भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) शब्द-स्पर्शादि विषयोंके उपलम्भसे अनुमित होनेवाले श्रौतस्मार्तकर्मपरायण आन्तर-बाह्य करणोंकी सत्त्व (सत्त्वोपाधिक विष्णु किंवा सत्तामात्र परब्रह्म)- में जो स्वाभाविकी वृत्ति है, वही भक्ति है। अर्थात् श्रौतस्मार्त कर्मोंसे शुद्धनिर्मल बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणकी ब्रह्मप्रवणता या भगवत्परायणता ही भक्ति है। यह भक्ति अन्नमयादि पंचकोशोंको उसी तरह जला डालती है, जैसे भक्षित अन्नको जठराग्नि पचा डालती है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) निर्गुणब्रह्म या सगुणब्रह्ममें, तत्रापि काम, क्रोध, स्नेहसे, यथा कथंचित् मनकी उन्मुखता ही भक्ति है। श्रीव्रजांगनाओंने भगवद्वियोगाग्निसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीर, अन्नमयादि पाँचों कोशोंको जलाकर विशुद्ध परमानन्दरसात्मक ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। भक्तिके कुछ लक्षण सगुण, निर्गुणमें समान हैं। कुछ सगुण भक्तिमें ही पर्यवसित होते हैं। ज्ञानीको निर्गुण परब्रह्ममें तो स्वाभाविकी भक्ति होती ही है, साथ ही सगुण भक्ति भी होती है। इस आशयसे कहा गया है- तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) कुन्तीका कहना है कि हे देव! आप अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्ति-योगविधान करनेके लिये सगुण, साकारस्वरूप ग्रहण करते हैं। यद्यपि आपका निर्गुण, निराकार, निर्विकारस्वरूप समस्त प्राणियोंके निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है तथापि अनादि महामायाके प्रभावसे उसकी परमानन्दरसरूपता परप्रेमास्पदता तिरोहित-सी है। जैसे मधुर मिश्री भी पित्तदोषोपहत रसनावाले प्राणीको कटु प्रतीत होती है, वैसे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्गुणब्रह्ममें प्रेमकी कमी भासित होती है। इसीलिये विवेकी लोग यह चाहते हैं कि जैसे, अविवेकियोंको विषयोंमें, कामुकको कामिनीमें उत्कट प्रेम होता है, वैसे ही भगवान्में मनकी आसक्ति हो। इसीलिये कहा गया है कि- मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) कोटि-कोटि मुक्त-सिद्धोंमें भी नारायणपरायण दुर्लभ हैं। ज्ञानियोंमें भी प्रारब्ध कर्म अवशिष्ट रहनेके कारण दृश्य द्वैतदर्शनकालमें शुद्धचिदात्मतत्त्वकी पूर्ण रसात्मकताका अनुभव और निरतिशय प्रेम नहीं व्यक्त होता। इसीलिये सविशेष साकार स्वजनरूपसे प्रकट परमात्मतत्त्वमें शुद्ध भक्ति, प्रीतिकी अपेक्षा होती है। इसलिये ही ज्ञानी महानुभावोंका भी भगवान्के मधुर चरित्रों और मंगलमयी मूर्तिमें आकर्षण होता है, परंतु इतनेसे उनकी ज्ञाननिष्ठा या निर्गुण सिद्धान्तसे प्रच्युति मान लेना केवल बालकपन है। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥ (रा०च०मा० १।३३८।५) जहाँ यह बात कही गयी है, वहीं परम ब्रह्मनिष्ठ विदेहके मोह और ज्ञान-वैराग्यके शैथिल्यकी बात कही गयी है। वह केवल प्रभु रघुनाथके स्नेहकी महिमा है। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० २।२८६।८; १।२१६।५) इत्यादि वचनोंका भी यही तात्पर्य है कि केवल अन्तःकरणसे अनुभूत निर्गुणब्रह्मकी अपेक्षा दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्ममें विशिष्टसरसताकी अनुभूति होती है। जैसे आदित्यमण्डलका कोई केवल नेत्रसे अनुभव करता है, परंतु कोई दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रोंसे उसी आदित्यका अनुभव करता है। प्रथम अनुभवसे दूसरे अनुभवमें जैसे विशेषता होती है, वैसे ही केवल अन्तःकरणसे तत्त्वानुभवकी अपेक्षा