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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 718

७०८ भक्तिसुधा युद्धमें प्रबल मल्लकी विजय, दुर्बलका पराभव होता है, वैसे ही किसी अनर्थको दूर करनेके लिये किये गये पुरुषार्थसे, अनर्थके जनकभूत प्रारब्ध कर्मसे संघर्ष होता है। यदि पिछले अनर्थारम्भक कर्मोंकी प्रबलता रही और अनर्थ-निवारक वर्तमान पुरुषार्थ कमजोर रहा तो पुरुषार्थकी व्यर्थता हो जाती है; परंतु यदि अनर्थारम्भक प्रारब्ध कर्मोंसे पुरुषार्थ प्रबल हुआ तो अवश्य ही सफलता मिलती है। भेद यही है कि प्रारब्ध कर्म अब घटाये-बढ़ाये नहीं जा सकते, पुरुषार्थ बढ़ाया जा सकता है। अतः पुरुषार्थसे कभी भी निराश होनेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी अनुष्ठान, पूजन, भजन यदि तीव्र संवेगसे शुद्ध प्रयोक्ताद्वारा सुचारु रूपसे किया जाय तो वह अवश्य सफल होता है। जहाँ कहीं विफलता होती है, वहाँ उपर्युक्त त्रुटियोंकी ही कल्पना उचित है। अनुष्ठानादिमें अविश्वास उचित नहीं है। नैयायिकोंने भी शास्त्रोंके कुछ कर्मोंकी विफलता देखकर उनमें कर्तृ-क्रियादि वैगुण्यकी ही कल्पना की है। जो कहा जाता है कि ‘सोमनाथ आदिके मन्दिर तोड़नेवालोंको कुछ भी दण्ड न मिला’ सो ठीक ही है। एक बार काशीके एक योग्य विद्वान्‌ने मुझसे कहा कि ‘आज दुर्गाजीकी चाँदीकी आँखोंको चोर चुरा ले गये। महाराज! यदि दुर्गाजीसे अपने ही आँखकी रक्षा न हुई, तब वे हम सबकी रक्षा कैसे कर सकेंगी?’ किसी एक और व्यक्तिने शिवजीपर चढ़े हुए अक्षत या फलोंको ले जाती हुई मूषिकाको देखकर यह समझ लिया था कि ‘मूर्तिपूजा व्यर्थ है, मूर्तिमें देवत्व नहीं है।’ ऐसी बातोंपर विचार करनेसे विदित होता है कि यह कितनी मोटी दृष्टिकी बात है। व्यापक परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र ही रहता है, सम्पूर्ण विश्व उन्हींमें रहता है। सोना, उठना, बैठना सम्पूर्ण कर्म उन्हींमें होता है। जिस तरह गर्भस्थ बालककी सम्पूर्ण चेष्टाएँ माँके गर्भमें ही होती हैं, फिर भी माता कुपित नहीं होती। वैसे ही जीवोंकी अनेक हलचलें उसी परमात्मामें होती हैं, ‘क्षमाशील परमात्मा सबको ही सहन करता है।’ उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) ब्रह्माजी कहते हैं—‘हे अधोक्षज! गर्भगत बालकके पादोत्क्षेपणको जननी क्या अपराध मानती है? यदि नहीं तो अस्तिनास्ति व्यपदेशसे भूषित यह सम्पूर्ण विश्व क्या आपकी कुक्षिसे बाहर है?’ भगवद्ध्यानके प्रभावसे एक ज्ञानी प्राणी भी देहाभिमानशून्य होता है। उसके एक बाहुमें कोई कण्टक चुभाता है, दूसरे बाहुमें कोई चन्दन-लिम्पन करता है। वह उतना उदार, सहनशील एवं देहाभिमानशून्य होता है कि न अनुकूलाचरणवालोंपर प्रहृष्ट हो, न प्रतिकूलाचरणवालोंपर कुपित हो; फिर भी अपने-अपने कर्तव्यके अनुसार ही उन सबको यथासमय फल मिलता है। जब एक देहवाले भगवद्भक्त ज्ञानीकी ऐसी स्थिति है, तब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान्‌का तो कहना ही क्या है। उसके तो अपरिगणित देह हैं और वह महाज्ञानी सर्वत्र असंग और अभिमानशून्य है। वह किसीके सम्मान या अपमानमें किस तरह क्षुब्ध हो सकता है? भावुक लोग शास्त्रोंके आज्ञानुसार उसकी अनन्तानन्त प्रतिमाओंका निर्माणकर मन्त्रोंसे आवाहन, प्रतिष्ठापनादिद्वारा उसकी आराधना करते हैं और अपने कर्मके अनुसार ही यथाकाल फल पाते हैं। शास्त्रके अनुसार मन्त्रों एवं आराधनाओंके अनुसार पूजा-ग्रहण करने और फल देनेके लिये ही भगवान्‌का उन मूर्तियोंमें प्राकट्य होता है। कोई उन मूर्तियोंका अपमान करके भगवान्‌का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। जिस तरह सूर्यपर निष्ठीवन करनेसे वह सूर्यपर न जाकर अपने ही ऊपर पड़ेगा, आकाशपर मुष्टिप्रहार या तलवारका चलाना बेकार है, वैसे ही भगवान्‌पर प्रहार या उनकी मूर्तियोंका तोड़ना बेकार

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