भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 672, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 672

६६२ भक्तिसुधा सेवन होता है, जैसा होनेकी उत्कट वांछा होती है, प्राणी वैसा ही हो जाता है।' सत्-तत्त्वका प्रभाव श्रद्धेय प्राणीके प्रति श्रद्धालुका अन्तःकरण, प्राण, देह आदि झुक जाते हैं, अतएव श्रद्धेयके उपदेशों और आचरणोंका प्रभाव श्रद्धालुओके अन्तःकरणमें पड़ता है। यद्यपि सात्त्विकी श्रद्धा उत्तम व्यक्तियोंमें ही हुआ करती है तथापि तामसी, राजसी श्रद्धा कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। बुरे लोगोंके साथसे बुरी इच्छा, बुरे कर्म बन पड़ते हैं, जिनसे प्राणीका पतन हो जाता है, परंतु अच्छे संगों, अच्छी इच्छाओं, अच्छे कर्मोंसे प्राणी सम्राट्, स्वराट्, विराट्, अनन्त, धन-धान्य-सम्पन्न इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा आदितक बन सकता है। अच्छे संग, अच्छी इच्छा और शास्त्रोक्त उत्तम साधनोंका सहारा लेकर प्राणी मनचाही वस्तुको प्राप्त कर सकता है। एक जन्म या अनेक जन्मोंमें प्राणी अवश्य ही अपने अभीष्टको प्राप्त कर सकता है, अगर बीचसे ही लौट न पड़े। अन्यान्य वस्तुओंके समान ही विचारोंका भी आदान-प्रदान किया जा सकता है। प्राणी यदि अच्छे विचारोंका आदान चाहे तो अच्छे शास्त्रों, अच्छे वातावरण और बड़े-बड़े अच्छे ऋषि, महर्षि, अवतारोंका स्मरण रखे; उनके विचारों, व्यवहारोंको याद रखे; इससे उनके अच्छे विचारोंका आदान होता रहेगा। इन्हीं उत्तम विचारोंके आनेके लिये द्वारको अनावृत करना है। बुरे ग्रन्थों, वातावरणों और बुरे पुरुषोंको भूलकर भी कभी स्मरण न होने देना, यदि बुरे विचारोंके आनेका दरवाजा बन्द करना है। बुरे विचारोंसे घृणा करने और उनके नाशकी भावना करनेसे वे नष्ट भी हो जाते हैं। अच्छे विचारोंका आदर और उनके उपबृंहणकी भावनासे वे बढ़ भी जाते हैं। दूसरोंके शुभानुसन्धानसे विचारोंमें बल आता है। दूसरोंके अनिष्ट चिन्तनसे विचार निर्वीर्य भी हो जाते हैं। विचारतत्त्वज्ञोंका तो कहना है कि कोई भी प्राणी एकाग्रतासे संकल्प या विचारद्वारा ही, बाहरी प्रयत्नोंके बिना ही मनचाही वस्तु बना सकता है। संकल्पसिद्धिका बाधक—अविश्वास संकल्पकी पहली कोटि अर्थात् आरम्भ भूल जाते ही विचारित संकल्पित पदार्थ प्रत्यक्ष हो जाता है अर्थात् लगातार बिना विच्छेद हुए निरन्तर संकल्प ही संकल्पित पदार्थका रूप धारण करके प्रकट हो जाता है। प्राणी बार-बार संकल्पित पदार्थके प्रति अविश्वास करता रहता है, समझता रहता है कि यह तो संकल्पमात्र है, मनोराज्यमात्र है, संकल्पित पदार्थ है। बस, यही अविश्वास संकल्पसिद्धिमें बाधक होता है। भावना या उपासनामें भी यह अविश्वास ही प्रतिबन्धक है। विश्वासपूर्वक संकल्पित इष्टदेवकी मूर्ति उसके भूषणालंकार, भोग-रागादि कुछ दिनोंमें प्रत्यक्ष प्रकट हो जाते हैं। त्रिपुरसुन्दरीरहस्य और योगवासिष्ठमें कुछ आख्यान ऐसे आते हैं, जिनमें कहा गया है कि किन्हीं सिद्धोंने संकल्पसे ही तीन हाथकी शिलाके भीतर ब्रह्माण्डकी रचना कर डाली थी। जब दूसरे व्यक्तियोंको शिलाके भीतर ले जाया गया, तब उन्हें अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल और भूर्भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य आदि चौदह भुवन— सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, भूधर, सागर, गगन आदि सभी प्रपंच दिखायी दिये। आश्चर्य होता है कि ठोस शिलाके भीतर कोई व्यक्ति कैसे प्रविष्ट हो सकता है! जिस ठोस शिलाके भीतर सूची, त्र्यणु आदिकोंको भी प्रवेशका अवकाश नहीं, उसके भीतर कोई व्यक्ति कैसे प्रविष्ट हो सकता है और कैसे उसमें ब्रह्माण्ड रह सकता है? परंतु विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि सभी देश-काल आदि मनकी ही कल्पना है। जैसे स्वप्नमें सूक्ष्म नाड़ियोंके बीचमें ही महादेश और हस्ती, पर्वतादि बड़ी-बड़ी चीजें नजर आती हैं, वैसे ही स्वल्पदेश—