भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्मतत्त्वमें विशिष्टमाधुर्यका अनुभव होता है; परंतु सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म- भावापन्न मुक्तको तो अभेदेन अनन्त, अखण्डरसात्मक वस्तुकी अनुभूति होती है। विवेकियोंका कहना है कि यदि पुष्पमें घ्राणशक्ति हो तब ही पुष्पके मनोरम सौगन्ध्यका पूर्णरूपसे आस्वादन किया जा सकता है। इस दृष्टिसे अत्यन्त अभेदमें ही अनन्त- रसकी अनुभूति होती है। फिर भी जीवन्मुक्तकालमें अन्तःकरणादि उपाधियाँ विद्यमान ही रहती हैं। अतः उसके द्वारा पूर्णरूपसे अपरिमितानन्दकी अनुभूति नहीं होती। दिव्यलीलाशक्तिके योगसे कहीं अधिक रसकी अनुभूति होती है। इसके सिवा रागानुगाप्रीतिके लिये सगुणब्रह्मकी उपासनाकी जाती है। इसीलिये मुक्ति आदिसे निरपेक्ष होकर, जीवन्मुक्त लोग भगवान्‌के सगुणरूपमें प्रेम करते हैं— अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ (रा०च०मा० ३।१३।१३) आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) आत्माराम एवं चिज्जडग्रन्थि जिनकी छूट गयी है, ऐसे मुनि भी उरुक्रम भगवान्‌में अहैतुकी भक्ति करते हैं। कृतकृत्य, पूर्णकाम, आप्तकाम, परम निष्काम होनेपर भी भगवान्‌के अद्भुतगुणोंके प्रभावसे भगवान्‌में आकर्षित होते हैं। यद्यपि पूर्णकामकी भक्तिमें प्रवृत्ति अनुचित ही जान पड़ती है तथापि भगवान्‌के अद्भुतगुण ही इस अनौचित्यका समाधान करते हैं। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में अद्वैतवादी ज्ञानीको भक्तिका प्रकार बतलाया गया है। 'यत्सुभक्तैरति- शयप्रीत्या कैतववर्जनात्, स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वाऽपि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽ त्यन्ततत्परैः।' सुभक्त ज्ञानी लोग फलानुसन्धानरूप कैतव (कपट)-से वर्जित होकर, परमतत्त्वकी आराधना करते हैं। अज्ञानीके लिये तो किसी-न-किसी फलकी कामना रहती ही है। जीवन्मुक्तकी भी भगवान्‌के भजनमें अभिरुचि यहाँ प्रश्न होता है कि जब प्रयोजनके बिना मन्दकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, फिर कृतकृत्य, जीवन्मुक्त [L4