भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० भक्तिसुधा देनेमें कुछ काल ले सकता है: परंतु यह कभी नहीं हो सकता कि विषवृक्षमें अमृतका फल लगे। कोई प्राणी चैत्रमें भले ही मटर या चना बोता हो, परंतु यदि उसने कार्तिकमें गेहूँ बोया है तो उसे चैत्रमें काटनेको तो गेहूँ ही मिलेगा। इसी तरह कोई प्राणी भले ही अधर्म-अत्याचार कर रहा हो: मूर्ति तोड़कर, शास्त्र- धर्म तोड़कर पाप करता हो: परंतु इस समय फल तो वही भोगनेको मिलेगा जैसा कर्म पहले कर चुका है। हाँ, उग्र पापों और पुण्योंका फल जल्दी मिलता है; परंतु वह भी कुछ तो अवसरकी प्रतीक्षा करता ही है। त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैस्त्रिभिर्दिनैः। अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते ॥ (हितोपदेश १२८) इसीलिये नल, राम, युधिष्ठिरादि धर्मनिष्ठ होते हुए भी दुःखी थे। रावण, दुर्योधनादि विपरीतगामी होनेपर भी सुखी थे। परंतु अन्तमें उन्हें अपने पापोंका भी फल भोगना पड़ा ही। राम, युधिष्ठिरादि सुखी हुए, रावणादिका सर्वनाश हो गया। सौ लख पूत सवा लख नाती। तेहि रावन के दिया न बाती ॥ ऐसे ही औरंगजेब आदिकी भी पूर्वजन्मकी तपस्या थी, उसीके प्रभावसे उन लोगोंका उतना तेज और वैभव था। जबतक उसकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक उनका पराभव असम्भव था। सामान्यतः यही होता है कि तपस्यासे राज्य और राज्यसे नरक होता है। जब प्राणी पीड़ित, पददलित, उच्छोषित, विताड़ित होता है, तब उसे न्याय, धर्म और ईश्वर सूझता है। ऐसा होते ही कुछ उन्नति और प्रभुता होती है; बस, उसी समय अपने-आपको सँभालना बुद्धिमानी है। अधिकारकी कुर्सी मिलते ही न्याय, धर्म और ईश्वरको भूल जाते हैं। नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ (रा०च०मा० १।६०।८) बस, उसी समय रावण, औरंगजेब-जैसी प्रवृत्ति होने लगती है। परमेश्वरीय दण्ड उन्हें मिलता है; परंतु न्यायकारी परमेश्वर कालकी प्रतीक्षा करके ही—शुभकर्मोंका फल भोग लेनेपर ही उन्हें अशुभ कर्मोंका फल प्रदान करते हैं। श्रीहनुमान्ने रावणके विचित्र वैभवको देखकर यही निश्चय किया कि 'अहो ! यदि इसमें अधर्म बलवान् न होता तो यह शक्रसहित समस्त लोकपालोंका स्वामी ही होनेयोग्य था'— यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः। स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ लोकपाल भयभीत होकर इसके भ्रुकुटीका ही विलोकन करते रहते हैं— कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥ (रा०च०मा० ५।२०।७) हनुमान्जीने समझाया कि रावण ! तुमने बहुत कुछ सत्कर्म किया है, उसका फल तुम्हें प्राप्त है— उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ (रा०च०मा० ६।२०।३-४) परंतु अब अधर्मके फलभोगका समय आ रहा है, सावधान हो जाओ। तात्पर्य यही कि अत्याचारीको भी अपने असत्कर्मोंका फलभोग मिलता है, अवसर पाकर सत्कर्मोंका भी फल मिलता है। ऐसे ही धर्मात्माको भी पिछले प्रारब्ध—तीव्रतम अधर्मका भी फल भोगना पड़ता है। जो कहा जाता है कि भारत 'धर्म-धर्म' चिल्लाता है तो भी उसका पतन-ही-पतन दृष्टिगोचर होता है। दूसरे देश धर्मका नाम भी नहीं लेते, फिर भी हमपर शासन कर रहे हैं। परंतु यह भी अविचारित-रमणीय बात है। 'दूरके ढोल सुहावने लगते हैं।' यह हम कह चुके हैं कि जहाँ भी कहीं उन्नति देखो, वहाँ उसके मूलभूत धर्मकी कल्पना कर लेनी चाहिये। विषवृक्षमें अमृतफल कदापि नहीं लगता। जहाँ धर्मकी चर्चा नहीं, वहाँ ऐसी-ऐसी भयानक विपत्तियाँ आती हैं कि नगर-के-नगर ज्वालामुखियोंमें जल जाते हैं। कभी-कभी बड़े-बड़े देश-के-देश अकस्मात् धरातलमें विलीन हो जाते हैं,