्वप्नावस्था एवं सूक्ष्म शरीराभिमानी तैजसमें समष्टि सूक्ष्म प्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भकी दृष्टि तथा व्यष्टि सुषुप्ति अवस्था एवं अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी प्राज्ञमें समष्टि-अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी कारण ब्रह्मरूप सर्वान्तर्यामी सर्वेश्वरकी दृष्टि कही गयी है। इससे विपरीत विराट्में विश्व-दृष्टि नहीं कही गयी; क्योंकि समष्टि अप्रत्यक्ष है। आकाशके एक देशमें बादलकी एक छोटी-सी टिकुली देखकर आकाशव्यापी महामेघमण्डलकी कल्पना की जाती है। जैसे स्वल्प परिमाणवाले दीप्तिमान् अग्निको देखकर अखण्ड ब्रह्माण्डव्यापक दीप्तिमान् अग्निकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अनुभूत व्यष्टि अज्ञान एवं ज्ञान तथा अहंकारसे समष्टि अज्ञान तथा महत्तत्त्व एवं अहंतत्त्वका भी बुद्धिमें आरोहण हो सकता है। समस्त तत्त्व क्रमशः परमात्मासे उत्पन्न और उसीमें लीन होते हैं। सुषुप्तिमें भी प्रपंचका लय प्रतीत होता है। हम स्पष्ट रूपसे देखते हैं कि घोर सुषुप्तिमें सोया हुआ पुरुष न कुछ जानता है, न उसे अहंकार होता है और न वह कुछ कार्य कर सकता है; क्योंकि समस्त इन्द्रियगण और अहंकार उस समय अज्ञानमें लीन होते हैं। 'सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते' (श्रीमद्भा० ११।३।३९) इसी वास्ते सुषुप्ति-अवस्थामें रहनेवाला आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा प्रजापतिके उपदेशको सुनकर इन्द्रको यही अनुपपत्ति प्रतीत हुई थी कि सुषुप्तिमें अपने या दूसरे किसीका तो ज्ञान होता नहीं, फिर इसमें पुरुषार्थ ही क्या है ? यहाँ भी अहंकारादिका आत्यन्तिक लय नहीं है; क्योंकि जागरमें उनकी पुनः प्रतीति होती है। अस्तु, यह तो बहुत ही प्रसिद्ध है कि सुषुप्ति दशामें जीवको कुछ भी ज्ञान नहीं होता। परंतु इस बातको भी विज्ञ पुरुष ही समझ सकते हैं कि 'मैं सुखपूर्वक सोया और कुछ भी नहीं जाना।'-इस प्रकारकी जो स्मृति सुषुप्तिसे उत्थित पुरुषको होती है, यह भी बिना अनुभवके असम्भव है; क्योंकि बिना अनुभवके कोई स्मरण नहीं होता। अतः सुषुप्तोत्थ पुरुषके स्मरणसे निश्चय होता है कि सुषुप्तिमें सौषुप्ततम एवं सौषुप्तसुखका प्रकाशक कोई स्वाभाविक अखण्ड नित्य विज्ञान अवश्य था। यहाँ जो लोग यह कहते हैं कि सुषुप्तिमें कोई भावरूप सुख या अज्ञान नहीं होता, किंतु दुःखके अभाव एवं ज्ञानके अभावमें ही
७३२ भक्तिसुधा सुख एवं अज्ञानका व्यवहार होता है, उनको यह बतलाना चाहिये कि ज्ञानाभावका ज्ञान कैसे होगा ? अभावके ज्ञानमें अनुयोगी (अधिकरण) एवं प्रतियोगी (जिसका अभाव हो)-का ज्ञान आवश्यक होता है। जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी (घटाभावके अधिकरण भूतलादि) तथा प्रतियोगी (घट) इन दोनोंका ज्ञान आवश्यक होता है। अन्यथा किसका अभाव कहाँ है, ऐसी जिज्ञासा शान्त नहीं होगी। अनुभवगोचरता और आच्छादकताके कारण अज्ञानकी भावरूपता न कि ज्ञानाभावरूपता यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अधिकरण एवं उसके प्रतियोगीका ज्ञान रहा हो, तब उस ज्ञानके होते हुए वहाँ ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है ? जिस भूतलमें कोई भी घट हो वहाँ घटाभावका व्यवहार कैसे हो सकता है ? यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अनुयोगी एवं प्रतियोगीका ज्ञान नहीं था, तब तो उस ज्ञानाभावकी अनुपलब्धि या प्रत्यक्षद्वारा कथमपि ज्ञान नहीं हो सकता है। अतः आत्मस्वरूपका आवरण करनेवाला अज्ञान पूर्वकथनानुसार भावरूप ही है। जैसे सूर्यके आवरक मेघका प्रकाश सूर्यसे ही होता है, वैसे ही नित्य विज्ञानानन्दघन आत्माके आवरक अज्ञानका प्रकाश साक्षीरूप आत्मासे ही होता है। अस्तु, इस प्रसंगका स्पष्टीकरण अन्यत्र किया जायगा। प्रकृत प्रसंग यही है कि सुषुप्तिदशामें निद्रा या अज्ञानसे समावृत साक्षीद्वारा अज्ञानका प्रकाश होता है। अहंकार आदि वहाँ नहीं होते। सुषुप्तिके अनन्तर प्रथम निद्राकी निवृत्तिमें कुछ ऐसा ज्ञान होता है, जिसमें किसी तरहके विशेष विकल्पका स्फुरण नहीं होता। यहाँ दो स्थितियाँ हैं—विषय-विशेषके स्फुरणके बिना बौद्धज्ञान होता है, जिसे व्यष्टि महत्तत्त्व कह सकते हैं; जिसके अनन्तर अहंकारका उल्लेख होता है, इसीलिये अज्ञानसे ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाती है। सुषुप्तिमें अज्ञान ही होता है और उसके अव्यवहित उत्तर जाग्रत् या स्वप्नमें ही कुछ ज्ञान होता है। समष्टि अज्ञानरूप मायासे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। जैसे अव्यक्तसे व्यक्तका प्रादुर्भाव है, वैसे ही अज्ञानसे ज्ञानका प्रादुर्भाव होना युक्त ही है। उत्पन्न व्यक्त ज्ञानके सिवा निद्राभंगके अनन्तर एक नित्य- सिद्ध निरावरण ब्रह्मरूप अखण्ड बोधकी भी अभिव्यक्ति होती है। तत्परतापूर्वक उसीके साक्षात्कारसे जीव सदाके लिये बन्धनसे मुक्त हो जाता है। विवेकियोंका कहना है कि आत्माके आवरण दो हैं—एक तो दृश्यका स्फुरण और दूसरा अज्ञान। जाग्रत् स्वप्नमें आत्मा विक्षेपरूप दृश्यसे समावृत रहता है और सुषुप्तिमें अज्ञानसे आवृत होता है। जब समाधिमें प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—इन पाँचों वृत्तियोंका निरोध होता है अर्थात् जाग्रत्- स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयावस्थाका आविर्भाव होता है, तब निरावरण विशुद्ध आत्मतत्त्वका दर्शन होता है। अज्ञानादि सब दृश्योंकी जो प्रतीति या उसका भान किंवा प्रकाश है, वही अखण्ड एवं अनन्त आत्मा है। बिना प्रतीति, बिना भान, बिना प्रकाश किसी पदार्थका अस्तित्व ही नहीं सिद्ध होता। जो पदार्थ है, वह अवश्य ही केनचित् क्वचित्कथंचित् अर्थात् किसीसे, कहीं, किसी प्रकार विज्ञात है, इसी वास्ते प्रतीतिके भीतर ही समस्त देश, समस्त काल और समस्त वस्तुएँ हैं। यह सर्वभासक, निर्मल, अखण्ड प्रतीति ही परमात्मस्वरूप है। यह अखण्ड प्रतीति आकाशकी तरह पोली नहीं है, अपितु ठोस है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बका स्फुरण होता है, वैसे ही इस प्रतीतिमें दृश्यका स्फुरण होता है। जैसे बिना दर्पणकी प्रतीतिके प्रतिबिम्बका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही बिना स्वयंप्रकाशकी प्रतीतिके स्फुरण नहीं होता। अतएव श्रुति है—‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतरो० ६।१४) जैसे दर्पण-स्फुरणके पीछे प्रतिबिम्ब-स्फुरण होता है,
वेदान्तरससार ७३३ वैसे ही स्वयंप्रकाश-स्फुरणके अनन्तर दृश्यका स्फुरण होता है। असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, निरवयव, निष्कल परमात्मामें प्रपंचसंसर्गका प्रकार यही है। सभी वादिगण परमात्माको अखण्ड, असंग, निष्कल तथा अनन्तस्वरूप मानते हैं। निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य- सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता ऐसी परिस्थितिमें प्रपंचकी स्थिति कैसे और कहाँ सम्भव है ? या तो प्रपंचको किसी ऐसे देश- कालमें रखें, जहाँ परमात्मा न हों या परमात्माको आकाशकी तरह सावकाश पोला मानें। परंतु ये दोनों ही पक्ष शास्त्रविरुद्ध हैं; क्योंकि शास्त्रोंने परमात्माको ब्रह्म शब्दसे बोधित किया है। ब्रह्म शब्द 'बृहि वृद्धौ' धातुसे बनता है। अतः ब्रह्म शब्दका 'बृहत् या महान्' यह अर्थ होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि किसी बृहत् या महान् वस्तुको ब्रह्म कहते हैं। अब यह विवेचन करना है कि ब्रह्मकी वह बृहत्ता सापेक्ष है या निरपेक्ष, सातिशय है या निरतिशय ? अर्थात् जैसे घट, पट, मठ आदिमें बृहत्ता है और आकाशमें भी, परंतु घट-पट-मठादिमें सापेक्ष बृहत्ता है और आकाशमें निरपेक्ष है, वैसे ब्रह्ममें कैसी बृहत्ता होनी चाहिये? इसपर विज्ञजनोंकी सम्मति यही है कि जब कोई संकोचक पद हो, तब ब्रह्ममें सापेक्ष बृहत्ताकी कल्पना की जाय। जैसे 'सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस वचनमें सर्व पदका संकोच किया जाता है। जहाँ सार्वत्रिक सार्वदेशिक सर्व ब्राह्मणोंका एकत्रीभाव या भोजन असम्भव हो, वहाँ 'निमन्त्रिताः सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस प्रकार सर्वपदका संकोच करके निमन्त्रित सर्व ब्राह्मणका ग्रहण होता है। वैसे यहाँ भी यदि कोई संकोचक प्रमाण होता या निरतिशय बृहत्तामें किसी तरहकी अनुपपत्ति होती, तब तो यह कहा जा सकता था कि 'इस प्रकारके इतने महान्को ब्रह्म कहें।' जब किसी प्रकारका कोई संकोचक प्रमाण नहीं है और निरतिशय महत्तामें कोई अनुपपत्ति नहीं है, तब सर्व प्रकार एवं सर्वसे अधिक निरतिशय महान्को ही ब्रह्म कहना चाहिये। महत्ताकी अतिशयताकी कल्पना-परम्परा जहाँ विरत हो जाय, जिससे अधिक बृहत्ताकी कल्पना हो ही नहीं सके, उसीको ब्रह्म कहते हैं। फिर भी भगवती श्रुतिने 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय० २।१) इस वचनमें लक्षण या विशेषणरूपमें अनन्त पदका प्रयोग किया है, जिससे निरतिशय बृहत्ताकी और भी पुष्टि हो जाती है। इस तरह सर्व प्रकारसे सिद्ध हुआ कि निरतिशय महान्को ही ब्रह्म कहते हैं। जो वस्तु किसी देशमें हो और किसी देशमें न हो, वह तो देश-परिच्छिन्न ही है, उसमें निरतिशय बृहत्ता कैसी ? और जो कभी मिट जाय, वह तो काल-परिच्छिन्न एवं अनित्य है, वह भी अनन्त महान् नहीं हो सकती और यदि किसी दूसरी अन्य वस्तुका अस्तित्व हो, तब तो अन्योन्याभावका प्रतियोगी होनेसे ब्रह्म वस्तु-परिच्छिन्न हो जायगा। अतः फिर भी निरतिशय महत्ता उसमें नहीं हो सकती। इसलिये निरतिशय तथा अनन्त महत्ताके लिये ब्रह्मको सर्व देश-काल-वस्तुसे अतीत एवं अपरिच्छिन्न मानना चाहिये। अर्थात् ऐसा कोई देश-काल या वस्तु नहीं है, जहाँ ब्रह्म न हो, बल्कि 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म है' ऐसा कथन भी औपचारिक ही है। जैसे तन्तु-निर्मित पटमें तन्तुका अस्तित्व, कनक-निर्मित कटक-कुण्डल-मुकुटादिमें कनकका अस्तित्व, तरंगमें जलका अस्तित्व एवं कल्पित सर्पमें अधिष्ठानरूपसे रज्जुका अस्तित्व है, बस उसी प्रकार 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्मका अस्तित्व है' ऐसा व्यवहार प्राकृत, विवेकी पुरुषोंमें हुआ करता है। वस्तुतः जैसे तन्तुओंसे भिन्न होकर पट नामकी कोई तात्त्विक वस्तु नहीं है एवं कनकसे भिन्न कुण्डलादि पृथक् वस्तु नहीं है और जलसे भिन्न तरंग नामका कोई पदार्थान्तर नहीं है, अपितु तन्तु आदिमें ही पटादिकी कल्पना है, ठीक वैसे ही
ब्रह्मसे भिन्न होकर देश-काल-वस्तु कुछ है ही नहीं। अतः देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म नहीं, अपितु देश-काल-वस्तु ही ब्रह्ममें कल्पित है। इसी वास्ते 'यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥' (श्रीमद्भा० २।९।३४) भगवान्के इस वचनसे यह कहा गया है कि जैसे आकाशादि पंच महाभूत उच्चावच नाना प्रकारके भौतिक प्रपंचोंमें प्रविष्ट होते हुए भी अप्रविष्ट हैं, वैसे ही मैं महाभूतोंमें प्रविष्ट हूँ और अप्रविष्ट भी हूँ। कार्यवर्गमें महाभूतादि कारणोंकी उपलब्धि होती है, अतः प्रवेशकी कल्पना है। वस्तुतः— 'प्रागेव विद्यमानत्वान तेषामिह सम्भवः॥' (श्रीमद्भा० १०।३।१६) प्रथमसे ही जो व्यापक हैं, उनका प्रवेश क्या कहा जाय? इसी अभिप्रायसे— 'मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः' (गीता ९।४) इस वचनसे भगवान्ने ही अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है कि सर्व प्रपंच मुझमें है, मैं प्रपंचमें नहीं हूँ। इससे सिद्ध हुआ कि ब्रह्मसे रहित कोई देश या काल है ही नहीं, जहाँ भगवान्से भिन्न किसी वस्तुकी स्थिति हो। किंतु जब सभी देश और काल ही ब्रह्ममें हैं, तब फिर देशनिष्ठ, कालनिष्ठ वस्तु सुतरां ब्रह्ममें ही पर्यवसित होगी। अब देखना यह है कि देश, काल एवं वस्तु— ये असंग ब्रह्ममें कैसे रहते हैं? श्रुतियोंने ब्रह्मको ही समस्त प्रपंचका उपादान एवं निमित्त कारण भी बतलाया है। यदि थोड़ी देरके लिये प्रकृतिको ही उपादान मान लें तो भी वही प्रश्न उठता है कि प्रकृति कहाँ है—ब्रह्ममें या उससे पृथक्? जब ब्रह्मसे पृथक् देश, काल नहीं तो पृथक् देशमें प्रकृतिकी कल्पना कैसे उठ सकती है? यदि ब्रह्ममें ही प्रकृति है, तब वहाँ भी वही प्रश्न है कि किस सम्बन्धसे ब्रह्ममें प्रकृति रहती है? यदि प्रकृति या जगत्का ब्रह्मके साथ कोई सम्बन्ध मानें तो ब्रह्ममें असंगता नहीं रहती है। साथ ही उपादानको छोड़कर अन्यत्र कार्यकी सत्ता भी नहीं कही जा सकती। जलको छोड़कर वीचि (तरंग) एवं सुवर्णको छोड़कर कुण्डलादि पृथक् कैसे रह सकते हैं? साथ ही प्रपंच तथा भगवान्का स्वभाव भी अत्यन्त विरुद्ध है। ब्रह्म अपरिच्छिन्न, प्रपंच परिच्छिन्न, ब्रह्म अमृत, प्रपंच मर्त्य, ब्रह्म सुख-दुःख-मोहातीत, प्रपंच सुख- दुःख-मोहात्मक तथा ब्रह्म परम-सत्य स्वप्रकाश परमानन्दरूप और प्रपंच अनृत जड़ दुःखरूप है। ब्रह्म निरवयव तथा निष्कल और प्रपंच सावयव, सकल है। अतः ब्रह्म और प्रपंचका सम्बन्ध कैसे और कौन हो सकता है? निर्गुण तथा निष्क्रिय होनेके कारण ब्रह्म द्रव्य नहीं कहा जा सकता। अतएव उसमें संयोग या समवाय दोनों नियामक सम्बन्ध नहीं हो सकते। निष्कल निरवयवमें भी यह सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः केवल आध्यासिक सम्बन्ध मानना उचित है। इसी आशयसे 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥' 'न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥' (गीता ९।४-५) आदि वचन आये हैं, जिनका भाव यह है कि मुझ अव्यक्त-मूर्तिसे समस्त साकाश (आकाशसहित, आकाशपर्यन्त) प्रपंच व्याप्त है, समस्त भूत मुझमें हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ, वास्तवमें तो समस्त प्रपंच मुझमें स्थित भी नहीं हैं। आशय यह है कि बहिर्मुख प्राणियोंकी दृष्टिमें प्रपंच ही स्पष्ट रूपमें विद्यमान है, प्रपंचातीत भगवान्का तो अस्तित्व ही दुर्गम है, अतः प्रथम प्रपंचके कारणरूपसे या आधार तथा भासक सत्ता स्फूर्तिप्रदरूपसे भगवान्के अस्तित्वपर विश्वास होना यह सबसे बड़ी बात है। कुछ अभिज्ञ प्रपंच देखकर उसके आधार या कारणका अन्वेषण करते हैं। यदि भगवान् प्रथम ही यह कह दें कि न मैं प्रपंचमें हूँ, न प्रपंच मुझमें है, तब तो निज दृष्टिसिद्ध प्रपंचके कारणका अन्वेषण करनेवाला साधक भगवान्से
वेदान्तरससार [पृ. ७३५]
निराश होकर परमाणु, प्रकृति या अन्य किसीको प्रपंचके कारणरूपसे निश्चय करेगा। अतः भगवान् प्राणिकल्याणार्थ प्रथम यही कहते हैं कि 'मैं ही जगत्का कारण हूँ। यदि तत्त्वतः विवेचन किया जाय, तब तो जगत् नामका कोई पदार्थ ही नहीं है; परंतु यदि अज्ञबुद्धिसिद्ध व्यावहारिक जगत् है तो मुझमें ही है। मैं ही इसके भीतर, बाहर, मध्यमें तथा मैं ही इसका भासक हूँ।' जब इस तरह प्रभुके उपदेशसे प्राणीको प्रपंचसे भिन्न एक भगवान्पर विश्वास हो जाता है, तब फिर ठीक-ठीक तत्त्वका उपदेश किया जाता है कि वस्तुतः मुझसे भिन्न होकर प्रपंच है ही नहीं; जो कुछ है वह बस, एक मैं ही हूँ। वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता जैसे भ्रान्तिसे किसीको अमृतसागरमें क्षारसागरकी कल्पना हो, ठीक वैसे ही एक अखण्ड आनन्दसागरमें ही भवसागरकी कल्पना है। आनन्दसागर ही भ्रान्तिसे भवसागरके रूपमें भासित होता है। आनन्दसागरसे भिन्न होकर भवसागर नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। भीतर, बाहर, सर्वत्र अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड संवित्सुखसागरका भान हो रहा है, इसीलिये गोस्वामीजी कहते हैं—'आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) अतः भगवान् सर्वकारण, सर्वाधार, सर्वभूत होकर भी असंग और सर्वरहित हैं। आनन्दसागर और भवसागरका संयोग समवाय आदि सम्बन्ध तो बनता नहीं। अतः केवल आध्यासिक ही सम्बन्ध है अर्थात् आध्यासिक सम्बन्धसे प्रपंच देश-काल- वस्तुकृत परिच्छेदशून्य निर्गुण निष्क्रिय असंग ब्रह्ममें रह सकता है। इसे यों भी समझ सकते हैं, जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल एवं नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि नाना प्रकारके दृश्य प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देते हैं—वस्तुतः हैं ही नहीं, केवल प्रतीत होते हैं, ठीक वैसे ही महाप्रतीतिरूप (स्वप्रकाश) दर्पणमें यह समस्त चराचरप्रपंच देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और अज्ञान—ये सभी प्रतिबिम्बके समान न होते हुए भी प्रतीत होते हैं। समस्त देश एवं क्षण, प्रहर, दिवस, पक्ष, मास, अब्द, युग, कल्प तथा गत-आगत नाना प्रकारके काल—ये सभी अखण्ड अनन्त निर्मल असंग प्रतीतिरूप (भानस्वरूप) दर्पणमें ठीक प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीत हो रहे हैं। जैसे रूपादि-ग्रहणके लिये प्रवृत्त भी चक्षु सौरादि आलोकका (सूर्यादिके प्रकाश) ग्रहण करता है, पीछे आलोकावभासित रूपका ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही सर्वभासिका प्रतीतिका (संवित्) स्फुरण पहले होता है। तदनन्तर प्रतीति-प्रकाशित अहंकारादि दृश्यका स्फुरण होता है। किंवा जैसे पहले दर्पणका ग्रहण होता है, पीछे दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, वैसे ही पहले चिद्धातुरूप दर्पणकी प्रतीति होती है। तदनन्तर प्रतिबिम्बभूत जगत्की प्रतीति होती है। यही—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।३।१५) इस श्रुतिका आशय है। परमात्म- प्रकाशके पीछे सर्वदृश्यका प्रकाश होता है और परमात्म-प्रकाशसे ही सकल दृश्य प्रकाशित होता है। चक्षुरादि इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार—ये सभी अपने-अपने प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन करनेवाले हैं, अतः ज्योति हैं, परंतु इन ज्योतियोंका भी प्रकाशन करनेवाला विशुद्ध भावरूप परमात्मा ज्योतियोंका भी ज्योति है। तमोरूप अज्ञानका भी प्रकाश वही है— 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।' (गीता १३।१७) अतः 'देशः स्फुरति देशोऽस्ति। कालो भाति कालोऽस्ति। वस्तूनि स्फुरन्ति वस्तूनि सन्ति' इत्यादि रूपसे 'देशकी प्रतीति, कालकी प्रतीति, वस्तुओंकी प्रतीति एवं देश है, काल है, वस्तु है', इस प्रकार
७३६ भक्तिसुधा देश-काल-वस्तुकी सत्ता अत्यन्त स्पष्ट है। जैसे डालनेसे प्रतिबिम्ब नहीं दिखायी देता, वैसे ही दर्पणसे प्रतिबिम्ब कवलित है, दर्पणके बिना उसकी निर्दृश्य चितिरूप नित्यदृक्पर दृष्टि डालनेपर दृश्य, प्रतीति ही नहीं हो सकती, वैसे ही देश, काल तथा दर्शन और साभास-अहमर्थरूप अनित्य द्रष्टा-इन समस्त वस्तुएँ अबाधित सत्ता एवं अखण्ड अनन्त सभीका अत्यन्ताभाव हो जाता है। प्रतीतिसे कवलित हैं। अतः बिना प्रतीति और प्रतिबिम्बमें जब दृष्टि आसक्त होती है, उस सत्ताके देशादिकी सिद्धि हो ही नहीं सकती। सत्ता समय भी यद्यपि दर्पणका दर्शन होता है; क्योंकि और स्फूर्तिसे विहीन देशादि असत् तथा निःस्फूर्ति बिना दर्पणके दर्शन तो प्रतिबिम्बका दर्शन हो ही हो जाते हैं। नहीं सकता तथापि शुद्ध निष्प्रतिबिम्ब दर्पणका दर्शन यद्यपि प्रतिबिम्बसे भिन्न बिम्ब दर्पणसे पृथक् नहीं होता। उसी समय दृश्यादि दृष्टिकालमें भी हुआ करता है, परंतु यहाँ तो सत्ता और प्रतीतिरूप दृश्यके अधिष्ठानभूत अखण्ड स्फुरणरूप भगवान्का दर्पणसे भिन्न कोई देश ही नहीं, जहाँ बिम्बकी तरह भान है ही; क्योंकि बिना स्फुरण किसी भी दृश्यकी किसी पृथक् वस्तुकी स्थिति हो सकती हो। इसी सिद्धि नहीं होती तथापि स्पष्ट शुद्ध अनन्त भान नहीं वास्ते हम भी जगत्को प्रतिबिम्ब न कहकर व्यक्त होता है। उसके लिये ही वैराग्यपूर्वक दृश्यकी प्रतिबिम्बके समान कहते हैं। वस्तुतत्त्वके बुद्ध्यारोहणके ओरसे दृष्टिको व्यावर्तित करके केवल निर्दृश्य लिये दृष्टान्तका उपादान किया जाता है। दृष्टान्त विशुद्ध अखण्ड भानपर दृष्टि स्थिर करना होता है। इतने ही अंशमें है कि जैसे दर्पणमें न होकर भी उसी तरह अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेपर फिर प्रतिबिम्ब स्पष्टरूपसे दर्पणमें प्रतीत होता है, उसी केवल जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तभीतक तरह ब्रह्ममें न होता हुआ भी प्रपंच अत्यन्त स्पष्ट व्युत्थान-कालमें दृश्यका स्फुरण होता है। प्रारब्ध रूपसे प्रतीत होता है। यह दूसरी बात है कि क्षय होनेपर सदाके लिये दृश्य मिट जाता है प्रतिबिम्बाधार दर्पणसे भिन्न भी देश है और वहाँ और अखण्ड आनन्द परिपूर्ण भगवान् ही अवशिष्ट प्रतिबिम्बका निमित्त बिम्ब भी है, परंतु यहाँ रहते हैं। दृश्याधार अखण्ड ब्रह्मरूप दर्पणसे भिन्न कोई देश जबतक यह स्थिति नहीं मिलती, तबतक नहीं, अतएव यहाँ बिम्बके समान कोई सत्य वस्तु सुषुप्तिमें सावरण ही ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति होती है। निमित्त भी नहीं, किंतु एकमात्र अनिर्वचनीय शक्तिके जैसे मेघसे समावृत मेघका अवभासक सूर्य है, बस, अद्भुत माहात्म्यसे प्रतिबिम्बकी तरह वस्तुतः वैसे ही अज्ञानसे समावृत अज्ञानका प्रकाशक निष्प्रपंच अत्यन्तासत् दृश्य प्रपंचकी प्रतीति होती है। वह अद्वैत स्वप्रकाशानन्दरूप आत्मा सुषुप्तिमें जीवको शक्ति ही जैसे सर्वदृश्यकी कल्पनाका मूल है, वैसे मिलता है। जैसे घोर निद्रासे किसी तरह अकस्मात् ही अपनी कल्पनाका भी मूल वह स्वयं ही है। जैसे जागनेपर विशेष विकल्प विस्फुरणके बिना कुछ भेद ही घट-पटका भेदक है और वही घट-पटसे ज्ञान होता है, विवेकीजन वैसे ही ब्रह्मानुभवका अपना भी भेद सिद्ध करता है, किंवा जैसे अनुभव प्रकार बतलाते हैं। घोर निद्रासे जागनेके पश्चात् एवं ही अपने विषयोंका और अपने भी व्यवहारका द्वैत-प्रतीतिका प्रथम निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह जनक है तथा नैयायिकोंका आत्मा ही सर्वज्ञेयका शुद्ध, निर्दृश्य, निरावरण, चिदात्मक प्रकाश ब्रह्मका तथा अपना भी ज्ञाता है, वैसे ही वह शक्ति ब्रह्मको दर्शन होता है, वैसे ही जागरणके अन्तमें और ही सर्वदृश्यरूपमें तथा अपने भी रूपमें प्रतिभासित सुषुप्तिके पूर्वमें भी निरावरण तत्त्वकी उपलब्धि करती है। जैसे निष्प्रतिबिम्ब दर्पणमात्रपर दृष्टि होती है, जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणरूप कमलकी
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वृत्तिरूप पंखुरियाँ विकसित होती हैं। इसी वास्ते द्वैत दृश्यका सम्यक् स्फुरण हुआ करता है। अन्तःकरणके विकास या चांचल्यमें ही द्वैतका दर्शन होता है, इसीलिये भगवत्पादशंकराचार्यने कहा है— चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा। तकारो विषयाध्यासः जपारागो मणौ यथा॥ (सदाचारानुसन्धानम् ३१।३१।१-२) ‘चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा।’ चित्तमें जबतक द्वितीय ‘तकार’ का योग है तबतक वह दृश्य है; ‘तकार’ संसर्गरहित होते ही वह केवल ‘चित्’ परमात्मा ही हो जाता है। चित् ही किंचित् मननी शक्तिको धारण करके मन हो जाता है। जैसे मृत्तिकाके होनेमें ही घटकी उपलब्धि होती है और उसके न होनेपर नहीं होती, ठीक वैसे ही चित्तकी चंचलतामें ही अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नमें दृश्य दिखायी देते हैं। मूर्च्छा, समाधि या सुषुप्तिमें चित्तका चांचल्य नहीं होता, अतएव वहाँ द्वैत-दर्शन भी नहीं होता। अतः जैसे घट मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही द्वैत-दृश्य भी चित्तरूप ही है। विषय-चिन्तनरूप चित्तका चांचल्य मिटनेपर दृश्यकी भी समाप्ति हो जाती है। चैत्यानुपातरहितं सामान्येन च सर्वगम्। यच्चित्तमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः॥ (महोपनिषत् ४।११८) इस तरह क्रमशः जब सुषुप्तिकी ओर जीवकी प्रवृत्ति होने लगती है, तब चित्तकी वृत्तियाँ संकुचित होने लगती हैं। जैसे-जैसे उनका संकोच होता है, वैसे-वैसे दृश्यका दर्शन न्यून होने लगता है। जब अन्तःकरण-कमल अत्यन्त मुकुलित हो जाता है, तब दृश्य-दर्शन बिलकुल बन्द हो जाता है। कुछ क्षणके अनन्तर तामसी निद्रासे वह समावृत हो जाता है, फिर घोर तम छा जाता है। इसी तरह जब निद्रा भंग होती है, तब पहले तामसी निद्रा दूर होती है। फिर कुछ क्षणके अनन्तर निद्रारूप आवरणसे रहित मुकुलित अन्तःकरण- कमल शनैः-शनैः पुनः विकसित होकर सम्यक् रूपमें द्वैतका दर्शन करने लगता है। इस तरहसे मनोव्यापारस्वरूप प्रयत्नसे द्वैत व्यक्त होता है। निर्व्यापाररूप विश्रान्तिमें स्वाभाविक अद्वैत व्यक्त होता है। जो वस्तु प्रयत्नसे, परिश्रमसे सिद्ध की जाती है, वह कृत्रिम, अनित्य तथा असत्य होती है और जो बिना व्यापार, बिना परिश्रम, नित्यसिद्ध हो, वही स्वाभाविक एवं सत्य है। मूल श्रुति भी परिश्रमरहित निर्व्यापार दशाका वर्णन अद्वैत-रूपसे ही करती है ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्।’ (छान्दोग्य० ६।२।१) और ईक्षण, कामना, तप तथा संकल्परूप परिश्रमसे बहुभवनका वर्णन करती है—‘तदैक्षत (एकोऽहम्) बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत्’ (बृहदारण्यक० १।४।१७), ‘सोऽकामयत्। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत’ (तैत्तिरीय० २।६) इत्यादि। जाग्रत्के अन्त एवं सुषुप्तिके पूर्वमें तथा सुषुप्तिके अन्त एवं जाग्रत्के पूर्वमें कुछ क्षण निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह शुद्ध निर्दृश्य चिद्रूप अखण्ड भानका दर्शन होता है, परंतु अति सूक्ष्म होनेके कारण सर्वसाधारणकी समझमें नहीं आता। जैसे हम सदा ही उत्तराभिमुख होकर नक्षत्र- राशियोंपर दृष्टि डालनेपर ध्रुवका दर्शन करते हैं तथापि ‘अयं ध्रुवः’ इत्याकारक स्पष्ट विवेकपूर्वक ध्रुवको नहीं पहचानते; कुछ लोगोंके न पहचाननेमें तो लक्षणका अज्ञान ही हेतु है और कुछ लोगोंको ‘अमुक-अमुक नक्षत्रोंके सन्निधानमें तथा उत्तर दिशामें सदा अचल रूपसे स्थिर रहनेवाले नक्षत्रका नाम ध्रुव है’ इस प्रकारसे लक्षणका ज्ञान है तथापि वे लक्षणको लक्ष्यमें समन्वित करके ध्रुवको पहचाननेके लिये तत्पर नहीं होते, इसीलिये उन्हें प्रतिदिन ध्रुवको देखनेपर भी उसकी पहचान नहीं होती। अतः लक्षण-ज्ञान एवं परिचयके लिये अन्य दृश्यकी ओरसे दृष्टिव्यावर्तनपूर्वक तत्परतासे ही प्रयत्न करनेपर
स्पष्टरूपेण ध्रुवका परिचयपूर्वक दर्शन होता है। ठीक इसी तरह सदा ही सुषुप्ति एवं जाग्रत्के अन्तमें यद्यपि सभीको निर्दृश्य शुद्ध दृक्-रूप स्वयंप्रकाश अखण्ड भानका दर्शन होता है तथापि परिचयपूर्वक स्पष्ट साक्षात्कार नहीं होता। एक विषयके अनन्तर अन्य विषयमें चित्तके जानेपर मध्यदशामें चिन्तनरहित चित्तकी स्थिति स्वरूपस्थिति है— अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये तु या स्थितिः। सा ध्वस्तमननाकारा स्वरूपस्थितिरुच्यते॥ (महोपनिषत् ५।५) सदा स्वप्रकाशरूपसे भासमानमें भी जो 'नास्ति' (नहीं है) और 'न भाति' (नहीं प्रतीत होता है) इत्याकारक व्यवहार-योग्यता है, वही आवरण- शक्तिका विलक्षण चमत्कार है; और स्वप्रकाश अनन्त अद्वैतमें जड़ परिच्छिन्न द्वैत प्रपंचका भान करा देना, यही विक्षेप-शक्तिका विलक्षण चमत्कार है। इसीकी निवृत्तिके लिये आचार्य-परम्परासे वेदान्तोंका श्रवण तथा मनन करके अद्वितीय परमात्माके लक्षणोंका संस्कार अन्तःकरणमें स्थिर करना चाहिये। किसी भी वस्तुको जाननेके लिये अन्य विषयोंसे चित्तको व्यावर्तित करने और तत्परतापूर्वक परिचय करनेकी आवश्यकता होती है, परंतु यहाँ तो श्रवण-मननादिजन्य स्वरूपके संस्कार ही परिचय, प्रयत्नके स्थानमें अपेक्षित हैं; क्योंकि जैसे छायाके पीछे चलनेसे छायाका ग्रहण नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्नसे शुद्ध वस्तुकी उपलब्धि नहीं हो सकती— 'कारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते।' निर्व्यापार होनेपर ही वस्तुबोध हो सकता है; परंतु केवल निर्व्यापारता योगियोंकी भी होती है, उन्हें अद्वैत ब्रह्मका अपरोक्ष्य फिर भी नहीं होता। इसका कारण यह है कि स्वरूपपरिचयानुकूल श्रवणादिद्वारा संस्कार वहाँ सम्पादित नहीं किये गये हैं। आत्मापर प्राथमिक आवरण अनिर्वचनीय अज्ञान और द्वितीय विक्षेपरूप द्वैत, तृतीय अर्धनिद्रापूर्वक स्वप्न और चतुर्थ पूर्ण निद्रा या सुषुप्ति है। मेघाच्छन्न भाद्रपद अमावास्याकी रात्रिकी तरह सुषुप्तिमें आत्माका अत्यन्त अप्रकाश रहता है। मेघरहित रात्रिके समान स्वप्नमें किंचित्प्रकाश होता है। चान्द्रमसी रात्रिकी तरह जाग्रत्में पर्याप्त प्रकाश होता है। मेघाच्छन्न दिवसकी तरह समाधिमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण सूर्यकी तरह तत्त्वसाक्षात्कारमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण ब्रह्मस्वरूप साक्षात्कारके लिये देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादिका अत्यन्त निरोध और वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार—इन दोनोंकी आवश्यकता है। जैसे—'गोसदृशो गवयः' इत्याकारक वाक्यजन्य दृढ़तर संस्कारवाले पुरुषको 'नेत्र' और 'गवय' का सन्निकर्ष होते ही 'अयं गवयः' ऐसा बोध हो जाता है, वहाँ विचारकी आवश्यकता नहीं होती और गवयका नेत्रोंसे सम्बन्ध होनेपर भी 'यह गवय है' ऐसा बोध नहीं होता, जबतक कि 'गौके सदृश गवय होता है' ऐसा ज्ञान नहीं होता। अतः जहाँ सन्निकर्ष होनेपर भी 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके बिना 'अयं गवयः' इत्याकारक साक्षात्कारमें विलम्ब हो, वहाँ यह 'गवय' है, इस ज्ञानमें वाक्य ही हेतु है, इन्द्रिय-सन्निकर्ष सहकारीमात्र है एवं जहाँ 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके संस्कार होनेपर भी नेत्र-सन्निकर्ष बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ सन्निकर्ष ही मुख्य हेतु है और वाक्य सहकारी है। ठीक इसी तरह योगियोंको निरोध समाधि होनेपर भी वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है। अतः वहाँ ब्रह्मसाक्षात्कारमें वेदान्त-वाक्य ही मुख्य कारण है, निरोध सहकारी है। जहाँ वेदान्ताभ्यास होनेपर भी निरोध बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ निरोधकी ही मुख्य हेतुता है, वाक्य सहकारी है। इसी अभिप्रायसे आचार्योंने कहीं वेदान्तोंको, कहीं संस्कृतनिरुद्ध मनको ब्रह्म-साक्षात्कारमें हेतु माना है और कहीं महावाक्यको ही मुख्य हेतु कहा है। इससे सिद्ध
वेदान्तरससार ७३९ होता है कि वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसे युक्त निरुद्ध अन्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मका साक्षात् होता है। जैसे पूर्णिमाके किसी अवस्था-विशेष-विशिष्ट चन्द्रमापर ही राहुका प्राकट्य होता है, वैसे ही निर्वृत्तिक निरुद्ध मनपर ही ब्रह्मस्वरूपका प्राकट्य होता है। 'असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते।' असत्य काल्पनिक मार्गपर स्थित होकर सत्यवस्तुकी प्राप्तिका प्रयत्न किया जाता है। अप्राकृत भगवान्की मंगलमयी मूर्तिको प्राकृत कमल, महेन्द्र नीलमणि प्रभृति उपमानोंसे उपमित किया जाता है। क्या कोई भी आस्तिक सर्वांशमें भगवान्में इन उपमानोंको मान सकता है? ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता 'तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यात्' (रुद्र- हृदयोपनिषत् २७) एकके विज्ञानमें सर्व-विज्ञानकी प्रतिज्ञाका समर्थन करनेके लिये श्रुतिने यह दृष्टान्त दिया है कि जैसे एक मिट्टीके विज्ञानमें समस्त मृण्मय पदार्थका 'यह सब मिट्टी ही है' इस प्रकार विज्ञान हो जाता है, वैसे ही एक परमात्माके विज्ञानसे समस्त परमात्म- कार्यका विज्ञान हो जाता है, परंतु यहाँ भी तो मृत्तिका सावयव एवं परिणामिनी है तो फिर निरवयव कूटस्थ अपरिणामी भगवान्का प्रपंच- रूपमें परिणाम कैसे सम्भव है? और परमात्माके विज्ञानमें समस्त प्रपंचका विज्ञान भी होना कैसे सम्भव है? ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो केवल जैसे कारणसे भिन्न कार्यकी सत्ता नहीं; कारणकी ही सत्तासे कार्यमें सत्ता और स्फूर्तिमत्ता प्रतीत होती है, वैसे ही परमात्मासे भिन्न प्रपंचकी सत्ता नहीं; एक परमात्माकी ही सत्ता और स्फूर्तिसे प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्तिकी प्रतीति होती है। इतने ही अंशमें दृष्टान्त है। इसी प्रकार घटसे ही महाकाशमें देशकी कल्पना और उससे ही महाकाशमें घटाकाश- व्यवहार और घटके गमनमें घटाकाशके गमनकी प्रतीति होती है। वस्तुतः न तो महाकाशसे भिन्न घटाकाश है और न उसका गमन ही होता है, वैसे ही अनन्त अखण्ड शुद्ध भगवान्में उपाधियोगसे ही भेद और गति (गमन), उत्क्रान्ति (उत्क्रमण) आदिकी प्रतीति होती है, वस्तुतः कुछ नहीं है। उपाधि-विरहित देशमें उपाधिके जानेसे वहाँ नवीन जीवभावकी कल्पना हो जाती है। यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि देशकी कल्पना भी तो उपाधिके ही अधीन है। इसके अतिरिक्त ऐसी कल्पनासे अधिष्ठानमें तो कोई हानि ही नहीं है। यों तो समस्त प्रपंच ही उसीमें कल्पित है; परंतु इससे क्या वह बद्ध समझा जाता है? क्या कल्पित जलसे मरुभूमि आर्द्र होती है? जब निरवयव निष्प्रदेश निष्कलमें काल्पनिक उपाधिद्वारा ही काल्पनिक प्रदेशका व्यवहार होता है, तब तत्त्वतः प्रदेश या उसके बन्ध और मोक्षकी कल्पना तात्त्विकी कैसी? यदि पूछा जाय कि फिर किसका बन्ध-मोक्ष तात्त्विक है तो इसका उत्तर यही है कि किसीका नहीं। अतएव 'न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥' (आत्मोपनिषद् ३१), (अवधूतोपनिषत् ८) अज्ञानसंज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२६) सत्यज्ञानानन्दात्मक भगवान्से भिन्न होकर बन्ध- मोक्ष नामके कोई पदार्थ नहीं हैं। केवल अज्ञानसे बन्ध और मोक्ष—ये दो संज्ञाएँ होती हैं, अतः केवल कल्पित उपाधिसे कल्पित प्रदेशमें कल्पित ही गमनागमन और कल्पित ही बन्ध-मोक्ष होते हैं। कल्पितोपाधिका अनुगामी जो कल्पित प्रदेश है, वही कल्पित बन्धसे पीड़ित और कल्पित मोक्षसे मुक्त होता है। यदि बन्ध सत्य हो, तभी मोक्ष भी सत्य हो सकता है। अधिष्ठानावशेषके अभिप्रायसे
७४० भक्तिसुधा भगवत्प्राप्ति, मोक्ष या निरावरण भगवान् ही सत्य हैं। इसी तरह— एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटो यथा। घटो नीयेत नाकाशं तथा जीवो नभोपमः॥ (त्रिपुरातापिन्युपनिषत् ५।१२।१३) 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्' इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंमें परमात्माके जीवरूपसे प्रवेशमें दृष्टान्त-रूपसे यह आया है कि जैसे एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न जलमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होता है, वैसे ही परमात्मा भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होते हैं। ऐसे ही 'घटे भिन्ने यथावकाश आकाशः स्याद् यथा पुरा।' (श्रीमद्भा० १२।५।५) घटे नष्टे व्योम व्योमै