भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

६९२ भक्तिसुधा रसता पुष्ट नहीं होती, जैसी भगवद्विषयक रतिकी। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने कहा है कि—भगवद्विषयिणी रति परिपूर्णरसस्वरूप होनेके कारण क्षुद्रकान्तादिविषयक रतिसे वैसी ही बलवती है, जैसे खद्योतोंसे आदित्यप्रभा— परिपूर्णरसा क्षुद्ररसेभ्यो भगवद्रतिः। खद्योतेभ्य इवादित्यप्रभेव बलवत्तरा॥ (भक्तिरसा० उल्लो० २ कारि० ७७) विषय और आश्रय दोनों या दोनोंमेंसे एक यदि रसात्मक हो तो रति भी विशुद्ध रसस्वरूप होती है। विशेषतः समुद्वेलित सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररससारसर्वस्व भगवान् ही मनोवृत्तिमें विशिष्ट रसभावको प्राप्त करते हैं। जैसे रसमें रसोद्रेककी कल्पना होती है, वैसे ही यहाँ भी कल्पना की गयी है। भगवद्धृदयस्थ पूर्णानुराग-रससारसागर- समुद्भूत, निर्मल, निष्कलंक चन्द्रस्वरूपिणी श्रीवृष- भानुनन्दिनी राधारानी एवं श्रीराधारानीके हृदयमें विराजमान श्रीकृष्णविषयक प्रेमरससारसागर-समुद्भूत चन्द्ररूप व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं। अतः यहाँ प्रेम सदानन्दैकरसस्वरूप है; क्योंकि विषय-आश्रय दोनों ही रसस्वरूप हैं, जबकि अन्यत्र विषय-आश्रय आदि विजातीय होते हैं, रसस्वरूप नहीं। इसी तरह भगवान्‌की लीला, लीला करनेका स्थान, लीलापरिकर और उद्दीपनादि-सामग्री भी रसस्वरूप ही है। सच्चिदानन्द- रससारसरोवरसमुद्भूत सरोज, केसर, पराग एवं मकरन्दस्वरूप व्रज, व्रजसीमन्तिनीवृन्द, श्रीकृष्ण एवं उनकी प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी सभी रसात्मक ही सिद्ध होते हैं— 'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चिद्- घनतामुपैति।' 'सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः॥' —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यह सारी बातें ब्रह्मवादमें ही बन सकती हैं, इसलिये ब्रह्मवित्तम श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भक्तिरसायन' ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही बनाया है। भक्तिरसामृतके रसिक अन्य महानुभावोंने भी कहा है कि मुक्त मुनि जिस फलको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परेशान रहते हैं, उसीको देवकीरूप वृक्षने फला, यशोदाने पकाया तथा गोपियोंने यथेष्ट उसका उपभोग किया। यशोदाकी मंगलमयी गोदमें चिदानन्दसरोवरसे नीलकमलके समान श्यामतेज प्रकट हुआ। अन्य भक्त कहते हैं—वह ऐसा फल था, जिसका भृंगोंने आघ्राण नहीं किया, वायुने जिसका सौगन्ध्य नहीं उड़ाया, जो जलमें उत्पन्न नहीं हुआ, लहरियोंके कणसे जो टकराया नहीं और कभी किसीने जिसे कहीं देखा नहीं। एक भक्त कहता है—निगम वनमें फल ढूँढ़ते- ढूँढ़ते यदि नितान्त खेदयुक्त हो गये हों तो इस उपदेशको सुनें—उपनिषदोंके परम तात्पर्यका विषय प्रत्यक्चैतन्या- भिन्न परब्रह्म गोपियोंके घरमें उलूखलसे बँधा पड़ा है। दूसरा भक्त कहता है—सखि! एक कौतुककी बात सुनो—श्रीमन्नन्दरायके प्रांगणमें धूलिधूसरित होकर वेदान्तसिद्धान्त थेई-थेई करके नृत्य करता हुआ मेरे द्वारा देखा गया है। एक अन्य भक्त कविने कहा है कि श्यामल मोहमयी मूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण मानो गोपांगनाओंके पुंजीभूत प्रेम ही हैं या यदुवंशियोंके मूर्तिमान् सौभाग्य हैं अथवा श्रुतियोंके गुप्तवित्त ब्रह्म हैं— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दसरसो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिव तद्दौजः समभवत्॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु बल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। गोधूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ पुञ्जीभूतं प्रेमगोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्।