भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 673

तीन हाथकी शिलामें ब्रह्माण्डका होना सम्भव है। जैसे जाग्रत्के दस-पाँच क्षणमें ही वर्ष, दस वर्षका स्वप्न अनुभूत होता है, वैसे ही स्वप्नकालमें महाकालका भी अनुभव होता है। राजा लवणको एक क्षणके नेत्रनिमीलन (झपकी)-में सौ वर्षका स्वप्न हुआ। अरण्यमें क्षुधा-पिपासासे व्याकुल होकर किरातिनीके साथ रोटीके लिये विवाह किया और उसके संग रहकर पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदिकोंको देखा। आँख खुलते ही पूछा तो वसिष्ठने उन सब घटनाओंको सच्चा बतलाया। उसने स्वयं भी जाकर सभी बातोंका प्रत्यक्ष अनुभव किया। सुखमें वर्ष क्षणभर लगते हैं, दुःखमें क्षण भी वर्ष-से लगते हैं। गोपांगनाओंको गोविन्द- दर्शनमें युग भी क्षणसे प्रतीत होते थे, गोविन्दके विप्रयोग (वियोग)-में क्षण भी सहस्रों युग-सा प्रतीत होता था— गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) सारांश यह है कि मन ही संसार है। अतः जैसे वटबीजके भीतर अंकुरनाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र-पल्लव, फलात्मक सम्पूर्ण वृक्ष रहता है और उसमें अपरिगणित फल होते हैं, इसी तरह एक वटबीजके भीतर अनन्त वटवृक्ष रहते हैं, यह कहना भी अत्युक्ति नहीं है। अपितु— 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गीता २।१६) इस उक्तिके अनुसार ठीक ही है। इसी तरह मनके भीतर संसार है। गृहछिद्रसे आनेवाली सूर्यकिरणोंमें दिखायी देनेवाले सूक्ष्मरजोंका आठवाँ या छठा हिस्सा परमाणु है, उसका पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा, उसके स्वल्पांशमें प्राण और प्राणके सहारे रहनेवाले मनमें ब्रह्माण्ड रहता है। ब्रह्माण्डमें अनन्त मन रहते हैं, उनमें भी ब्रह्माण्ड रहता है। इस तरह एक परमाणुके भीतर भी अनन्त ब्रह्माण्डका होना सम्भव है। इस दृष्टिसे देखें तो भगवान् श्रीकृष्णके संकल्पसे परिमित वृन्दावन-धाममें अनन्तकोटि ब्रजांगनाओंका विहारस्थान होना और एक प्रहर चतुष्टयवती रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियोंका प्रवेश करके विहार करना आदि सब सम्भव ही प्रतीत होता है। संकल्पके बलसे स्वल्प देशमें महादेश, स्वल्प कालमें महाकालका प्रवेश सम्भव है। किंचित् विचार करें तो मालूम होगा कि सूक्ष्मसंकल्प या विचारसे ही स्थूलजगत् बन जाता है अर्थात् मनोमय जगत् ही स्थूल प्रपंच होकर भासित होने लगता है। जैसे सूर्यकी किरणोंमें रहनेवाला अति सूक्ष्म जल ही कठोर बर्फ बन जाता है, वैसे अति सूक्ष्म संकल्प ही कठोर जगत् बन जाता है। सूर्यकिरणोंमें जल रहता है, परंतु वह अति सूक्ष्म होता है, अतएव वह दर्शन, गमन आदिमें बाधक नहीं होता। किरणोंको पार करनेमें नेत्रों या अन्यान्य अंगोंको कुछ भी कठिनाई नहीं मालूम पड़ती, परंतु आतपकी तेजीसे जब उन्हीं किरणोंका सूक्ष्म जल बादल बन जाता है, तब वही दर्शनमें प्रतिबन्धक हो जाता है। नेत्रके बीचमें बादल होनेसे सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पर्वत आदि कोई चीज नहीं दिखायी देती, वही जल किरणोंमें रहकर नेत्रशक्तिका प्रतिबन्धक नहीं होता। बादलरूपमें व्यक्त होनेपर नेत्रशक्तिकी रुकावट हो जाती है, परंतु चलने-फिरनेमें उससे कुछ भी बाधा नहीं पड़ती। बादलमें कोई भी खूब चल-फिर, दौड़ सकता है। जब वही चीज जल बन जाती है, तब चलने-फिरनेमें भी कुछ-कुछ रुकावट पड़ने लगती है, परंतु जब वही बर्फ बन जाती है, तब तो उसमें कठोरता इतनी आ जाती है कि बर्फके भीतर फँसा हुआ प्राणी टस-से-मस भी नहीं हो सकता। वही बर्फ बहुत पुरानी होकर जब किसी रत्नके रूपमें परिणत हो जाती है, तब तो उसका टूटना ही बड़ा कठिन हो जाता है। इस तरह जैसे सूक्ष्म चीज ही