भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 676

६६६ भक्तिसुधा लगता। संकल्पकी अनेकरसतासे ही विश्वकी अनेकरसता भी अनुभूत होती है। इसीलिये यद्यपि कहीं विश्वको अव्यय और सनातन भी कहा गया है। 'एषोऽश्वत्थः सनातनः।' (कठोपनिषद् २।३।१) 'अश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।' (गीता १५।१) तथापि विश्वकी क्षणभंगुरता अबाधित ही रहती है। कूटस्थ नित्य केवल एक आत्मा ही है। परिणामी पदार्थ प्रवाहरूपसे ही नित्य है। पूर्वरूपपरित्यागपूर्वक रूपान्तरापत्ति ही परिणाम है। अतः परिणामी पदार्थ कूटस्थरूपसे नित्य कदापि नहीं हो सकते। स्थूल जगत् कभी-कभी हिमालयके स्थानमें समुद्र, समुद्रके स्थानमें हिमालय हो जाता है। मरुस्थानमें गंगा और गंगाके स्थानमें मारवाड़ दीखने लगता है। संकल्प या भावनाकी शुद्धतासे ही प्राणियोंकी शुद्धि और भावनाकी ही अपवित्रतासे अपवित्रता होती है। अतः विवेकियोंने मनःकृत कर्मको ही कृत माना है— मनसा कृतमित्येव कृतमाहुर्मनीषिणः। तेनैवालिङ्ग्यते कान्ता तेनैव दुहितापि च॥ मनसे किये हुए कर्मको मनीषी लोग कृत समझते हैं। उसी अंगसे कान्ताका आलिंगन किया जाता है, उसीसे दुहिताका भी आलिंगन किया जाता है। भेद है तो केवल भावनाका ही भेद है। यद्यपि कहा जाता है कि मानससे ही कुशल कर्मोंकी सफलता होती है, अकुशल निषिद्ध कर्मोंके मानस- अनुष्ठान अकिंचित्कर रहते हैं। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥ (रा०च०मा० ७।१०३।८) कलियुगका यह पुनीत प्रताप है कि इसमें मानस पुण्यकर्मोंका फल होता है, पापकर्मोंका नहीं। परंतु इन वचनोंका आशय और है—यदि मनसे पापकर्म होते रहेंगे अर्थात् मानसकर्मका अभ्यास हो जायगा, तब देहेन्द्रियादिसे भी पापकर्म अवश्य ही हो जायँगे। अतः मनसे सर्वदा पापकर्मोंका परित्याग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये, इससे बुरे कर्म होनेका अवकाश न रहेगा। शुद्ध कर्म ही शरीरसे भी होने लगेगा। मानस पुण्य होता है, यह कहनेका प्रयोजन यही है कि प्राणीके मनसे पुण्यकर्म किया जाय, जिससे देहेन्द्रियादिसे भी पुण्यकर्म होने लग जायँ। मानस-पाप नहीं होता—यह कहनेका भी यह प्रयोजन है, अगर असावधानीसे कुछ मानस पाप हो जायँ तो भी देहेन्द्रियादिसे उन कर्मोंको न होने दे। ऐसा न समझ ले कि मनसे कर्म होनेपर पाप हो ही गया, फिर अब शरीरसे भी क्यों न कर लिया जाय। किंतु यह समझना उचित है कि पुण्य मानस भी होता है। अतः उसका संकल्प चलाये और पाप मानस कर्मसे नहीं होता, अतः यदि कथंचित् असावधानीसे मनद्वारा बुरा कर्म हो गया तो भी देहादिसे बुरे कर्म न होने देकर बड़ी सावधानीसे मनद्वारा भी बुरे कर्मोंको न होने दे। यदि मानस कर्म करता रहेगा तो अभ्यास बढ़ जानेपर न चाहते हुए भी बुरे कर्मोंको करना ही पड़ेगा। जैसे गमनजन्य वेगके बढ़ जानेपर गमन क्रियामें स्वतन्त्र गन्ताकी भी स्वतन्त्रता तिरोहित हो जाती है, उसी तरह मननजन्य वेगके बढ़ जानेपर मनन क्रियामें स्वतन्त्र मन्ताकी भी मननमें स्वाधीनता छिप जाती है। बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक इतना ही नहीं, किंतु पराधीनताका भी स्पष्ट अनुभव होने लगता है। इसी तरह बुरे कर्मोंके संकल्पोंको धाराबद्ध हो जानेपर उनका रोकना अपने वशमें नहीं रहता। इसलिये अच्छे कर्मोंके संकल्पोंको चलाना और बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक है। सारांश यह है कि संकल्प ही विश्वका मूल है। उसीपर उन्नति, अवनति दोनों निर्भर हैं। इसीलिये शास्त्रोंने बार-बार उत्तम विचार, दृढ़ संकल्पकी महत्ता गायी है। बन्ध-मोक्षमें भी भावनाकी ही प्रधानता दी गयी है। अपनेको कर्ता, भोक्ता, सुखी- दुःखी, बद्ध माननेवाला प्राणी बद्ध रहता है। अपनेको