भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌की सब अलंकारादि सामग्री रसस्वरूप ही है। सौरभ्यसे उनका उद्वर्तन (उबटन), स्नेहसे अभ्यंजन (मालिश), माधुर्य अथवा स्वांग तेजसे स्नान, लावण्यसे मार्जन, सौन्दर्यसे अनुलेपन और त्रैलोक्यलक्ष्मी (शोभा)-से शृंगार होता है। श्रीवृषभानुनन्दिनी भी महाभावस्वरूपा हैं। सखियोंके प्रणयरूप सद्गन्धसे उनका उबटन तथा कारुण्यामृतधारा-लावण्यामृतधारा-तारुण्यामृतधारासे स्नान होता है, लज्जारूप श्यामपट्टवस्त्र वे परिधान किये रहती हैं और उज्ज्वल कस्तूरीविरचित उनकी देह है एवं कम्प-अश्रु-पुलक-स्तम्भादि उनके अलंकारस्वरूप रत्न हैं। श्रीकृष्णका परिधानरूप पीताम्बर श्रीराधारानी एवं श्रीराधारानीके कज्जल, मृगमद, कर्णोत्पल, नीलाम्बर आदि श्रीकृष्ण ही हैं— श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥ शृंगार रसकी अंगिता और उज्ज्वलता अनौपचारिकरूपसे राधा-कृष्णमें ही बनती है। कृष्णविषयक काम, क्रोध, भयादिका भी पर्यवसान कृष्णप्राप्तिमें ही है। जैसे कोई दीपबुद्धिसे चिन्तामणि ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होता है तो उसे चिन्तामणिकी ही प्राप्ति होती है, वैसे ही जारादि भावनासे भी जो भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवृत्ति होती है, उससे भगवत्प्राप्ति ही होती है। लौकिक जारधर्म परलोकादिको नष्ट करता है और भगवान् पंचकोश, अविद्या, काम, कर्मादिको नष्ट करते हैं, इसलिये जार हैं— तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि संगताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।११, १५) —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यद्यपि अनिमि- त्ता भक्ति ही कोशको जीर्ण करती है तो भी सनिमित्ता भक्तिका पर्यवसान भी अनिमित्ता भक्तिमें ही होता है। यद्यपि अनिमित्ता पराभक्ति स्वतःसिद्ध है तो भी जैसे कच्चा आम, पके हुए आमका कारण होता है, वैसे ही अपरा भक्ति पराभक्तिका कारण होती है। ऐसा माननेपर ही— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३; ११।३।३१) —इत्यादि वचनोंकी संगति लगती है। प्रेम वाणीका विषय नहीं रसात्मक प्रेम रसस्वरूप ही है। कहा भी गया है कि प्रादुर्भावके समय जिसने जरा भी हेतुकी अपेक्षा नहीं की, जिसके स्वरूपमें अपराधपरम्परासे हानि एवं प्रणामपरम्परासे वृद्धि नहीं होती, जो अपने निजी रसास्वादके सामने अमृतास्वादको भी तुच्छ कर देता है और जो तीनों लोकके दुःखका विनाश करता है, उस महान् प्रेमको वाणीका विषय बनाकर ओछा क्यों किया जाय— प्रादुर्भावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि क्षीयेतापि न चापराधविधिना नत्या न यो वर्धते। पीयूषप्रतिवादनस्त्रिजगतीदुःखद्रुहः साम्प्रतं प्रेम्णास्तस्य गुरोः किमद्य करवै वाङ्निष्ठतालाघवम्॥ वाणीका विषय बनाते ही प्रेम या तो हल्का हो जाता है या अस्त हो जाता है। दो रसिकोंका प्रेम एक दीपकके समान है, जो उनके हृदयरूप गृहोंको निश्चल रूपसे प्रकाशित करता है। यदि इसे वाणीरूप दरवाजेसे बाहर कर दिया जाय तो या तो वह बुझ जाता है या मन्द हो जाता है— प्रेमा द्वयो रसिकयोरपि दीप एव हृद्देश्म भासयति निश्चलमेव भाति। द्वारादयं वदनतस्तु बहिष्कृतश्चे- न्निर्व्वाति शीघ्रमथवा लघुतामुपैति॥