भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माननेवाला प्राणी मुक्त हो जाता है। मैं कुछ भी नहीं कर सकता, अत्यन्त दीन- हीन प्राणी सर्वदा पुरुषार्थलाभ नहीं कर सकता। भगवदाश्रित होकर भगवद्दत्त साधनोंका आलम्बन करके सब कुछ कर सकता हूँ—ऐसा निश्चयवान् प्राणी पुरुषार्थलाभ कर सकता है। इसीलिये श्रुति प्रोत्साहन देती है— उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा निश्चयमात्मनः॥ अगर अनुष्ठान न भी हो सके, तब भी तत्संकल्प परम लाभदायक होते हैं, अतः 'धर्मकी जय हो, अधर्मका नाश हो, प्राणियोंमें सद्भावना हो, विश्वका कल्याण हो,' ऐसे संकल्पोंका प्रवाह चलाना देश, समाज, विश्व एवं अपने लौकिक, पारलौकिक सर्वप्रकारके कल्याणका परम कारण है। सिद्ध पुरुषोंका एक ही संकल्प पर्याप्त होता है, परंतु सर्वसाधारणोंके अकेले संकल्पमें ऐसा सामर्थ्य नहीं होता। अतः सामूहिक संकल्प आवश्यक है। एककी शक्ति अकिंचित्कर होनेसे ही, कलिमें संघशक्तिका महत्त्व वर्णित है। 'संघे शक्तिः कलौ युगे' विश्व-कल्याण और धर्मकी जयके लिये अधिक संख्यामें द्रव्यदान करनेसे भी संकल्प बनना बड़ी चीज है। तीन सौ साठ दिन— एक-एक मिनट भी धर्मजयका संकल्प बहुत लाभदायक हो सकता है। द्रव्यदान कोई कर सकता है, परंतु संकल्प सभी चला सकते हैं। किसी विषयमें कायिक- वाचिक—किसी भी प्रयत्नके करनेपर उस विषयमें प्रेम हो जाता है। उसकी सुरक्षामें प्रसन्नता, बिगड़नेमें दुःख होता है। विशेषतः मानस परिश्रम कर लेनेपर तो उसमें और अधिक अनुराग हो जाता है। किसी कार्यमें अनुराग हो जाना ही सबसे बड़ा कार्य है। धर्मके प्रति ममता होती है। फिर यह भी ध्यान आता है कि जब हम धर्मकी उन्नति चाहते हैं, तब उसका अनुष्ठान भी करना चाहिये। अधर्मकी निवृत्ति चाहते हैं, तब उससे बचना भी चाहिये। विचारके उपरान्त वह स्वयं और अपने इष्ट मित्रोंको अधर्मसे निवृत्त करके धर्ममें प्रवृत्त करेगा। बस, ऐसी ही अधिक लोगोंकी प्रवृत्ति हो जानेसे धर्मकी रक्षा होती है। सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे संकल्पका बल दुगुना हो जाता है संकल्पके साथ-साथ यदि मन्त्रका भी बल होता है तो सुवर्णमें सुगन्ध हो जाती है। संकल्प बुरे कर्मोंसे कमजोर हो जाता है। अच्छे कर्मोंसे भावना या संकल्प मजबूत होते हैं। तपस्या, सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे जुड़कर संकल्पका बल दुगुना हो जाता है। मनु लिखते हैं—ब्राह्मण केवल जपसे ही सिद्ध हो सकता है। और कुछ करे या न करे। जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः। कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते॥ (मनुस्मृति २।८७) भगवान् भी गीतामें जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाते हैं— 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।' (गीता १०।२५) मन्त्रोंकी महिमा सभी शास्त्रोंने गायी है, अन्यान्य सम्प्रदायके लोग भी मन्त्रकी महिमा मानते हैं। ईसाई, पारसी, मुसलमान, यहूदी, चीनी, जापानी, बौद्ध, जैन आदि भी मन्त्रोंकी महिमा और उनके जपसे शान्ति, चमत्कार, पारलौकिक लाभ मानते हैं। महात्मा तुलसीदासजी लिखते हैं— मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥ (रा०च०मा० १।२५६) छोटा-सा भी अंकुश महामत्त गजराजको वशमें रखता है। परम लघु मन्त्र विधि-हरि-हरको वश कर लेता है। जैसे संसारके विविध तृणोंमें विचित्र शक्तियाँ होती हैं, कोई तृण किसी रोगको दूर कर सकता है, कोई किसी रोगको। एक-एक तृणोंमें कैसी-कैसी शक्तियाँ हैं, इसका पता लगाना सिवा योगियोंके औरोंको कठिन है। पुनश्च किन-किन तृणोंके मिलनेसे कितनी और किन- किन शक्तियोंका विकास होगा, किन-किन तृणोंके