भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६८ भक्तिसुधा मिलनेसे किनका विघटन होगा, यह जानना भी कठिन ही नहीं, अर्वाग्दर्शी लोगोंके लिये यह असम्भव ही है। ऐसे स्थलोंमें सर्वज्ञ वैदिक ऋषियोंके ग्रन्थोंसे ही उन- उन मूलों, औषधोंका गुण, महत्त्व आदि जाना जा सकता है। उसी तरह वर्णों (अक्षरों)-की भी बात है। वर्णोंसे मेल-जोलके भेदमें अर्थोंमें भेद होता है। किन्हीं वर्णोंके संश्लेष-विश्लेषसे किन्हीं शक्तियोंका ह्रास और किन्हींका विकास होता है। पचास वर्णोंके ही संश्लेष-विश्लेषसे दुनियाकी अपरिगणित ग्रन्थराशि तैयार हुई है। वर्ण वही हों, परंतु उनके संश्लेषवैचित्र्यसे अर्थमें भेद हो जाता है। राजा—जारा, नदी—दीन इत्यादि स्थलोंमें वर्णोंमें भेद न रहनेपर भी संश्लेषमें भेद होनेसे अर्थमें भेद हो जाता है। संश्लेष-विश्लेषके कारण ही उन्हीं वर्णोंसे भिन्न-भिन्न भाषाएँ बनीं। वर्णोंके जोड़-मेलके वैलक्षण्यसे ही भाषण और ग्रन्थोंमें वैलक्षण्य होता है। एक छोटी-सी पुस्तक बड़े मूल्यमें मिलती है, कोई बड़ी-सी पुस्तक भी साधारण मूल्यमें प्राप्त होती है। किसी भाषणका साधारण ही मूल्य होता है, किसी शास्त्ररहस्यज्ञ विद्वान् या वकील—बैरिस्टरके भाषणका मूल्य चमत्कारमूलक ही है। शब्दोंका प्रभाव स्पष्ट ही है। किन्हीं वाग्विन्यासोंसे मित्र भी शत्रु बन जाते हैं, किन्हींसे शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। तात्पर्य यह कि वर्णोंके संश्लेष-विश्लेषकी विचित्रतासे शब्दोंमें विचित्रता और उनसे प्रभावोंमें भी वैलक्षण्य हुआ करता है। उनमें भी कुछ शब्द तो अर्थबोध कराकर उसके द्वारा विचित्र प्रभाव पैदा करते हैं, परंतु कोई अर्थबोधके बिना ही श्रवणमात्रसे आनन्दित करते हैं, उसी अर्थको एक शुष्क व्यक्ति 'शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे' कहकर बोलता है, उसीको एक सरस व्यक्ति 'नीरसरुहिरह विलसति पुरतः' कहकर बोलता है। स्वरविशेष आदिकी महिमासे भी शब्दों और भावोंमें रोचकता आ जाती है। उसके द्वारा प्रभाव भी अद्भुत पड़ता है। विराम (टोन या तर्ज, मुखाकृति, मुद्रादि)-के भेदसे भी अर्थके भाव- प्रभावमें भेद पड़ा करता है, परंतु कोई-कोई शब्द अर्थबोध बिना, स्वरसम्पत्ति आदि बिना, रोचकता बिना अपना प्रभाव जापक या श्रावकपर पैदा करते हैं। इसी कोटिमें मन्त्र आदि आते हैं। कितने शाबरी मन्त्र विभिन्न प्राकृत भाषाओंमें हैं कि उनका अर्थ आदि कुछ भी नहीं प्रतीत होता, परंतु उनके प्रयोगका फल विलक्षण होता है। गुग्गा गुग्गा तेरी थाली। जा बैठी पिप्पलकी डाली॥ —इत्यादि सर्पके मन्त्र हैं। उनके अर्थोंका पता नहीं लगता। फिर भी फल होता ही है। गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते हैं— कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥ अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥ (रा०च०मा० १।१५।५-६) शाबरी मन्त्रोंके अक्षर अनमिल, उनके अर्थ और पुरश्चरणका सम्बन्ध नहीं, फिर भी फल होता ही है। यही क्यों, गायत्री मन्त्रका हिन्दी, उर्दू, इंगलिश आदि भाषाओंमें अनुवाद करके जप किया जाय तो वह चमत्कार नहीं होता, परंतु यदि अर्थ न जानकर भी पवित्र होकर, पवित्र स्थानमें नियमपूर्वक जप किया जाय तो शान्ति आदि फलोपलब्धि प्रत्यक्ष होती है। मन्त्रजपके अधिकारी-अनधिकारी कोई मन्त्र तो देश, काल, आचार, विचार, व्यक्तिविशेष आदिकी अपेक्षा नहीं रखते हैं। जैसे भगवान्के श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीदुर्गा, श्रीशिव आदि नाम। इनमें किसी भी विशिष्ट नियमोंकी अपेक्षा नहीं होती। भाव-कुभाव, अनख-आलस जिस किसी तरह भी जप करनेसे लाभ होता है। इन्हींके लिये कहा जाता है कि भगवान्के भजन या दुष्ट भावसे भी नामोच्चारणसे पाप क्षय होता है, जैसे अनिच्छासे भी संस्पृष्ट होनेसे अग्नि जलाती ही है— हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः। अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥ × × ×