भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 674

६६४ भक्तिसुधा क्रमेण स्थूल और कठोर हो जाती है, उसी तरह सूक्ष्म मनोमय जगत् ही अभिनिवेशके कारण स्थूल हो जाता है अर्थात् भावना ही अभिनिवेशकी अधिकतासे गाढ़ होते-होते स्थूल प्रपंच बन जाती है। उसके स्थूल या सूक्ष्म बनानेकी पद्धतियाँ जिन्हें मालूम हैं, वे लोग सहजमें ही स्थूलको सूक्ष्म और सूक्ष्मको स्थूल बना लेते हैं। जैसे आतप या अग्निसे बर्फ जलभाप आदि बनकर फिर सूक्ष्म हो जाती है, वैसे ही संकल्पकी ही महिमासे स्थूल जगत् सूक्ष्म और सूक्ष्म जगत् स्थूल बन जाता है। तात्पर्य यह है कि प्राणीके पास संकल्प नामकी एक ऐसी चीज है कि उसे कामधेनु, चिन्तामणि या कल्पतरु कुछ भी कह सकते हैं। बुरे कर्मोंको छोड़कर अच्छे कर्मों, आराधनाओं, तपस्याओंमें लगे रहनेपर संकल्प या विचारकी शक्ति मजबूत हो जाती है। पौर्वापर्यानुसन्धानशून्य दृढ़ संकल्पसे प्राणी सब कुछ प्राप्त कर सकता है। जैसे वायुके योगसे जल ही तरंग बन जाता है, उसी तरह मननी शक्तिके योगसे अखण्डबोधस्वरूप परमात्मा ही विचार या संकल्प बन जाता है। स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। स मनाङ्मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ संकल्पका स्वरूप निर्विकल्प बोध ही जब सविकल्प हो जाता है, तब वही संकल्प या विचार कहलाने लगता है। विचारमेंसे विकल्पके निकलते ही वह निर्विकल्प बोधरूप परमात्मा ही बन जाता है। इस तरह सविकल्प बोध विचार या संकल्पके भीतर सम्पूर्ण विश्व रहता है और वह विचार अखण्ड बोधसे कवलित रहता है। जैसे दर्पणके भीतर प्रतिबिम्ब दर्पणसे भिन्न नहीं होता है, वैसे ही संकल्प और संकल्पित जगत् अखण्ड बोधरूप दर्पणके भीतर ही रहता है, उससे भिन्न होकर वह कभी भी नहीं रहता। समस्त प्रपंचको संकल्पमें लीन करने और संकल्पको अखण्ड बोधमें लीन कर लेनेपर शुद्धतत्त्वका साक्षात्कार अपने-आप हो जाता है। महावाक्यसे अनिर्वचनीय मायामात्रके हटानेकी आवश्यकता रहती है। शुद्ध संकल्पसे दुर्लभ-से-दुर्लभ चीज मिल सकती है। बुरे संकल्पोंसे उनकी शक्ति घटती है, अच्छे संकल्पोंसे उनकी महिमा बढ़ती है। शुभसंकल्पकी ही भावना करें किसीका अनिष्ट चिन्तन करनेसे इतनी उसकी हानि नहीं होती, जितनी चिन्तन करनेवालेकी हानि होती है। किसी भी कर्ममें अगर समष्टिहितकी भावना रहती है तो वह महत्त्वका हो जाता है। समष्टि- अहितकी भावनासे बड़ा-से-बड़ा यज्ञ, तप, दान आदि भी निर्वीर्य हो जाता है। इसीलिये समष्टिहितकी दृष्टिसे शुभ संकल्पमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये। 'धर्मकी जय हो, अधर्मका नाश हो, प्राणियोंमें सद्भावना हो, विश्वका कल्याण हो'—इन संकल्पोंका विस्तार होना चाहिये। विशिष्टशक्तिसम्पन्न महात्मा या ऋषि-महर्षि तो अकेले ही अपने दृढ़ संकल्पसे विश्वका कल्याण कर सकता है, दुनियाकी भावनामें परिवर्तन कर सकता है, परंतु आज वैसे लोगोंकी संख्या कम उपलब्ध होती है। अतः सामूहिक संकल्प काम देगा, यदि चालीस-पचास लाख भी आस्तिक धर्मके जयकी भावना करें तो वैसा होनेमें विलम्ब नहीं हो सकता। युद्धकालमें मित्रराष्ट्र भी रोमन लिपिके 'वी' (V) अक्षरको अपने सभी स्थानोंमें लिखवाते थे। सभी कर्मचारी अपने मकानों, मोटरोंपर 'वी' लिख रहे थे, इसका मतलब यही कि यदि अधिक लोग हमारी विजय (विक्ट्री)-की भावना करेंगे तो हमारी विजय होगी। आधुनिकोंने भी भावनाकी महिमाको मान लिया है। हमारे सनातन वैदिक धर्ममें तो संकल्पकी इतनी महिमा है कि उसके बिना कोई कर्म ही नहीं होता। हर एक कर्ममें, फिर चाहे वह सकाम हो या निष्काम, संकल्प परमावश्यक है। विष्णुस्मरण, देश-काल-