भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 675

संकल्प-बल ६६५ नाम-गोत्रकीर्तन करके संकल्प किया जाता है। वही पाठ-जप आदि जिस संकल्पसे किया जाता है, वैसा उसका फल होता है। भले ही रामायण, सप्तशती आदिमें कुछ भी वर्णन हो; परंतु जिस संकल्पसे उनका पाठ, जप, सम्पुट आदि होगा, वही उनका फल होगा। इसलिये एक संकल्पसे ही अधिक अनुष्ठान होना आवश्यक है। जहाँतक हो संकल्पके शब्द भी एकहीसे हों और वे संस्कृतके हों, प्रभावशाली हों। धर्मरक्षा एवं विश्वकल्याणके निमित्त जहाँतक हो, सभी विश्वकल्याणकारियोंको ऐसे शुभ-संकल्पसे अनुष्ठानादि करना चाहिये। यद्यपि संकल्प मानस है तथापि शब्दके साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। पवित्र शब्दों—आर्ष शब्दोंसे संकल्पकी शक्ति बढ़ जाती है। योगियोंका संकल्प-बल ईश्वर और योगीका संकल्प विचित्र सामर्थ्यसम्पन्न होता है। विभिन्न योगियोंने अपने संकल्पसे विश्वका निर्माण कर लिया है। परमेश्वरका ज्ञान या संकल्प ही उनका (परमेश्वरका) तप समझा जाता है। उनके ज्ञानरूप तपस्यासे ही विश्व बन जाता है। उसी तरह वसिष्ठ आदि महर्षियोंने भी संकल्पस्वरूप तपस्यासे विश्वनिर्माणका अनुभव किया था। एक बार वसिष्ठजी निर्जीव आकाशमें मनोमय कुटीरका निर्माणकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित हुए। बहुत कालके अनन्तर जब उनका समाधिसे उत्थान हुआ, तब उन्होंने एक युवतीका वीणानिनादसमन्वित मधुर गीत सुना। उन्हें आश्चर्य हुआ कि अत्यन्त निर्जीव प्रदेशमें हम समाधिस्थ हुए, यहाँ युवतीका गीत कैसे सुनायी दे रहा है! जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली तो कुछ भी दिखायी न दिया। जब उन्होंने अन्तर्मुख होकर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा तो मालूम हुआ कि वह किसी दूसरे ब्रह्माण्डके आवरणमें स्थित होकर गायन कर रही है। जब वसिष्ठजीने उससे वार्तालाप करना चाहा, तब उसने बड़े ही मधुर शब्दोंमें अपनी वेदना सुनायी। वह एक ब्रह्माण्डके विधाता ब्रह्माकी तरुणी वासना थी। ब्रह्मा तो वृद्ध हो गये, परंतु वह वासना तरुणी हो रही थी। ब्रह्मा विरक्त होकर ब्रह्माण्डका उपसंहार करके ब्रह्मलीन होना चाहते थे। उस वासनाकी ओर उपेक्षा- दृष्टिसे देखते थे। यह उसे अच्छा नहीं लगता था। वह चाहती थी कि वसिष्ठजी चलकर ब्रह्माको समझाकर उन्हें उसके अनुकूल कर दें। कुतूहलवशात् वसिष्ठने उसके साथ जाना पसन्द किया और योगबलसे एक शिलाके भीतर स्थित ब्रह्माण्डमें दोनोंने ही प्रवेश किया। वह वासना सब लोकोंका लंघन करती-करती ब्रह्माके पास पहुँची और ब्रह्माजीको समाधिसे उठाया। ब्रह्माने वसिष्ठको देखकर उनका आतिथ्य किया। पुनश्च वसिष्ठके पूछनेपर उन्होंने सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया और कहा कि यह मेरी ब्रह्मा बननेकी वासना थी, मेरी विरक्ति इसे असह्य है, परंतु अब मैंने तत्त्वदृष्टिसे इसे और उसके परिणाम जगत्को जान लिया है, अतः इस निस्सार संसारका उपसंहार करना चाहता हूँ। उस समय वसिष्ठने सम्पूर्ण उपसंहारकी लीला देखी। यद्यपि कल्पना और उसके उपसंहारमें कुछ क्रम और कार्यकारणभाव प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः केवल दृढ़ अभिनिवेशपूर्ण वासनासे अतिरिक्त और कहीं भी कुछ भी नहीं। मनसे पापकर्मोंका परित्यग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये संकल्पकी विचित्रतासे ही जगत्की विचित्रता होती है। संकल्प ही बाह्य प्रपंचके रूपमें प्रकट होता है। जैसे काष्ठके भीतर विविध पुत्रिका विद्यमान रहती हैं, वही कारक व्यापारसे प्रकट होती है, वैसे ही मनके संकल्पमें ही लीन सम्पूर्ण विश्व उचित कारणकलापोंसे प्रकट हो जाता है। जैसे मिट्टी या सुवर्णके होनेपर ही घट-शरावादि और कटक- मुकुटकुण्डलादि हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; उसी तरह संकल्पके रहनेपर ही विश्वकी उपलब्धि होती है, अन्यथा नहीं। जब मनकी हलचल है, तभी द्वैत है। मनकी हलचल न होनेपर विश्वका पता ही नहीं