भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 719

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा? [पृ. ७०९]

है। अनन्त मूर्तियोंमें रहनेवाले भगवान् विश्वमूर्ति एवं अमूर्ति भगवान् इतने उदार और क्षमाशील तो हैं ही कि मूर्ति तोड़नेवालोंके कर्म ही उन्हें फल देते हैं। साधारण व्यक्ति जैसे असहिष्णु कोई भी शासक नहीं होते, फिर परमेश्वरकी तो बात ही दूसरी है। किन्हीं कर्मोंके फल अवसरके अनुसार ही होते हैं। 'ओडायर' की हत्या करनेवाला व्यक्ति तत्काल ही पकड़ लिया गया था; परंतु तत्क्षण ही उसे फाँसी नहीं दी गयी, न गोलीसे उड़ाया गया। बाकायदे न्यायालयमें न्याय हुआ। फिर दण्ड निश्चित हुआ। यथाकाल दण्ड दिया गया। जब प्राकृत शासकोंमें भी इतनी सहिष्णुता और काल-प्रतीक्षा होती है, तब फिर परमेश्वर ही सहिष्णु और कालप्रतीक्षक क्यों न हों? सम्राट्, स्वराट्, विराट् या गवर्नर, कमिश्नर आदि कोई भी अपने अपमान करनेवाले व्यक्तिको स्वयं पकड़ने या तत्क्षण दण्ड देनेमें नहीं प्रवृत्त होते, किंतु उनके कर्मचारी लोग ही उसे पकड़नेमें प्रवृत्त होते हैं। वे ही न्यायाध्यक्षका न्याय पाकर यथाकाल दण्ड देते हैं। इसी तरह ईश्वरकी मूर्तियोंका अपमान करनेवालोंको तत्क्षण ही परमेश्वर दण्ड नहीं देता; किंतु उसके कर्मचारी ही यथाकाल दण्ड देते हैं। कितने ही अज्ञ कहा करते हैं कि 'यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् हो तो मैं उसे गाली देता हूँ, उसकी मूर्तिको तोड़ता हूँ, मेरे सामने आये या मेरा मुँह बन्द कर दे।' परंतु सोचना यह चाहिये कि यदि बड़े-बड़े तपस्वी युगयुगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंकी तपस्याके पश्चात् उसका दर्शन पाते हैं, अनन्त तपस्याओंसे उसका अस्तित्व निर्णय कर पाते हैं, फिर वह इन अज्ञोंके कहनेमात्रसे कैसे प्रकट हो या उनके कथनानुसार उनका मुँह कैसे बन्द करे? क्या किसी सम्राट्को ऐसा कहनेपर वह प्रवृत्त होगा? वस्तुतः जैसे सावधान पुरुष उन्मादी या बालककी बातोंपर ध्यान न देकर उसपर कृपा ही करता है, वैसे परमेश्वर भी कृपा ही करते हैं, ‘जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥’ (रा०च०मा० ७।१।५) द्वित, त्रित आदि महर्षियोंने किसी यज्ञमें भगवान्‌को प्रकट करनेकी प्रतिज्ञा कर ली; परंतु जब भगवान् प्रकट हुए, तब वे शाप देनेको प्रस्तुत हुए, इसपर ऋषियोंने समझाया कि वे प्रभु भक्तिसे ही प्रकट हो सकते हैं, अहंकारसे नहीं। अतः ऐसा करना साहस है। हिरण्यकशिपु आदिको भी मारनेके लिये भगवान्‌का प्रह्लादकी भावनासे प्राकट्य हुआ— सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ (रा०च०मा० २।२६५।५) इसके अतिरिक्त वे भगवान्‌के नित्यपार्षद हैं, भगवान्‌की लीलाके अंग होकर ही उनका जन्म था। इसलिये उनके लिये भगवान्‌का प्राकट्य ठीक है; परंतु साधारण जन्तुओंके लिये तो वैसा ही होगा, जैसे मच्छरको मारनेके लिये तोपका दागना। जिन कीटोंको भगवान्‌की कोई भी शक्ति पूर्ण दण्ड दे सकती है, उनके कहनेसे भगवान्‌का प्रकट होना अत्यन्त ही अनुपयुक्त है। इसलिये मूर्तिभंजकोंको दण्ड देनेके लिये भगवान्‌का प्राकट्य नहीं हुआ और न कोई चमत्कारपूर्ण तात्कालिक घटना घटी। चींटी, मूषिका आदिकी प्रवृत्ति अज्ञानपूर्विका होती है, चौरादिमें भी अज्ञानकी ही बहुलता है। अतः उनकी स्थिति क्षम्य ही है; किंतु विद्वेषाभिनिविष्टचेष्टाओंको यथाकाल दण्ड भोगना पड़ा ही। सुना जाता है, औरंगजेबने मरते समय अपने पुत्रको पत्र लिखकर अपना दुःख बड़े दैन्यपूर्ण शब्दोंमें निवेदन किया और सोमनाथके मन्दिरको तोड़नेवाला महमूद गजनवी मरनेके समय अपने सामने सोने-चाँदीका ढेर लगवाकर (जिसे वह लूट लाया था) खूब रोया था। कहीं-कहीं लोगोंको बहुत सन्देह हो जाता है, जब वे देखते हैं कि अत्याचारी प्रसन्न हैं और सदाचारी धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं। परंतु यह निश्चय रखना चाहिये कि जैसे विषवृक्षमें विषका ही फल लगता है, अमृतफल नहीं; वैसे ही पापसे दुःख ही होगा, सुख नहीं; पुण्यसे सुख ही होगा, दुःख नहीं। हाँ, विलम्ब हो सकता है। कोई भी बीज अपना फल