भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भक्तिरसामृतास्वादन ६९१ द्वारा खिंच जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्‌के श्रीचरणारविन्द किंजल्क- मिश्रतुलसीदलमकरन्दके हृद्गत होते ही सनकादिकोंके निर्विकार मनमें भी क्षोभ हो गया। स्वसुखनिभृत- चेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽप्यजितरुचिरलीला- कृष्टसारस्तदीयम्। (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) स्वस्वरूपभूत परमानन्दसे भरपूर चित्तवाले तथा निरस्त समस्तद्वैतजाल श्रीशुकाचार्य भी भगवान्‌की लीलाओंपर मुग्ध होकर आकर्षित हो उठे। औरकी तो कौन कहे, स्वयं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान् ही अपने विचित्र सौन्दर्य, माधुर्यमें मुग्ध हो जाते हैं— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भगवान् अपनी अचिन्त्य, अद्भुतयोगमायाके बलसे भूषणोंको भी भूषित करनेवाले, मंगलमय श्रीअंगको धारण करते हैं, जिससे वे स्वयं मोहित हो जाते हैं, उन्हें स्वयं विस्मय होने लगता है। लोकपालकिरीटकोटिपीडितपादपीठ असाम्यातिशय प्रभु जिस समय श्रीमन्नन्दरानीके मणिमयस्तम्भों या प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही श्रीमूर्तिको देखते हैं, उस अपने ही सौन्दर्य-माधुर्यपर मुग्ध होकर, उसके परिरम्भणके लिये व्यग्र हो उठते हैं और उसमें असफल होनेपर श्रीअम्बाका वदन विलोककर रुदन करने लगते हैं— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ फिर योगीन्द्र मुनीन्द्रगण उसपर मुग्ध हो जायें, इसमें आश्चर्य ही क्या ? परंतु इससे ज्ञानकी न्यूनता नहीं होती; क्योंकि ज्ञान और ज्ञानी श्रीभक्ति महारानीको सदा पूजें, इसीमें तो उनकी बड़ाई है। योग्य पुत्रका यही कर्तव्य है। ऐसे ही पुत्रसे पुत्रवती युवती धन्य होती है। भक्तिरसामृतास्वादन श्रीभगवद्धर्मसे द्रुत शुद्ध हृदयमें प्रादुर्भूत निरुपम सुखसंविद्रूप, दुःखकी छायासे विनिर्मुक्त श्रीभक्तिका माहात्म्य यत्र-तत्र शास्त्रोंमें वर्णित है। सर्वाधिष्ठान, परमानन्दस्वरूप, औपनिषद परम पुरुषकी रसस्वरूपता 'रसो वै सः' इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। लौकिक आनन्दोंमें भी उसी रसस्वरूप भगवान्‌की आंशिक अभिव्यक्ति होती है। रसके विषय एवं आश्रयकी मलिनतासे शुद्ध रसमें भी मालिन्यकी प्रतीति होती है। भक्तिरसायनकारने कहा है—'किञ्च न्यूनाञ्च रसतां याति जाड्यविमिश्रणात्' (१।१३) अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्य ही द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणकी वृत्तिपर उपारूढ़ होकर भावरूपताको प्राप्तकर पीछे रसस्वरूप हो जाता है। लौकिक रस परमानन्दस्वरूप नहीं हो सकता, किंतु भक्तिरसमें अनवच्छिन्न- चिदानन्दघन भगवान्‌की स्फूर्ति होती है, अतः वह परमानन्दस्वरूप है। इसलिये जो लोग श्रीकृष्णविषयक रतिको रसरूप नहीं, भावरूप ही मानते हैं—क्योंकि देवताविषयक रति भावस्वरूपा ही होती है—उनका मत ठीक नहीं है; क्योंकि श्रीकृष्णभिन्नदेवताविषयक रति भावरूपा होती है। भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्द- स्वरूप हैं, अतः कृष्णविषयक रति रसरूपा ही होगी, भावरूपा नहीं। बल्कि कान्तादिविषयक रतिकी वैसी