भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
६७८ भक्तिसुधा भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है परमतत्त्व ही अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होते हैं, उनके किसी रूपमें उत्कट उत्कण्ठा, प्रीति ही भक्ति है। भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष-अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है। भक्ति महारानीके ही शुभाशीर्वादसे विवेकरूपी नृपसे उपनिषदमें प्रबोध चन्द्रका उदय होता है। विवेकका मोहके साथ अनादि कालसे युद्ध चला आ रहा है। मोहके पक्षमें काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, दम्भप्रभृति आदि अनेक भट हैं। विवेकके पक्षमें वैराग्य, विचार, शम, दम, क्षमा, दया, श्रद्धा, निवृत्ति आदि अनेक भट हैं। दलबल-सहित मोहपर विजय प्राप्त करके प्रबोधसहित परम पुरुष भगवान्का अंशभूत जीवात्मा कृतकृत्य होकर श्रीभक्तिमाताके चरणोंमें जाकर प्रणाम करता है। श्रीभक्ति भगवती उसे आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं—'वत्स! मैं तो चिरकालसे इसी चिन्तामें थी कि किस तरह प्रबोधचन्द्रसहित विवेक विजयी होकर स्वभावतः शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव परम पुरुषको स्व-स्वरूपस्थ करें। वह आज मेरा मनोरथ पूरा हुआ। वत्स! मैं आशीर्वाद देती हूँ।' जीवात्मा कृतकृत्य होकर कहता है—'अम्ब! आपके ही शुभानुसन्धानसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ। अब मैं यही चाहता हूँ कि आपके श्रीचरणोंमें मेरी सदा अटल श्रद्धा बनी रहे।' इस तरह प्रबुद्ध होकर भी जीवात्मा भक्तिदेवीका प्रेमी है, फिर भक्तिका उत्कर्ष जितना ही कहा जाय उतना ही कम है। श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्यको भक्ति महारानीका पुत्र कहा गया है और यह दिखाया गया है कि ये तीनों ही कलिके पाखण्डसे जर्जर एवं जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। श्रीमद्वृन्दारण्यधामके संसर्गसे श्रीभक्तिदेवी तो नवीनस्वरूपा तरुणी हो गयीं, परंतु वहाँ ज्ञान, वैराग्यका कोई ग्राहक न था, अतः वे दोनों ज्यों-के- त्यों जीर्ण-शीर्ण क्षुत्क्षाम-शुष्क-कण्ठ होकर मूर्च्छितावस्थामें ही पड़े रहे। श्रीभक्तिदेवी स्वयं नवीना, सुरूपिणी तरुणी होकर भी अपने पुत्रोंकी दुर्दशा देखकर खिन्न होकर सोच रही थीं। उसका भाव यह था कि माताका जरठ होना उचित है, पुत्रका जरठत्व वार्धक्य अवश्य ही चिन्ताजनक है। कभी एक वृद्धा वैश्यानी स्त्री एक महात्मासे वरदान माँगने लगी—'महाराज! मैं तो यही माँगती हूँ कि मेरे बेटे, पोते मुझे कन्धेपर रखकर जला आयें।' महात्माने कहा कि 'जीते ही या मरनेपर?' सारांश यह कि कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा यही चाहती है कि 'मेरे सामने मेरे बेटे-पोते बने रहें, मरें नहीं, किंतु मैं ही उनके सामने मर जाऊँ।' बेटे-पोतेकी बीमारीको माँ अपने ऊपर बुलाती है। ठीक इसी तरह भक्ति माताको भी अपने पुत्र ज्ञान, वैराग्यकी वृद्धिमें ही शान्ति-संतोष होता है। वह उनका अनिष्ट नहीं देख सकती, उनके सामने अपना निधन चाहती है। माता पहले तो पुत्र बिना अपनेको वन्ध्या समझती है, अपना जीवन व्यर्थ समझती है, पुत्र-जन्मके लिये तरह-तरहके देवी- देवताओंको मनाती है। पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त, पादादि उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, अब पुत्र बड़ा हो गया यह समझकर प्रसन्न होती है। पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है। स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है। मल, मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है, वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती है? ठीक इसी तरह ज्ञान-वैराग्यरूप पुत्रोत्पत्तिके बिना भक्ति अपनेको वन्ध्या मानती है और उसकी उत्पत्तिके लिये लालायित रहकर देवी-देवता मनाती है। फिर लालन-पालनकर बड़ा करती है, उनकी जीर्णता-शीर्णतामें वह फिर चिन्तित और खिन्न होती है। उनकी मूर्च्छा और जीर्णता-शीर्णता मिटानेके लिये फिर महात्माओंकी शरण जाकर उपाय चाहती है।
ज्ञान और भक्ति ६७९ श्रीभक्तिदेवीके इतने प्रिय पुत्र ज्ञान, वैराग्यके अपकर्षकी चिन्ता ही क्यों, जब श्रीभक्ति उनके बिना अपनेको वन्ध्या और उनके जन्म, समृद्धि, उन्नतिमें ही अपनेको सौभाग्यवती मानती है। माता बिना पुत्रके नहीं सोहती, पुत्र माताके अमरपुर पधारनेपर भी रह सकता है। तत्त्वज्ञान, वैराग्यसे भक्तको घृणा होना और उनका अपकर्ष सिद्ध करनेका प्रयत्न करना कहाँतक संगत है? साथ ही पुत्रका माताके प्रति क्या कर्तव्य है, यह भी सोचनेकी बात है। शास्त्रोंने पुत्रके लिये माता- पिताहीको परम दैवत कहा है। साक्षात् उमा- महेश्वररूपसे माता-पिताकी आराधना करनी चाहिये— 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।' पिताकी अपेक्षा भी माताकी महिमा दशगुना अधिक है— 'पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते।' ऐसी स्थितिमें पुत्र कितनी भी उन्नतिको क्यों न प्राप्त कर ले, कितना अधिक पूज्य क्यों न हो तथापि उसमें मातृभक्तिका सदा ही रहना अनिवार्य होगा। ऐसा न होनेपर वह कृतघ्न समझा जाता है और उसका उद्धार होना असम्भव हो जाता है। अतः ज्ञान-वैराग्य उच्चतम होकर तथा परम पूज्यतम होकर भी अपनी अम्बा श्रीभक्ति महारानीके चरणोंमें अवश्य ही पूर्ण श्रद्धा-भक्ति रखेंगे। ऐसी स्थितिमें यदि कोई भी ज्ञानी या वैराग्यवान् श्रीभक्तिको नगण्य या निकृष्ट समझकर अनादर करे तो वह ज्ञानी नहीं, ठीक अज्ञानी और कृतघ्न ही है। इसीलिये वेदान्ताचार्यप्रवर भगवान् शंकरने कहा है— 'यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरूरीश्वरः। आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये॥' वेदान्त, गुरु और श्रीहरि—इनका यावज्जीवन सदा ही वन्दन करना चाहिये, पहले विद्याप्राप्तिके लिये, पश्चात् कृतज्ञता प्रकटकर कृतघ्नता दूर करनेके लिये। इसीलिये शास्त्रोंमें कहीं भी भक्ति या ज्ञान किसीकी निन्दा नहीं है। भक्ति बिना ज्ञानकी उत्पत्ति ही असम्भव है, इसीलिये 'भक्त्या मामभिजानाति' इत्यादि उक्तियाँ हैं। भक्तिके बिना अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती, दृढ़ ज्ञानका आविर्भाव नहीं होता, अतः भक्ति बिना ही जो विमुक्त-मानी हैं, वे ज्ञानी ही नहीं हैं। वे ही परिश्रमोंसे सत्कुलजन्म, विद्या, त्याग आदि उच्च पदपर आरूढ़ होकर भी कामादि दोषोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं। उन्हींके लिये—'येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः' (श्रीमद्भा० १०।२।३२) इत्यादि उक्तियाँ हैं। यहाँ 'पर' पदका अर्थ ब्रह्मपदकी प्राप्ति, उसका अपरोक्ष एवं साक्षात्कार नहीं कहा गया है, क्योंकि ब्रह्मपद पानेके बाद पुनः पतन नहीं होता— 'न स पुनरावर्तते, न स पुनरावर्तते'। निराकार निर्विकार ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार होनेपर पुनः कर्मोंका प्ररोहण भी अत्यन्त श्रुति-विरुद्ध है। अतः वह भी अमान्य ही है। 'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्' इत्यादि वचनोंका तात्पर्य भगवान्के अनुगमनकी प्रशंसामें ही है। 'अपि' शब्दसे भी यही भाव निकलता है। भगवान्को रथयात्रा करते देखकर उनका अनुगमन न करना महा अपराध है। अतः अवश्य ही अनुगमन करना चाहिये। औरकी तो कथा ही क्या, ज्ञानाग्नि- दग्धकर्माको भी उसका दण्ड मिलता है। 'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्' निन्दाका तात्पर्य निन्द्यकी निन्दामें नहीं, अपितु किसी विधेयकी स्तुतिमें ही है। ऐसे ही 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' (श्रीमद्भा० १०।१४।३) इत्यादि श्लोकसे ज्ञानप्रयास-त्यागका भी तात्पर्य यही है कि भगवच्चरित्र-श्रवणादि-लक्षण भगवद्भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास सफल होता है। विशेषतः वहाँ ज्ञानसे शास्त्रीय परोक्ष ज्ञान ही विवक्षित है, अर्थात् प्राणीको केवल शास्त्रीय परोक्ष ज्ञानमें इतना प्रयास न करना चाहिये कि जिससे श्रुतिगता भगवदीयवार्ताका आदर छूट जाय। कारण भगवद्भक्ति बिना भ्रमनिवर्तक ब्रह्मापरोक्षसाक्षात्कार नहीं हो सकेगा। श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
६८० भक्तिसुधा
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ सर्वविध कल्याणोंका प्रसव करनेवाली किंवा सर्व प्रकारके श्रेयोंकी निर्झरिणी श्रीभक्ति महारानीको छोड़कर जो केवल शास्त्रीय बोध प्राप्त करनेके लिये क्लेश उठाते हैं, उनको सिवा क्लेशके और कुछ नहीं बचता। जैसे स्थूल धानकी भूसीका अवहनन (कुट्टन) करनेवालेको सिवा परिश्रमके और कुछ भी हाथ नहीं लगता। अतः भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास आदिकी सफलता हो सकती है। इसी तरहके और भी बहुत-से वचन मिलते हैं। भक्तिके बिना यज्ञ, वेद, तप आदिको निष्फल बताया गया है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ (गीता ११।५३) मैं वेद, तप, यज्ञ, दान तथा इज्यासे इस तरह नहीं देखा जा सकता हूँ, अर्जुन! जैसा तुमने मुझे देखा। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) हाँ, अनन्यभक्तिसे तो प्राणी मेरे इस प्रकारके स्वरूपको जान तथा देख सकता है, देखकर मुझमें प्रविष्ट भी हो सकता है। यहाँ सर्वत्र ही यही अर्थ करना उचित है कि भक्तिके बिना केवल वेद, यज्ञ, दानादिसे भगवान्की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्यथा वेद, यज्ञ, दानादिका भगवत्प्राप्तिमें उपयोग ही नहीं सिद्ध होगा, परंतु 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥' (गीता १८।५) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट सिद्ध है कि भगवान्की प्राप्तिमें वेद, यज्ञ, तप, दानादि सबका पूर्ण उपयोग है। यही स्थिति 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।' (कण्ठ० १।२।२३) इत्यादि श्रुतियोंकी भी है। कारण—'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि- तव्यः।' (बृहदा० २।४।५) 'ऋतं च स्वाध्याय- प्रवचने च।' (तैत्तिरीय० १।९) 'स्वाध्यायप्रवचना- भ्यां न प्रमदितव्यम्।' (तैत्तिरीय० १।११) इत्यादि स्थलोंमें श्रवणादिको ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन कहा गया है, अतः भगवद्भक्ति या वरण बिना केवल श्रवणादिसे ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं होता। इस सम्बन्धमें एक दोहेकी संगति बड़ी सुन्दर बैठती है—'रामनाम इक अंक है सब साधन हैं सून। अंक बिना कछु हाथ नहिं अंक रहे दश गून।' अर्थात् भगवान्का नाम तो एक आदि अंकके समान है और समस्त साधन शून्यके समान हैं। अंकके बिना शून्योंका कुछ भी मूल्य नहीं, परंतु अंक रहनेपर तो शून्योंका दसगुना मूल्य बढ़ जाता है। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि शून्य भी व्यर्थ और अनादरणीय नहीं है। किसी दस्तावेजमें एक अंकके अनन्तर दस शून्य हों और दसों शून्योंको मिटाकर केवल एक अंक ही रख लिया जाय तब कितना भेद होता है? इसी तरह भगवन्नामके बिना साधन शून्यके समान निःसार हैं, परंतु उसके रहनेपर तो उन शून्यात्मक साधनोंका बहुत मूल्य बढ़ जाता है। यही गति— नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ (रा०च०मा० १।२७।७) हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ —इत्यादि वचनोंकी है। भगवन्नाम और भक्ति बिना कोई भी साधन फलवान् नहीं होते। बिना माताके यदि पुत्रका होना असम्भव है तो बिना भक्तिके ज्ञानका होना कैसे सम्भव है? अतः भक्ति छोड़कर ज्ञानका प्रयास वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कामधेनु छोड़कर दूधके लिये आकको ढूँढ़ना। यदि सच्चे दूधकी अपेक्षा है तो कामधेनुका सेवन ही युक्त है। इसी तरह यदि सच्चे ज्ञानकी अपेक्षा है तो भक्ति महारानीका सेवन युक्त ही है। यही 'ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥' (रा०च०मा० ७।११५।२) इत्यादि वाक्योंका भावार्थ है।
ज्ञान और भक्ति
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इन वचनोंमें अन्य साधनोंका या ज्ञानका अनादर कथमपि नहीं किया गया है। अन्यथा शास्त्रोक्त विधि-निषेधोंका उल्लंघन करनेसे नामापराध दोष अनिवार्य हो जायगा। इसीलिये गोस्वामीजीने भी 'चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती' (रा०च०मा० ७।२१।२) और 'बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ॥' इत्यादि वचनोंसे वेद और वेदोक्त कर्मोंका खूब सम्मान किया है। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥ (रा०च०मा० ७।१००।४)
भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति
श्रीमद्भागवतादि सद्ग्रन्थोंमें भक्तिसे ज्ञानद्वारा ही परमतत्त्वकी प्राप्ति कही गयी है— एवं विशुद्धमनसो भगवद्भक्तियोगतः। भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ भगवद्भक्तियोगसे विशुद्धमनस्क निःसंग प्राणीको भगवत्तत्त्वका ज्ञान होता है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) अर्थात् हे भूमन् ! बहुत-से योगी आपके चरणोंमें निज कर्मोंको समर्पित करके विशुद्धान्तःकरण तथा विरक्त होकर आपकी कथा-श्रवणद्वारा प्राप्त भक्तिसे आपको जानकर प्राप्त कर लेते हैं। भगवत्कथा- श्रवणादि भागवतधर्मोंका सेवन करते-करते भक्ति, विरति, भगवत्प्रबोध प्राप्त करके आपको पा लेते हैं। 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) स्पष्ट ही है। भगवत्प्रेमसे ही भगवत्कृपा प्राप्त होती है और उनकी कृपासे ही प्राणी उन्हें जान सकता है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।' (मुण्डक० ३।२।३) सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (रा०च०मा० २।१२७।३-४)
इस तरह भगवद्भक्तिसे भगवत्कृपा और भगवान्का ज्ञान होता है। ज्ञानसे फिर भगवान्के सहजसिद्ध परमप्रेमका प्रकट होना स्वाभाविक ही है। भक्तिको कौन कहे, भगवान्के साक्षात्कारमें ही संसारबन्ध मिट जाता है। इस तरहसे भक्तिपक्षसे भी ज्ञानपक्षमें भगवान्की महिमा अधिक समझमें आती है। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहिं रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ हाँ, यह बात दूसरी है कि कोई भगवत्तत्त्वके ज्ञानकी भावनासे भगवान्की भक्ति करता है, कोई प्रेमसे ही भगवान्की भक्ति करता है। परंतु भगवत्तत्त्व ज्ञानरूप फल दोनोंको ही उसी तरह प्राप्त होता है, जैसे कोई पुण्यप्राप्त्यर्थ गंगा-स्नान करता है, उसे पुण्य तो प्राप्त होता ही है, परंतु तापादि-निवृत्ति भी आनुषंगिकी हो जाती है। कोई तापनिवृत्तिके लिये गंगा-स्नान करता है, पुण्यप्राप्ति उसे भी आनुषंगिकरूपसे होती है। इसी तरह कोई ज्ञानप्राप्तिद्वारा पाप-ताप मिटानेके लिये भक्तिगंगामें स्नान करता है, उसे भी भगवत्प्रेमानन्दका लोकोत्तर सुख मिलता है और जो भगवत्प्रेमानन्दके लिये ही भक्ति करते हैं, उन्हें भी ज्ञानप्राप्ति और पाप-ताप निवृत्ति एवं तन्मूलभूत ज्ञान प्राप्त होता है। इस तरह भक्तको ज्ञानप्राप्ति और मोक्ष अवश्य होता है। परंतु बिना ज्ञानके यदि किसी भी साधनसे मोक्ष मान लिया जाय तो बन्धकी सत्यता और मोक्षकी कृत्रिमता तथा अनित्यता अपरिहार्य हो जायगी, इसीलिये कर्मयोग या भक्तियोगसे ज्ञानप्राप्तिके बिना मोक्षका होना अत्यन्त अशास्त्रीय है। हाँ, जो मोक्ष चाहते ही नहीं, केवल प्रेम चाहते हैं, उनकी स्थिति दूसरी है। ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥ सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ (रा०च०मा० ६।११२।६-७) निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मकी उपासनामें बड़ी कठिनाई है, परंतु भगवान्का भक्त तो भगवान्के दिव्य चरणकमलका अवलम्बन करके अनायास ही
भवसागरको तर जाता है। इतना ही क्यों, फिर तो उसे भवसागर और उसका पार समान ही हो जाता है। भगवान्के श्रीचरण और उनकी मंगलमयी शक्तिकी महिमासे स्वर्ग, अपवर्ग, दिशाएँ-विदिशाएँ सब मंगलमय हो जाती हैं। उसकी छोड़ने और ग्रहण करनेकी भावना ही मिट जाती है। किसीकी क्षीरसागरको पार करनेकी रुचि होती है। यदि उसे तैरकर पार करना हो, तब फिर कठिनाईका ठिकाना ही क्या ? परंतु यदि उसे पार करनेके लिये दिव्य उपभोग-सामग्रीसम्पन्न सर्वांगसुन्दर नाव प्राप्त हो जाय और उसके संचालक अपने प्रियतम प्राणधन भगवान् हों, तब समुद्र पार करनेमें क्या कठिनाई है? आनन्दसे सर्वसुखका सम्भोग करते हुए और दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रसका आस्वादन करते हुए अर्थात् अपने प्रियतमके श्रीअंगके सौगन्ध-सुस्पर्शका अनुभव करते हुए प्रियतमके अमृतमय मुखचन्द्रका सौन्दर्य-माधुर्य सौरस्य सुधाका आस्वादन करते हुए प्रेमी विभोर हो जाता है। उसे भवसागर और उसके पारमें कुछ भी विशेषता नहीं रह जाती। भवसागरके पार जाकर भगवान्के जिन दिव्य माधुर्यादिकोंका अनुभव करता है, उनका अनुभव भवसागरमें ही होने लगता है। भवसागरके पाप-तापोंका उसे स्पर्शतक नहीं होता है। इसीलिये कहा जाता है कि भगवन्नामसे भवसागर सूख जाता है। इसीलिये भक्त वैकुण्ठ, कैलासादि पद पाकर भी लोक-कल्याणार्थ पुनः लौट आते हैं और जीवोंको उसी भक्तिरूपी दिव्य नावपर बिठाकर पार उतारते हैं। सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य यह कथन बहुत अंशोंमें ठीक है, परंतु यहाँ भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका ही तारतम्य कहा जा सकता है, ज्ञान और सगुणोपासनाका नहीं। गीताके बारहवें अध्यायमें अर्जुनने प्रश्न किया है कि 'जो आपके विश्वरूप या किसी भी सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मन लगाकर आपकी उपासना करते हैं और जो अक्षर अव्यक्त स्वरूपकी उपासना करते हैं, उनमें कौन अतिशयेन योगवित् अर्थात् ब्रह्म- प्राप्तिके उपायज्ञ हैं'—'एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योग- वित्तमाः ॥' (गीता १२।१) श्रीभगवान्ने कहा कि 'जो मुझ सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मनको सम्यक् आविष्ट करके नित्ययुक्त हो, परमश्रद्धासे मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टिमें अतिशयेन युक्त हैं। जो इन्द्रियग्रामका संयम करके अनिर्देश्य अक्षर, अव्यक्त-सर्वव्यापी-अचिन्त्य-कूटस्थ-अचल ब्रह्म- स्वरूपकी उपासना करते हैं, वे—'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) महानुभाव मुझे ही प्राप्त होते हैं। फिर भी उनके (निर्गुणोपासकोंके) लिये क्लेश (कठिनाई) अधिकतर है; क्योंकि देहवानों (देहाभिमानियों)-के लिये अव्यक्तगति दुःखसे प्राप्त होती है।' यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि देहवान्का अर्थ देहाभिमानी ही है, अन्यथा देहवान् पदका प्रयोग ही व्यर्थ होगा; क्योंकि जितनी भी उपासनाएँ हैं, वे सभी देहवान्के लिये होती हैं। जो अदेह है, उसके लिये तो उपासनाकी अपेक्षा और सम्भावना ही नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि निर्गुणोपासना किसीके लिये सम्भव नहीं, क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसका विधान ही व्यर्थ हो जाता है। अशक्यका उपदेश करनेवाले शास्त्रोंका शास्त्रत्व भी सन्देहमें पड़ जाता है। अतः यही अर्थ उचित है कि 'देहोऽस्त्यत्वेनास्येति देहवान्' अर्थात् देहात्माभिमानी ही देहवान् यह विवक्षित है। सर्वथापि यहाँ निर्गुणोपासना और सगुणोपासनाके उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है और यहाँ सगुणोपासनाका उत्कर्ष है यही उत्तर है। यहाँ तत्त्वज्ञोंका कहना है कि अर्जुनके प्रश्नका उत्तर विकल्पपुरस्सर किया गया है। अर्थात् सरलताके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है कि फलोत्कर्षके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है ? पहले पक्षके अनुसार यह उत्तर है कि सगुणोपासना सरल होनेसे
ज्ञान और भक्ति ६८३
श्रेष्ठ है—'मय्यावेश्य मनो ये माम्' (गीता १२।२) द्वितीय पक्षको लेकर कहा गया है—'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४) अर्थात् निर्गुणोपासना तो मुझे प्राप्त ही है। यहाँ 'एव' का सम्बन्ध 'प्राप्नुवन्ति' के साथ है; क्योंकि उपासनाके अनुसार उपासक उपास्यको प्राप्त होता ही है। अतः 'मां' के साथ 'एव' का सम्बन्ध व्यर्थ होकर 'प्राप्नुवन्ति' के साथ ही एवकार का सम्बन्ध होता है। तब उससे व्यवच्छेद होता है। तब सारांश यह निकलता है कि निर्गुणोपासक तो भगवान्को प्राप्त ही है, फिर भगवत्प्राप्तिके उत्कर्षापकर्षका क्या प्रश्न? यहाँ प्रसंगानुसार 'अस्मद्', 'मां' आदिका कहीं निर्गुण ब्रह्म और कहीं सगुण ब्रह्म अर्थ होता है; क्योंकि भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी हैं— एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥ जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥ (रा०च०मा० १।२३।४; १।११६।३) 'मय्यावेश्य' इत्यादि स्थलोंमें 'मयि' का अर्थ सगुण साकार सच्चिदानन्द ब्रह्म अर्थ है। 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' यहाँपर 'मां' पदका अर्थ निर्गुण ब्रह्म है। क्योंकि 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) सिद्धान्तके अनुसार सगुणोपासकोंको जैसे भगवान् सगुणरूपसे प्राप्त होते हैं, वैसे ही निर्गुणोपासकोंको निर्गुणरूपसे प्राप्त होते हैं। 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तम्' (गीता १२।३) इस प्रसंगमें निर्गुणोपासनाका प्रकृत होना स्पष्ट है। अतः वैसे उपासकको निर्गुणब्रह्मकी प्राप्ति युक्त ही है। इस दृष्टिसे यहाँ 'मां' का अर्थ निर्गुणब्रह्म मानना ही युक्त है। इसीलिये फलदृष्टिसे निर्गुणोपासना श्रेष्ठ है। सरलताकी दृष्टिसे सगुणोपासना श्रेष्ठ है। कुछ लोग कहते हैं कि यहाँका प्रश्नोत्तर ऐसा है, जैसे किसीने प्रश्न किया—'यमुनाजल श्रेष्ठ या गंगाजल?' इसका उत्तर दिया गया 'यमुनाजल श्रेष्ठ है।' जब फिर गंगाजलके बारेमें पूछा गया, तब कहा गया कि 'गंगाजल तो अमृत है।' जलोंमें यमुनाजल श्रेष्ठ है। ठीक वैसे ही सगुणोपासना श्रेष्ठ है या निर्गुणोपासना? इसके उत्तरमें कहा गया कि सगुणोपासना श्रेष्ठ है। निर्गुणोपासक तो उपास्यस्वरूप ही होता है। 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' अतः उसके उत्कर्षापकर्षका प्रश्न व्यर्थ है। ऐसे कालिदास और दण्डी कविके उत्कर्षके प्रश्नपर सरस्वतीने कहा—'कविर्दण्डी कविर्दण्डी।' कालिदासने जब पूछा कि मैं? तब तो सरस्वतीने कहा—'त्वन्त्वहमेव' तुम तो हमारे स्वरूप ही हो। इसी तरह सूरदाससे प्रश्न हुआ कि कविता आपकी श्रेष्ठ या तुलसीदासजीकी? उन्होंने उत्तर दिया—'हमारी कविता श्रेष्ठ है, तुलसीदासजीकी कविता तो कविता नहीं, अपितु मन्त्र है।' निर्गुणोपासनासे निर्गुणब्रह्मका ज्ञान फिर भी पृथक् ही है। निर्गुण ब्रह्म- ज्ञानका साक्षात्कार तो दोनों ही उपासनाओंका अन्तिम फल है। वेदान्तियोंका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके ब्रह्म-साक्षात्कारका पन्थ ज्ञानमार्ग है। तात्पर्य- निर्णय एवं मननादिमें प्रयत्न करके आचार्यमुखसे निर्गुण-स्वरूप जानकर श्रद्धासे उसीकी निरन्तर उपासना करना यह निर्गुणोपासना है। 'अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।' (गीता १३।२५) अतः यहाँ ज्ञान और भक्तिकी उत्कृष्टता- अपकृष्टताका प्रश्न ही नहीं है। साथ ही सांख्य और योगके भी उत्कर्षापकर्षका प्रश्न नहीं समझना चाहिये, क्योंकि सांख्यका अर्थ ज्ञाननिष्ठा और योगका अर्थ कर्मनिष्ठा है। अतः इनका भी विषय यहाँ नहीं है, बल्कि निर्गुणोपासना और सगुणोपासना दोनों ही यहाँ कर्मनिष्ठाके भीतर ही हैं; क्योंकि पुरुषतन्त्र मानसी ध्यानादि क्रिया भी कर्म है, अतः विद्यारण्यने अपनी पंचदशीमें इसे योग माना है। कहा भी है— 'यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते' (गीता ५।५) अर्थात् ज्ञाननिष्ठोंको जो निर्गुण ब्रह्मपद प्राप्त होता है, योगियोंको भी अर्थात् निर्गुण ब्रह्मोपासकोंको भी साक्षात्कारक्रमेण वही पद प्राप्त होता है। निर्गुणोपासनाकी महिमासे भी निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार माना जाता है। फिर भी वह विधुरपरिभावित कामिनीके
साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक नहीं होता, किंतु प्रमाणसंवादी होनेसे प्रमात्मक ही होता है। कुछ लोग गन्धर्वशास्त्राभ्यासजन्य संस्कारप्रचयसव्यपेक्ष मनःसंयुक्त श्रोत्रसे षड्जत्वादिसाक्षात्कारके समान या रत्न- परिचायक शास्त्राभ्यासजन्यसंस्कारसंस्कृत मनःसव्यपेक्ष चक्षुसे रत्नसाक्षात्कारके समान, वेदान्ताभ्यासजन्य- संस्कार-प्रचयसव्यपेक्ष समाहित मनसे ब्रह्मसाक्षात्कार मानते हैं। हर तरहसे निर्गुण ब्रह्मोपासनामें कठिनाई है। किसी भी वस्तुका चिन्तन या तदाकाराकारित वृत्तिका प्रवाह तभी बन सकता है, जब उसकी प्रतीति हो। इधर हम देखते यह हैं कि मनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि कोई-न-कोई पदार्थकी स्फूर्ति अनिवार्य रूपसे बनी रहती है, किसी भी दृश्यकी स्फूर्ति रहते निर्विकल्प निर्दृश्य ब्रह्मकी स्फूर्ति असम्भव है। यह एक उपासनाका प्रकार दूसरा है कि जैसे 'आज एकादशी है' इस शब्दके आधारपर प्राणी एकादशी व्रत रहते हैं और उसका चिन्तन करते हैं। फिर भी उसके किसी स्वरूपविशेषका बोध नहीं होता। वैसे ही 'निर्गुण-निराकार निर्विकार ब्रह्म है' ऐसा परोक्षशब्दज्ञानके आधारपर स्वरूपविशेष बिना समझे भी चिन्तनरूप उपासना बन सकती है। फिर भी ठीक उपासना तो तभी बन सकती है, जब निर्विकल्पवस्तुकी स्फूर्ति हो। तब तदाकाराकारित वृत्तिसन्तान या धारा चलायी जा सकती है। अतः जैसे मृत्तिकादि मूर्त द्रव्योंका उत्सारण ही कूप-निर्माण है, किंवा घटसे जलादि निष्कासन ही उसको आकाशसे भरना है, वैसे ही चित्तसे दृश्य-विकल्पको निकालना ही उसे ब्रह्माकार बनाना है और उसे ही निर्गुणोपासना कहा जाता है। इस निर्गुणोपासनाका फल ब्रह्मसाक्षात्कार, अविद्या तत्कार्यात्मकप्रपंचकी निवृत्ति तथा प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति है। बस, उसके अनन्तर कोई भी फल—अभ्युदय या निःश्रेयस अवशिष्ट नहीं रहता। निर्गुणोपासनाके संस्कार बने रहनेसे वेदान्त- श्रवण-मननादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमें भी सुविधा रहती है। कारण निरालम्ब या निर्विकल्पालम्ब मनका ही ब्रह्म-साक्षात्कारमें अधिक उपयोग है। यह सब होते हुए भी निर्गुणोपासना देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वायुको बाँधना या भाद्रपदके अखण्ड गंगाप्रवाहको रोक देना जैसे कठिन है, वैसे ही प्रपंचोन्मुख वृत्तिप्रवाहको निरुद्ध करके निर्विकल्प निर्दिश्य ब्रह्माकारवृत्ति बनानी भी कठिन है। यह तो पूर्ण वैराग्यविवेकसम्पन्न पुरुषका ही विषय है। इसीलिये कहा गया है—'अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहित- स्यैव दृढः प्रबोधः' यद्यपि सगुणोपासना भी कठिन है, उसमें भी तो बाह्य विषयोंसे मनका प्रत्यावर्तन करके भगवत्स्वरूपमें ही लगाना पड़ता है, फिर भी वह निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सरल है। कारण भगवान्के मंगलमय नाम, उनके परम पवित्र चरित्रके अभ्याससे भगवान्की मधुर मनोहर मंगलमय मूर्ति मनमें व्यक्त हो सकती है। फिर प्रेमसे तदाकाराकारित-वृत्तिप्रवाहरूप उपासना भी बन सकती है। भगवच्चरित्रादिकी मधुरतासे कभी-कभी प्राणियोंकी रागसे भी प्रवृत्ति हो जाती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता और निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। सगुणोपासना सरल है यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब निर्गुणोपासनाका फल बड़ा है, फिर भले ही वह कठिन हो, वही श्रेष्ठ है। बड़े फलके लिये कठिन परिश्रम—अधिकतर क्लेश, उसके अपकर्षका कारण नहीं हो सकता। बड़े फलके लिये अधिक क्लेश होना युक्त ही है। सगुणोपासना सरल होनेपर भी उसका फल ब्रह्मलोकादि है, जो कि एक तरह संसार ही है। वहाँ अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होती। निर्गुणोपासनासे निरावरण ब्रह्मका साक्षात्कार और तदात्मनावस्थान होता है, फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासना कैसे श्रेष्ठ हुई ? इसका उत्तर यह है कि सगुणोपासना सरल है, साथ ही उससे अन्तरात्माकी शुद्धि, विवेक, वैराग्यादिकी प्राप्ति और श्रवणादिक्रमेण ब्रह्म-साक्षात्कारकी प्राप्ति और श्रवणादि भी हो जाता
है अथवा यहाँ भगवान्की कृपासे ही तत्त्वसाक्षात्कार और कैवल्य प्राप्त हो जाता है। भगवदुपासनासे भगवत्कृपा, उससे ज्ञानयोग्यता प्राप्त होनेपर तो एक ही महावाक्यसे तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है। यह बात स्वयं भगवान्ने मानी है कि जो लोग सर्वदा समाहित होकर प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग (ज्ञानयोग) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं। जो मच्चित्त तथा मद्गतप्राण होकर मेरे ही कथन-प्रबोधनमें तुष्ट होकर रमण करते हैं, उनके ऊपर अनुकम्पा करके उनके आत्मभावसे स्थित होकर भासवान (प्रकाशयुक्त) ज्ञानदीपकसे उनके हृदयके अज्ञानरूपी अन्धकारको मैं नष्ट कर देता हूँ— मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।९-११) इस तरह भगवत्कृपाविशेषसे सगुणोपासकोंको भगवान्के निर्गुणस्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। यदि श्रवणादिमें प्रवृत्ति या इस जीवनमें भगवत्कृपा द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार न हुआ तो भी मरणकालमें तत्त्वसाक्षात्कार होना सम्भव होता है। यावज्जीवन प्राणीको प्रारब्धानुसार भटकना पड़ता है और पुरुषार्थकी योग्यता होनेसे भगवान् भी उसके पुरुषार्थकी प्रतीक्षा करते हैं; परंतु मरणावसरमें तो फिर भगवान् अपनी अनुकम्पाविशेषसे उसे सुलभ होते हैं। उस समय भगवान् जीवकी असमर्थताका अनुभव करते हुए जीवके प्राथमिक भावोंको देखकर अपनी सहज अनुकम्पासे जीवका कल्याण करते हैं। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ (गीता ८।१४) अर्थात् जो अनन्य मनसे सदा मेरा भजन करता रहता है, मैं अन्तमें उसे सुलभ होता हूँ। प्राणनिरोध, समाधि आदि न कर सकनेपर भी मृत्युकालीन विषम वेदनाके समयमें मैं अपनी कृपाविशेषसे उसे सुलभ होता हूँ। यदि ऐसा न हुआ तो भी मरणके अनन्तर उसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। वहाँ अपनी भावनाके अनुसार शिव, विष्णु आदि स्वरूपकी प्राप्ति होती है। तरह-तरहका आनन्द मिलता है। वहाँ श्रवण- मननादिसे तत्त्वसाक्षात्कार होकर कल्पान्तमें कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। इस तरह फल वही मिलता है। फिर भी सगुणोपासनामें सरलता, निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। यही बात भागवतके दो पद्योंमें भी कही गयी है— पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम्॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) अर्थात् हे देव, जैसे सुधीगण आपकी कथा- सुधाका पानकर उससे ही प्रवृद्ध भक्तिद्वारा निर्मलाशय होकर, वैराग्यसार बोधको पाकर अकुण्ठधिष्ण्य आपको प्राप्त हो जाते हैं, वैसे ही दूसरे महानुभाव आत्मसमाधि- योगसे अर्थात् आत्माके श्रवण-विवेचनादिका क्रमेण साक्षात्कार करके बलिष्ठा प्रकृति (देहादिकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति)-को जीतकर आपको ही प्राप्त होते हैं। आपकी प्राप्ति दोनोंको बराबर होनेपर भी द्वितीय पक्षके लोगोंको परिश्रम अधिक है। प्रथम पक्षके लोगोंको उतना परिश्रम नहीं है। प्रथम साधकको साधनरूपमें कथा-सुधा (अमृत)-का पान है, फिर उसीकी महिमासे भक्ति, अन्तःशुद्धि, वैराग्य और विज्ञानकी प्राप्ति होती है। दूसरोंको विवेक- वैराग्यादिसहित श्रवणादिद्वारा शरीर-त्रितय, कोशपंचकसे
६८६ भक्तिसुधा प्रत्यक्-चैतन्यका विवेचन, आन्तर-बाह्य, व्यष्टि- समष्टि प्रपंचसे प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्मका अन्वेषण, योगाभ्यासद्वारा बाह्यवृत्तियोंका निरोध, अन्तःकरणमें सर्ववृत्तियोंका निरोध करना पड़ता है। इन श्लोकोंके अनुसार 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४)-का भी 'त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति' (श्रीमद्भा० ३।५।४६)-के समान ही अर्थ होना चाहिये। अर्थात् सगुणोपासक उपासनाके प्रभावसे ज्ञानद्वारा जिन भगवान्को प्राप्त होते हैं, निर्गुणोपासक भी उन्हीं भगवान्को प्राप्त होते हैं। निर्गुणोपासक- प्राप्यतत्त्व, सगुणोपासक-प्राप्यतत्त्वसे पृथक् नहीं है। यही दोनों स्थलोंके 'एव' पदका स्वारस्य है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) इस वचनसे भी भगवच्चरणसमर्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठान, कथासुधापान, उससे भक्ति और भक्तिसे ज्ञान प्राप्त करनेके बाद मोक्षप्राप्ति कही गयी है। यद्यपि कहा जा सकता है कि निर्गुणोपासनामें भी भगवत्कृपा अनिवार्य ही है—'यो ब्रह्माणं विदधाति.... 'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥' (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये।' (गीता १५।४) इत्यादि वचनानुसार ज्ञानपक्षमें भी भगवच्छरणागति और भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा होती है। भगवत्कृपा जैसे सगुणोपासनासे होती है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे भी होती है। जब भगवान्के ही दोनों स्वरूप हैं, तब क्या कारण है कि निर्गुणोपासनासे कृपा न हो ? बल्कि जब निर्गुणस्वरूप अन्तरंग है और सगुण निर्मलसत्त्वसापेक्ष है, तब तो अन्तरंग प्रियतमनिरपेक्ष निर्गुणस्वरूपके उपासकपर और भी कृपा होनी चाहिये। फिर तो निर्गुणोपासनासे भी भगवत्कृपाद्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होगा और इसी पक्षमें 'तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।' (गीता १०।१०) 'मच्चित्ता मद्गत- प्राणाः' 'ददामि बुद्धियोगं तम्' 'तेषामेवानु- कम्पार्थम्' 'नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥' (गीता १०।९-११) ये सभी श्लोक लगाये जा सकते हैं। जैसे भगवच्चरित्रश्रवणसे भक्ति सम्भव है, वैसे ही वेदान्तद्वारा भगवान्के प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्राह्म-स्वरूपश्रवणसे भी पूर्ण भक्ति उत्पन्न हो सकेगी। फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता कैसे हुई? बल्कि निर्गुणस्वरूप अन्तरंग निरपेक्ष होनेसे पूर्ण भक्तिका आस्पद होगा। निर्विशेष आलम्बसे चित्तकी निरालम्बतामें अधिक सहायता मिलेगी। तथापि यह तो मानना ही पड़ेगा कि निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनामें सुगमता है। निर्गुणोपासना निर्गुण ब्रह्म-साक्षात्कारके अधिक अनुकूल है। ज्ञानकी प्राप्ति भी भगवत्कृपासे ही होती है। कुछ लोगोंका तो यह भी पक्ष है कि कृपा आदि जिसमें है वह सगुण ब्रह्म है। निर्गुणमें कृपा कैसी ? श्रीशंकराचार्य भगवान्ने निर्गुण ब्रह्मके प्रति कहा है— उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः। अकस्मादस्माकं यदि न कुरुषे स्नेहमथ तद् वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥ (प्रबोधसुधाकर २४५) 'हे देव! आप उदासीन, अनमन स्वभाव, कूटस्थ, निर्गुण, संगरहित हमारे तात-पिता हैं। फिर मेरी क्या गति है ? देव ! यदि आप हमपर निष्प्रयोजन स्नेह नहीं करते तो भी हमारा हृदय आपका भवन है, वहाँ आप निवास तो कीजिये।' इस तरहके स्तवनसे सिद्ध होता है कि निर्गुणमें दया, कृपारूप गुणोंका अस्तित्व नहीं होता। अतएव माया-मोहकी निवृत्तिके लिये भगवान्की मायाका वर्णन युक्त है—मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः। शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति॥ (श्रीमद्भा० २।७।५३) भगवान्की मायाका श्रद्धासे वर्णन, श्रवण, अनुमोदन करनेवाले पुरुषकी आत्मा मायासे मोहित नहीं होती। यहाँ भगवदीयत्वेन भगवद्वशीभूता मायाका वर्णन होता है। इसीलिये माया-मोहसे मुक्ति
मिलती है, उसी तरह भगवत्सापेक्ष भगवदीयसत्त्वके वर्णनसे सत्त्वसे ज्ञान द्वारा गुणोंकी निवृत्ति 'कण्टकेन कण्टकोद्धारः' न्यायसे प्राप्त होती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता होती है और कृपाका अवकाश रहता है। तथापि जैसे भगवत्कृपासे भी भक्तिकृपाका महत्त्व अधिक समझा जाता है, वैसे ही निर्गुणोपासना ही स्वयं कृपाकर प्राणीका कल्याण कर सकती है और सगुण भगवान् ही अपने निर्गुणस्वरूपके उपासकपर पूर्ण कृपा करते हैं। फिर देहाभिमान मिटनेपर निर्गुणोपासना भी सरलतासे हो सकेगी, जैसे—'तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।' (गीता ५।२) इस वचनसे कर्मसंन्याससे कर्मयोगका श्रेष्ठ होना सम्भव है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त है। भले ही किसी दृष्टिसे संन्यास ही श्रेष्ठ हो, परंतु 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।' (गीता ५।६) 'न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।' (गीता ३।४) इत्यादि वचनोंसे यह भी सिद्ध ही है कि योग (कर्मयोग) बिना नैष्कर्म्य प्राप्त हो ही नहीं सकता। बिना योगके संन्यास केवल दुःखका मूल है। निर्गुण- निराकारकी उपासनासे सगुण-निराकारकी उपासना सरल है और सगुण-निराकारकी उपासनासे भी सगुण- साकार ब्रह्मकी उपासना सरल है। मनको प्रथम आकार और गुणोंके चिन्तनमें, पश्चात् निर्गुण-निराकार केवल ब्रह्ममें लगाता जाय। इस तरह अनायासेन चित्त परमतत्त्वमें प्रतिष्ठित हो जाता है। फिर जहाँ निर्गुण- निराकार परब्रह्म ही सगुण-साकार परब्रह्ममें व्यक्त है; वहाँ तो निर्गुण-सगुणमें भेद कुछ है ही नहीं। इतनेपर भी निर्गुणोपासनामें कठिनाई है और सगुणोपासनामें सरलता ही है। निर्गुणमें चित्तकी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती; सगुणमें स्वारसिकी प्रवृत्ति होती है। इन दृष्टियोंसे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इस तरह जब कर्म बिना संन्यास केवल दुःखका ही मूल है। सच्चा संन्यास उसीसे होता है। कर्मोंके आरम्भ बिना नैष्कर्म्य मिलता ही नहीं, तब फिर संन्याससे कर्मको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इसी तरह जब सगुणोपासना बिना चित्तशुद्धि तथा निर्गुणोपासना बनती ही नहीं और उसके अनन्तर बड़ी सरलतासे निर्गुणोपासना और तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है, तब निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। कुछ लोग 'वानरीवृत्ति एवं वैडालिकीवृत्ति' से भी भक्तिका महत्त्व कहते हैं। विडालशिशु स्वयं निश्चेष्ट रहता है, उसका भरण-पोषण, उत्थापन- स्थापन सब कुछ माताके ऊपर ही निर्भर रहता है। वानरशिशु स्वयं ही माँको सावधानीसे पकड़ लेता है। इसी तरह भक्त केवल भगवान्के आश्रित रहता है, उसकी रक्षाका भार भगवान् ही ग्रहण करते हैं। 'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।' (गीता १२।७) परञ्च ज्ञानी स्वयं ज्ञान-बलके द्वारा, संसार- बन्धनसे मुक्त होता है। एक बालक स्वयं पिताका हाथ पकड़कर चलता है, उसके गिरनेकी सम्भावना हो सकती है, परंतु जिस बालकका हाथ पकड़कर पिता चलता है, वह तो कूद-फाँदकर चलता हुआ भी निर्भय ही रहता है। इसी तरह भगवान्को आत्मसमर्पण करके भक्त निर्भय हो जाता है— गह सिसु बच्च अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई ॥ प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥ जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥ (रा०च०मा० ३।४३।६-९) ज्ञानी और भक्त दोनोंको ही काम-क्रोधादि तरह- तरहके उपद्रव—बखेड़े होते हैं। वहाँ ज्ञानी भगवदाश्रित होकर उनसे बचनेका प्रयत्न करता है, परंतु भक्तको तो भगवान् ही बचाते हैं। इसी अभिप्रायसे यह भी कहा गया है कि ज्ञान-वैराग्य आदि पुरुषजातिके ऊपर मायाका प्रभाव पड़ता है, परंतु भक्ति तो मायाके समान ही नारिवर्गकी है। अतः उसपर मायाका प्रभाव नहीं चढ़ता— माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ (रा०च०मा० ७।११६।३)
मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ (रा०च०मा० ७।११६।२) पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते ऐहि डरपति अति माया॥ (रा०च०मा० ७।११६।४-५) भक्तिपर मायाकृत उपद्रव व्यर्थ हो जाते हैं, इसीलिये उसे दिव्यमणि कहा है। ज्ञानपर उपद्रवोंके साफल्यकी सम्भावना होती है, इसीलिये उसे दीपक कहा है। श्रीभगवान्के शरण होकर उनमें आत्मसमर्पण करके प्राणी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। फिर तो उसके रक्षक भगवान् ही हो जाते हैं। यहाँ ज्ञानपक्षके पोषकोंका कहना है कि ज्ञान दीपक भी नहीं, मणि भी नहीं, अपितु दिव्य सूर्य है। उसके उदय होते ही अविद्या, अन्धकार और उसके उपद्रव एवं तत्सम्बन्धी उलूकादि सब मिट जाते हैं। अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचके मिटनेका दूसरा उपाय ही नहीं है। शरणागति, आत्मसमर्पण भी पूर्णरूपसे ज्ञान पक्षमें ही बनता है। ज्ञान बिना प्राणी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धितकका समर्पण कर सकता है, परंतु आत्माका तो समर्पण तभी बन सकता है, जब प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका बोध हो। जैसे घटाकाश महाकाशमें आत्मसमर्पण करता है, तरंग महासमुद्रमें आत्मसमर्पण करती है, वैसे ही जीवात्मा देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि अहंकारसे भिन्न चिदात्मरूपको शुद्धब्रह्ममें समर्पण कर देता है और तभी आश्रयत्वेन या संरक्षकत्वेन वरणरूप शरणागति प्राप्त होती है। इसी पक्षका समर्थन—'मामेकं शरणं व्रज।' (गीता १८।६६) 'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादिमें किया गया है। भगवत्स्वरूप प्रपत्ति या शरणागतिमें मायाकी निवृत्ति होती है, तभी समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। भगवान्की प्रीति, भक्ति परम कल्याणमयी होती है, इसमें सन्देह ही क्या? महानुभावोंने भक्ति और ज्ञानके साध्य, साधन और स्वरूपमें भेद कहा है। द्रवीभूत मनकी सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन पर- ब्रह्माकाराकारित मानसीवृत्ति भक्ति है और द्रवानपेक्ष मनकी निर्विकार परब्रह्माकार मानसीवृत्ति ज्ञान है। भगवद् गुणगणालंकृत ग्रन्थोंके श्रवण, मननसे भक्ति होती है, साधनसम्पन्न होकर शुद्ध-बुद्धमुक्तब्रह्मबोधक वेदान्त ग्रन्थोंके श्रवणसे ज्ञान होता है। भक्तिमें प्राणि- मात्रका अधिकार है। ज्ञानमें साधनचतुष्टयसम्पन्न उच्च अधिकारीका ही अधिकार है। ज्ञानका फल निर्विकार ब्रह्मात्मनाऽवस्थान और निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्के आकारसे आकारित मानसीवृत्तिरूपा भक्तिका फल भगवत्सायुज्यादिकी प्राप्ति है, परंतु साम्प्रदायिकोंकी दृष्टिमें तो भगवत्समीप्यादिकी प्राप्ति ही मुख्य फल है। भक्तिका फल भक्ति ही है, उससे बढ़कर कोई भी फल नहीं— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) भगवान्के गुणगणश्रवणमात्रसे समुद्रोन्मुख गंगा- प्रवाहके समान सर्वगुहाशायी भगवान्में गंगाजलके समान द्रवीभूत निर्मल मनकी वृत्तिसन्तति ही भक्ति है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम्॥ परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भक्तके द्रवीभूत मनपर व्यक्त होकर भक्तिपदसे कहे जाते हैं। कोमलचित्त प्राणी भक्तिका मुख्य अधिकारी है। यद्यपि साधनसे कठोर चित्तमें भी द्रवता होती है तथापि उसके लिये ज्ञान अच्छा है। ज्ञानी निर्गुण भक्तिके अतिरिक्त सगुण भक्ति भी करता है, परंतु उसको भक्तिका भगवत्प्रेमानन्दका रसास्वादनरूप दृष्ट ही फल है, मुक्तिरूप अदृष्ट फल तो ज्ञानसे ही उसे प्राप्त है। शिशुपालादि तामस, राजस भक्तोंको मुक्तिरूप अदृष्ट ही फल होता है, दृष्ट फल नहीं होता, परंतु भक्तको तो प्रेमानन्दमय दृष्ट फल और ज्ञानक्रमेण मुक्तिरूप अदृष्ट फल भी प्राप्त होता है। देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) शब्द-स्पर्शादि विषयोंके उपलम्भसे अनुमित होनेवाले श्रौतस्मार्तकर्मपरायण आन्तर-बाह्य करणोंकी सत्त्व (सत्त्वोपाधिक विष्णु किंवा सत्तामात्र परब्रह्म)- में जो स्वाभाविकी वृत्ति है, वही भक्ति है। अर्थात् श्रौतस्मार्त कर्मोंसे शुद्धनिर्मल बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणकी ब्रह्मप्रवणता या भगवत्परायणता ही भक्ति है। यह भक्ति अन्नमयादि पंचकोशोंको उसी तरह जला डालती है, जैसे भक्षित अन्नको जठराग्नि पचा डालती है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) निर्गुणब्रह्म या सगुणब्रह्ममें, तत्रापि काम, क्रोध, स्नेहसे, यथा कथंचित् मनकी उन्मुखता ही भक्ति है। श्रीव्रजांगनाओंने भगवद्वियोगाग्निसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीर, अन्नमयादि पाँचों कोशोंको जलाकर विशुद्ध परमानन्दरसात्मक ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। भक्तिके कुछ लक्षण सगुण, निर्गुणमें समान हैं। कुछ सगुण भक्तिमें ही पर्यवसित होते हैं। ज्ञानीको निर्गुण परब्रह्ममें तो स्वाभाविकी भक्ति होती ही है, साथ ही सगुण भक्ति भी होती है। इस आशयसे कहा गया है- तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) कुन्तीका कहना है कि हे देव! आप अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्ति-योगविधान करनेके लिये सगुण, साकारस्वरूप ग्रहण करते हैं। यद्यपि आपका निर्गुण, निराकार, निर्विकारस्वरूप समस्त प्राणियोंके निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है तथापि अनादि महामायाके प्रभावसे उसकी परमानन्दरसरूपता परप्रेमास्पदता तिरोहित-सी है। जैसे मधुर मिश्री भी पित्तदोषोपहत रसनावाले प्राणीको कटु प्रतीत होती है, वैसे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्गुणब्रह्ममें प्रेमकी कमी भासित होती है। इसीलिये विवेकी लोग यह चाहते हैं कि जैसे, अविवेकियोंको विषयोंमें, कामुकको कामिनीमें उत्कट प्रेम होता है, वैसे ही भगवान्में मनकी आसक्ति हो। इसीलिये कहा गया है कि- मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) कोटि-कोटि मुक्त-सिद्धोंमें भी नारायणपरायण दुर्लभ हैं। ज्ञानियोंमें भी प्रारब्ध कर्म अवशिष्ट रहनेके कारण दृश्य द्वैतदर्शनकालमें शुद्धचिदात्मतत्त्वकी पूर्ण रसात्मकताका अनुभव और निरतिशय प्रेम नहीं व्यक्त होता। इसीलिये सविशेष साकार स्वजनरूपसे प्रकट परमात्मतत्त्वमें शुद्ध भक्ति, प्रीतिकी अपेक्षा होती है। इसलिये ही ज्ञानी महानुभावोंका भी भगवान्के मधुर चरित्रों और मंगलमयी मूर्तिमें आकर्षण होता है, परंतु इतनेसे उनकी ज्ञाननिष्ठा या निर्गुण सिद्धान्तसे प्रच्युति मान लेना केवल बालकपन है। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥ (रा०च०मा० १।३३८।५) जहाँ यह बात कही गयी है, वहीं परम ब्रह्मनिष्ठ विदेहके मोह और ज्ञान-वैराग्यके शैथिल्यकी बात कही गयी है। वह केवल प्रभु रघुनाथके स्नेहकी महिमा है। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० २।२८६।८; १।२१६।५) इत्यादि वचनोंका भी यही तात्पर्य है कि केवल अन्तःकरणसे अनुभूत निर्गुणब्रह्मकी अपेक्षा दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्ममें विशिष्टसरसताकी अनुभूति होती है। जैसे आदित्यमण्डलका कोई केवल नेत्रसे अनुभव करता है, परंतु कोई दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रोंसे उसी आदित्यका अनुभव करता है। प्रथम अनुभवसे दूसरे अनुभवमें जैसे विशेषता होती है, वैसे ही केवल अन्तःकरणसे तत्त्वानुभवकी अपेक्षा
दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्मतत्त्वमें विशिष्टमाधुर्यका अनुभव होता है; परंतु सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म- भावापन्न मुक्तको तो अभेदेन अनन्त, अखण्डरसात्मक वस्तुकी अनुभूति होती है। विवेकियोंका कहना है कि यदि पुष्पमें घ्राणशक्ति हो तब ही पुष्पके मनोरम सौगन्ध्यका पूर्णरूपसे आस्वादन किया जा सकता है। इस दृष्टिसे अत्यन्त अभेदमें ही अनन्त- रसकी अनुभूति होती है। फिर भी जीवन्मुक्तकालमें अन्तःकरणादि उपाधियाँ विद्यमान ही रहती हैं। अतः उसके द्वारा पूर्णरूपसे अपरिमितानन्दकी अनुभूति नहीं होती। दिव्यलीलाशक्तिके योगसे कहीं अधिक रसकी अनुभूति होती है। इसके सिवा रागानुगाप्रीतिके लिये सगुणब्रह्मकी उपासनाकी जाती है। इसीलिये मुक्ति आदिसे निरपेक्ष होकर, जीवन्मुक्त लोग भगवान्के सगुणरूपमें प्रेम करते हैं— अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ (रा०च०मा० ३।१३।१३) आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) आत्माराम एवं चिज्जडग्रन्थि जिनकी छूट गयी है, ऐसे मुनि भी उरुक्रम भगवान्में अहैतुकी भक्ति करते हैं। कृतकृत्य, पूर्णकाम, आप्तकाम, परम निष्काम होनेपर भी भगवान्के अद्भुतगुणोंके प्रभावसे भगवान्में आकर्षित होते हैं। यद्यपि पूर्णकामकी भक्तिमें प्रवृत्ति अनुचित ही जान पड़ती है तथापि भगवान्के अद्भुतगुण ही इस अनौचित्यका समाधान करते हैं। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में अद्वैतवादी ज्ञानीको भक्तिका प्रकार बतलाया गया है। 'यत्सुभक्तैरति- शयप्रीत्या कैतववर्जनात्, स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वाऽपि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽ त्यन्ततत्परैः।' सुभक्त ज्ञानी लोग फलानुसन्धानरूप कैतव (कपट)-से वर्जित होकर, परमतत्त्वकी आराधना करते हैं। अज्ञानीके लिये तो किसी-न-किसी फलकी कामना रहती ही है। जीवन्मुक्तकी भी भगवान्के भजनमें अभिरुचि यहाँ प्रश्न होता है कि जब प्रयोजनके बिना मन्दकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, फिर कृतकृत्य, जीवन्मुक्त [L4
भक्तिरसामृतास्वादन ६९१ द्वारा खिंच जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणारविन्द किंजल्क- मिश्रतुलसीदलमकरन्दके हृद्गत होते ही सनकादिकोंके निर्विकार मनमें भी क्षोभ हो गया। स्वसुखनिभृत- चेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽप्यजितरुचिरलीला- कृष्टसारस्तदीयम्। (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) स्वस्वरूपभूत परमानन्दसे भरपूर चित्तवाले तथा निरस्त समस्तद्वैतजाल श्रीशुकाचार्य भी भगवान्की लीलाओंपर मुग्ध होकर आकर्षित हो उठे। औरकी तो कौन कहे, स्वयं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान् ही अपने विचित्र सौन्दर्य, माधुर्यमें मुग्ध हो जाते हैं— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भगवान् अपनी अचिन्त्य, अद्भुतयोगमायाके बलसे भूषणोंको भी भूषित करनेवाले, मंगलमय श्रीअंगको धारण करते हैं, जिससे वे स्वयं मोहित हो जाते हैं, उन्हें स्वयं विस्मय होने लगता है। लोकपालकिरीटकोटिपीडितपादपीठ असाम्यातिशय प्रभु जिस समय श्रीमन्नन्दरानीके मणिमयस्तम्भों या प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही श्रीमूर्तिको देखते हैं, उस अपने ही सौन्दर्य-माधुर्यपर मुग्ध होकर, उसके परिरम्भणके लिये व्यग्र हो उठते हैं और उसमें असफल होनेपर श्रीअम्बाका वदन विलोककर रुदन करने लगते हैं— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ फिर योगीन्द्र मुनीन्द्रगण उसपर मुग्ध हो जायें, इसमें आश्चर्य ही क्या ? परंतु इससे ज्ञानकी न्यूनता नहीं होती; क्योंकि ज्ञान और ज्ञानी श्रीभक्ति महारानीको सदा पूजें, इसीमें तो उनकी बड़ाई है। योग्य पुत्रका यही कर्तव्य है। ऐसे ही पुत्रसे पुत्रवती युवती धन्य होती है। भक्तिरसामृतास्वादन श्रीभगवद्धर्मसे द्रुत शुद्ध हृदयमें प्रादुर्भूत निरुपम सुखसंविद्रूप, दुःखकी छायासे विनिर्मुक्त श्रीभक्तिका माहात्म्य यत्र-तत्र शास्त्रोंमें वर्णित है। सर्वाधिष्ठान, परमानन्दस्वरूप, औपनिषद परम पुरुषकी रसस्वरूपता 'रसो वै सः' इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। लौकिक आनन्दोंमें भी उसी रसस्वरूप भगवान्की आंशिक अभिव्यक्ति होती है। रसके विषय एवं आश्रयकी मलिनतासे शुद्ध रसमें भी मालिन्यकी प्रतीति होती है। भक्तिरसायनकारने कहा है—'किञ्च न्यूनाञ्च रसतां याति जाड्यविमिश्रणात्' (१।१३) अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्य ही द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणकी वृत्तिपर उपारूढ़ होकर भावरूपताको प्राप्तकर पीछे रसस्वरूप हो जाता है। लौकिक रस परमानन्दस्वरूप नहीं हो सकता, किंतु भक्तिरसमें अनवच्छिन्न- चिदानन्दघन भगवान्की स्फूर्ति होती है, अतः वह परमानन्दस्वरूप है। इसलिये जो लोग श्रीकृष्णविषयक रतिको रसरूप नहीं, भावरूप ही मानते हैं—क्योंकि देवताविषयक रति भावस्वरूपा ही होती है—उनका मत ठीक नहीं है; क्योंकि श्रीकृष्णभिन्नदेवताविषयक रति भावरूपा होती है। भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्द- स्वरूप हैं, अतः कृष्णविषयक रति रसरूपा ही होगी, भावरूपा नहीं। बल्कि कान्तादिविषयक रतिकी वैसी
६९२ भक्तिसुधा रसता पुष्ट नहीं होती, जैसी भगवद्विषयक रतिकी। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने कहा है कि—भगवद्विषयिणी रति परिपूर्णरसस्वरूप होनेके कारण क्षुद्रकान्तादिविषयक रतिसे वैसी ही बलवती है, जैसे खद्योतोंसे आदित्यप्रभा— परिपूर्णरसा क्षुद्ररसेभ्यो भगवद्रतिः। खद्योतेभ्य इवादित्यप्रभेव बलवत्तरा॥ (भक्तिरसा० उल्लो० २ कारि० ७७) विषय और आश्रय दोनों या दोनोंमेंसे एक यदि रसात्मक हो तो रति भी विशुद्ध रसस्वरूप होती है। विशेषतः समुद्वेलित सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररससारसर्वस्व भगवान् ही मनोवृत्तिमें विशिष्ट रसभावको प्राप्त करते हैं। जैसे रसमें रसोद्रेककी कल्पना होती है, वैसे ही यहाँ भी कल्पना की गयी है। भगवद्धृदयस्थ पूर्णानुराग-रससारसागर- समुद्भूत, निर्मल, निष्कलंक चन्द्रस्वरूपिणी श्रीवृष- भानुनन्दिनी राधारानी एवं श्रीराधारानीके हृदयमें विराजमान श्रीकृष्णविषयक प्रेमरससारसागर-समुद्भूत चन्द्ररूप व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं। अतः यहाँ प्रेम सदानन्दैकरसस्वरूप है; क्योंकि विषय-आश्रय दोनों ही रसस्वरूप हैं, जबकि अन्यत्र विषय-आश्रय आदि विजातीय होते हैं, रसस्वरूप नहीं। इसी तरह भगवान्की लीला, लीला करनेका स्थान, लीलापरिकर और उद्दीपनादि-सामग्री भी रसस्वरूप ही है। सच्चिदानन्द- रससारसरोवरसमुद्भूत सरोज, केसर, पराग एवं मकरन्दस्वरूप व्रज, व्रजसीमन्तिनीवृन्द, श्रीकृष्ण एवं उनकी प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी सभी रसात्मक ही सिद्ध होते हैं— 'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चिद्- घनतामुपैति।' 'सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः॥' —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यह सारी बातें ब्रह्मवादमें ही बन सकती हैं, इसलिये ब्रह्मवित्तम श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भक्तिरसायन' ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही बनाया है। भक्तिरसामृतके रसिक अन्य महानुभावोंने भी कहा है कि मुक्त मुनि जिस फलको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परेशान रहते हैं, उसीको देवकीरूप वृक्षने फला, यशोदाने पकाया तथा गोपियोंने यथेष्ट उसका उपभोग किया। यशोदाकी मंगलमयी गोदमें चिदानन्दसरोवरसे नीलकमलके समान श्यामतेज प्रकट हुआ। अन्य भक्त कहते हैं—वह ऐसा फल था, जिसका भृंगोंने आघ्राण नहीं किया, वायुने जिसका सौगन्ध्य नहीं उड़ाया, जो जलमें उत्पन्न नहीं हुआ, लहरियोंके कणसे जो टकराया नहीं और कभी किसीने जिसे कहीं देखा नहीं। एक भक्त कहता है—निगम वनमें फल ढूँढ़ते- ढूँढ़ते यदि नितान्त खेदयुक्त हो गये हों तो इस उपदेशको सुनें—उपनिषदोंके परम तात्पर्यका विषय प्रत्यक्चैतन्या- भिन्न परब्रह्म गोपियोंके घरमें उलूखलसे बँधा पड़ा है। दूसरा भक्त कहता है—सखि! एक कौतुककी बात सुनो—श्रीमन्नन्दरायके प्रांगणमें धूलिधूसरित होकर वेदान्तसिद्धान्त थेई-थेई करके नृत्य करता हुआ मेरे द्वारा देखा गया है। एक अन्य भक्त कविने कहा है कि श्यामल मोहमयी मूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण मानो गोपांगनाओंके पुंजीभूत प्रेम ही हैं या यदुवंशियोंके मूर्तिमान् सौभाग्य हैं अथवा श्रुतियोंके गुप्तवित्त ब्रह्म हैं— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दसरसो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिव तद्दौजः समभवत्॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु बल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। गोधूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ पुञ्जीभूतं प्रेमगोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्।
एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्की सब अलंकारादि सामग्री रसस्वरूप ही है। सौरभ्यसे उनका उद्वर्तन (उबटन), स्नेहसे अभ्यंजन (मालिश), माधुर्य अथवा स्वांग तेजसे स्नान, लावण्यसे मार्जन, सौन्दर्यसे अनुलेपन और त्रैलोक्यलक्ष्मी (शोभा)-से शृंगार होता है। श्रीवृषभानुनन्दिनी भी महाभावस्वरूपा हैं। सखियोंके प्रणयरूप सद्गन्धसे उनका उबटन तथा कारुण्यामृतधारा-लावण्यामृतधारा-तारुण्यामृतधारासे स्नान होता है, लज्जारूप श्यामपट्टवस्त्र वे परिधान किये रहती हैं और उज्ज्वल कस्तूरीविरचित उनकी देह है एवं कम्प-अश्रु-पुलक-स्तम्भादि उनके अलंकारस्वरूप रत्न हैं। श्रीकृष्णका परिधानरूप पीताम्बर श्रीराधारानी एवं श्रीराधारानीके कज्जल, मृगमद, कर्णोत्पल, नीलाम्बर आदि श्रीकृष्ण ही हैं— श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥ शृंगार रसकी अंगिता और उज्ज्वलता अनौपचारिकरूपसे राधा-कृष्णमें ही बनती है। कृष्णविषयक काम, क्रोध, भयादिका भी पर्यवसान कृष्णप्राप्तिमें ही है। जैसे कोई दीपबुद्धिसे चिन्तामणि ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होता है तो उसे चिन्तामणिकी ही प्राप्ति होती है, वैसे ही जारादि भावनासे भी जो भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवृत्ति होती है, उससे भगवत्प्राप्ति ही होती है। लौकिक जारधर्म परलोकादिको नष्ट करता है और भगवान् पंचकोश, अविद्या, काम, कर्मादिको नष्ट करते हैं, इसलिये जार हैं— तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि संगताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।११, १५) —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यद्यपि अनिमि- त्ता भक्ति ही कोशको जीर्ण करती है तो भी सनिमित्ता भक्तिका पर्यवसान भी अनिमित्ता भक्तिमें ही होता है। यद्यपि अनिमित्ता पराभक्ति स्वतःसिद्ध है तो भी जैसे कच्चा आम, पके हुए आमका कारण होता है, वैसे ही अपरा भक्ति पराभक्तिका कारण होती है। ऐसा माननेपर ही— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३; ११।३।३१) —इत्यादि वचनोंकी संगति लगती है। प्रेम वाणीका विषय नहीं रसात्मक प्रेम रसस्वरूप ही है। कहा भी गया है कि प्रादुर्भावके समय जिसने जरा भी हेतुकी अपेक्षा नहीं की, जिसके स्वरूपमें अपराधपरम्परासे हानि एवं प्रणामपरम्परासे वृद्धि नहीं होती, जो अपने निजी रसास्वादके सामने अमृतास्वादको भी तुच्छ कर देता है और जो तीनों लोकके दुःखका विनाश करता है, उस महान् प्रेमको वाणीका विषय बनाकर ओछा क्यों किया जाय— प्रादुर्भावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि क्षीयेतापि न चापराधविधिना नत्या न यो वर्धते। पीयूषप्रतिवादनस्त्रिजगतीदुःखद्रुहः साम्प्रतं प्रेम्णास्तस्य गुरोः किमद्य करवै वाङ्निष्ठतालाघवम्॥ वाणीका विषय बनाते ही प्रेम या तो हल्का हो जाता है या अस्त हो जाता है। दो रसिकोंका प्रेम एक दीपकके समान है, जो उनके हृदयरूप गृहोंको निश्चल रूपसे प्रकाशित करता है। यदि इसे वाणीरूप दरवाजेसे बाहर कर दिया जाय तो या तो वह बुझ जाता है या मन्द हो जाता है— प्रेमा द्वयो रसिकयोरपि दीप एव हृद्देश्म भासयति निश्चलमेव भाति। द्वारादयं वदनतस्तु बहिष्कृतश्चे- न्निर्व्वाति शीघ्रमथवा लघुतामुपैति॥
६९४ भक्तिसुधा विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना मुक्ति चाहनेवाले परमविरक्त भी इस भक्तिकी कामना करते हैं- कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) इसलिये भक्तिका चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षमें पर्यवसान है। भक्तिरसायनकारके सिद्धान्तमें सगुण ब्रह्मके समान निर्गुण ब्रह्ममें भी भक्ति मानी गयी है। इसमें- 'देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥' 'लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) -यह वचन प्रमाण है। इसका निष्कृष्ट अर्थ यही है कि आनुश्रविक (वैदिक) कर्मोंसे आराध्य सत्त्व आदि गुणवाले देवताओंके मध्यमें सत्त्वोपाधिक विष्णुमें जो स्वाभाविकी मनोवृत्ति है, उसे निर्गुण भक्तियोग कहते हैं। यद्यपि वेद एवं तदनुकूल शास्त्रोंमें भगवान्के राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि जिन स्वरूपोंकी उपासना बतलायी है, उन सबकी भक्ति रसस्वरूप ही है तथापि सभी रस सरलतासे साक्षात् श्रीकृष्णमें ही संगत होते हैं। इसीलिये भक्तिरसायनकारने विशेषतया 'मुकुन्द' पद ग्रहण किया है-'परममिह मुकुन्दे भक्तियोगं वदन्ति।' भक्तिरसके आलम्बनविभाव सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर भगवान् ही हैं-यह आगे स्पष्ट किया जायगा। प्रेम-निरूपणके प्रसंगमें बतलाया गया है कि भगवद्धर्मसे द्रुतचित्तमें प्रविष्ट स्थिर- गोविन्दाकारता ही भक्ति है-'द्रुते चित्ते प्रविष्टा या गोविन्दाकारता स्थिरा। सा भक्तिरित्याभिहिता....॥' (भक्तिरसा० उल्ला० २ कारि० १) कर्म, उपासना, ज्ञानका अवगम करानेवाले सभी शास्त्रोंका तात्पर्य अन्तःकरणशुद्ध्यर्थ मलविक्षेप- निवृत्तिपूर्वक भगवदुपासना एवं भगवत्स्वरूपज्ञानद्वारा परमपुरुषार्थरूप भक्तिमें ही है। कहा भी है कि यदि द्रवावस्थापन्न चित्त नित्यबोधसुखात्मा विभु भगवान्को ग्रहण कर ले तो क्या अवशेष रह जाय?- 'भगवन्तं विभुं नित्यं पूर्ण बोधसुखात्मकम्। यद् गृह्णाति द्रुतं चित्तं किमन्यदवशिष्यते॥' (भक्ति० उल्ला० १ का० ३०) विषयमें चित्तकी कठोरता एवं भगवान्में द्रवता होनी चाहिये-'काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे।' आनन्दसे ही अखिल भूतनिकायका प्रादुर्भाव, आनन्दसे ही जीवन एवं आनन्दमें ही उपसंहार होता है-आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। (तैत्तिरीय० ३।६) अतः समस्त प्रपंच परमानन्द रसस्वरूप ही है, किंतु स्वप्नादि प्रपंचके समान बाध्य होनेके कारण भगवत्- स्फूर्ति होनेपर जब प्रपंच निवृत्त होता है, तब भगवद्रूप ही अवशेष रहता है। अध्यस्त पदार्थकी अधिष्ठान- ज्ञानसे निवृत्ति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि विषय- विषयक सभी प्रेम भगवान्में ही पर्यवसित होते हैं। भगवत्प्रेमके साधन भगवत्प्रेम प्राप्त करनेके लिये साधकको क्रमशः महापुरुषोंकी सेवा, उनके धर्ममें श्रद्धा, भगवद्- गुणश्रवणमें रति, स्वरूपप्राप्ति, प्रेमवृद्धि, भगवत्स्फूर्ति और भगवद्धर्मनिष्ठा आदि अपेक्षित होती है। आत्माराम, आप्तकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, महामुनीन्द्र भी भगवान्को भजते हैं- आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) कहा जा सकता है कि सर्वाधिष्ठान प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारद्वारा सभी प्रकारके भेदोंके मिट जानेपर जिनका चित्त आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण है, उन्हें अपनेसे भिन्न भगवान्की स्फूर्ति नहीं हो सकती। रागकी तो उनमें सम्भावना ही नहीं, फिर भक्ति तो अत्यन्त ही असम्भव है। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि उन्हें स्वारसिक प्रेमसे भेदका आहार्यज्ञान होता है (बाधकालिक इच्छाजन्यज्ञान आहार्यज्ञान कहा जाता है)। आहार्यज्ञानद्वारा राग एवं भक्ति हो
भक्तिरसामृतास्वादन ६९५
सकती है। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में बतलाया गया है कि भक्त लोग प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको जानकर अतिशयप्रीतिसे अभिसन्धिविहीन होकर आहार्यज्ञानद्वारा भेदभावकी कल्पना करके अत्यन्त तत्परतासे स्वभावतः भगवान्में स्वारसिकी भक्ति करते हैं— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्। स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ आहार्यज्ञानद्वारा व्यामोहप्रसक्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि भगवान् सत्यके भी सत्य हैं। जैसे अराजाको राजा बनानेवाला राजराज कहा जाता है, वैसे ही भगवान् असत्यको सत्य बनाते हैं अर्थात् पारमार्थिक सत्यकी अपेक्षा किंचित् न्यूनसत्ताका एक और सत्य माना जाता है, जो भजनोपयोगी है। अतः पारमार्थिक अद्वैत सिद्धान्त ज्यों-का-त्यों रहता है। कहा भी गया है कि पारमार्थिक अद्वैत ज्ञान होनेपर यदि भजनोपयोगी द्वैत मानकर भगवान्में भक्ति की जाती है तो ऐसी भक्ति सैकड़ों मुक्तियोंसे भी कहीं बहुत अच्छी है। प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मका विज्ञान होनेके पहले द्वैत बन्धनका कारण है, किंतु विज्ञानके बाद भेद- मोहके निवृत्त हो जानेपर भक्तिके लिये भावित द्वैत अद्वैतसे भी बहुत अच्छा है— पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं भावितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ गाढ़ानुराग आलिंगनादि-रसास्वादप्रवीण पतिव्रता नायिका जैसे रसविशेषविकासके लिये घूँघटकी ओटसे अपने प्रियतमका निरीक्षण करती है, वैसे ही तत्त्व- साक्षात्कारसम्पन्न अभेदानुभवी विद्वान् भी रसविशेष- विकासके लिये भेदभावसे ही भगवान्की समर्चा करना चाहते हैं— विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ कान्ताका प्रियतमके वक्षःस्थलपर विलासपूर्ण विहरण या पादयुगलकी सेवा, जैसे बराबर है, वैसे ही ज्ञानीकी तत्त्वनिष्ठा और भगवत्पूजा दोनों बराबर हैं— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विरहतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे प्रातिभासिक प्रपंचकी अपेक्षा घटादि सत्य एवं स्वकारण मृदादिकी अपेक्षा असत्य होते हैं या मृदादि भी अपने कारणकी अपेक्षा असत्य होते हैं, वैसे ही पारमार्थिक सत्ताकी अपेक्षा स्तरभेदसे कुछ न्यून सत्तावाला अपारमार्थिक सत्य है। यही सत्ता भगवल्लीला-परिकरकी है, इसलिये सिद्धान्ततः अद्वैत बना ही रहता है। चित्द्रुतिसे भक्तिमें भेद चित्तद्रुतिके कारण अनेक हैं। उन्हींके भेदसे भक्तिमें भेद होता है—'चित्तद्रुतेः कारणानां भेदाद्भक्तिस्तु भिद्यते।' शरीरसम्बन्ध-विशेषकी स्पृहा होनेपर सन्निधान-असन्निधान-भेदसे काम दो प्रकारका होता है। उससे द्रुत चित्तमें श्रीकृष्णनिष्ठता ही सम्भोग-विप्रलम्भाख्य रति है। इसी तरह क्रोध, स्नेह, हर्षादिजन्य चित्तद्रुतिमें भी रति जाननी चाहिये— कामजे द्वे रती शोकहासभीविस्मयास्तथा। उत्साहो युधि दाने च भगवद्विषया अमी॥ शृंगार, करुण, हास्य, प्रीति, भयानक, अद्भुत, युद्धवीर, दानवीर—ये सब व्यामिश्रणमें होते हैं। राजसी, तामसी भक्ति अदृष्ट फलमात्रवाली होती है। मिश्रित भक्ति दृष्टादृष्ट उभय फलवाली होती है। इसी तरह साधकोंकी विशेषतासे भक्ति शुद्धसत्त्वोद्भवा भी होती है। सनकादि सिद्धोंमें भक्ति दृष्टफल होती है। जैसे ग्रीष्मसन्तप्त पुरुषका गंगास्नान दृष्टादृष्टफलक होता है, वैसे ही वैधी भक्तिमें भी सुखाभिव्यक्ति होती है,
६९६ भक्तिसुधा अतः वह दृष्टादृष्टफलक है। शीतवातातुर पुरुष यदि गंगास्नान करे तो उससे जैसे अदृष्टमात्र ही फल होता है, दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है, वैसे ही राजसी, तामसी भक्तिमें सुखरूप दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है। गंगास्नान कर लेनेपर पुनः गंगामें क्रीड़ा करनेवालोंको जैसे दृष्टमात्र फल होता है, वैसे ही जीवन्मुक्तोंकी भक्ति दृष्टफलमात्रपर्यवसायिनी होती है— राजसी तामसी भक्तिरदृष्टफलमात्रभाक् । दृष्टादृष्टोभयफला मिश्रिता भक्तिरिष्यते ॥ शुद्धसत्त्वोद्भवाप्येवं साधकेष्वस्मदादिषु । दृष्टमात्रफला सा तु सिद्धेषु सनकादिषु ॥ दृष्टादृष्टफला भक्तिः सुखव्यक्तेर्विधेरपि । निदाघदूनदेहस्य गङ्गास्नानक्रिया यथा ॥ रजस्तमोऽभिभूतस्य दृष्टांशः प्रतिबध्यते । शीतवातातुरस्येव नादृष्टांशस्तु हीयते ॥ तथैव जीवन्मुक्तानामदृष्टांशो न विद्यते । स्नात्वा मुक्तवतां भूयो गङ्गायां क्रीडतां यथा ॥ तीव्र वातस्थित प्रदीप ज्वालाके समान रजस्तमोऽभिभूत शिशुपाल आदिकी स्वप्रकाशानन्दाकार भी मतिसन्तति सुख व्यक्त करानेवाली न हुई। प्रतिबन्धके नष्ट होनेपर सुखाभिव्यक्ति होती है। चित्तद्रुति होनेके कारण ही भक्ति होती है। उसके न होनेके कारण न तो वेन भक्त ही ठहरा, न उसे कुछ फल ही प्राप्त हुआ। शिशुपाल भगवान्की सत्ता मानता था, परंतु वेन भगवान्की सत्ता ही नहीं मानता था, वह नास्तिक था, इसलिये उसका भगवत्-सम्बन्ध ही नहीं हुआ, फिर चित्तद्रवता और भक्ति तो बहुत दूरकी बात है। सुखाभिव्यंजक होनेसे रजस्तमोविहीन भगवद्विषयक मति ही रति है। भगवद्विषयक मतिके समुच्छेदतारतम्यसे रतितारतम्य होता है। 'विरहे यादृशं दुःखं तादृशी दृश्यते रतिः।' मनुष्य और अधिकरणमात्रके भेदसे अनेक भेद होते हैं। उसमें भी वैकुण्ठ, मथुरा, द्वारका, वृन्दावन आदिके भेदसे तथा व्रज, वन, निकुंजादिके भेदसे प्रकाशभेद भी माना जाता है। पुनः शुद्ध, मिश्रित आदिके भेदसे अनेक भेद होते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि आदिमें जो विषय विस्तारसे कहे गये हैं, वे यहाँ सूत्रभूत कारिकाओंसे कहे गये हैं। विशेषतया वेदान्त, सांख्य, मीमांसादिशास्त्र एवं शास्त्राविरोधी युक्तियोंद्वारा सभी विषयोंका वर्णन किया गया है। अद्वैतसिद्धिकार श्रीमधुसूदनसरस्वतीमहाराजकी सिद्धान्ताविरोधिनी स्वारसिकी भक्ति थी, जैसा कि उन्होंने स्वयं ही गीताकी 'गूढार्थदीपिकासंग्रह' नामक टीकामें कहा है कि अद्वेष्टृत्व आदि गुण जैसे ज्ञानीके स्वभावसिद्ध होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन करना भी ज्ञानीका स्वभाव है—'अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' साधन, अभ्यास और परिपाकावस्थाके भेदसे 'तस्यैवाहं' मैं उसीका हूँ, 'ममैवासौ' वह मेरा ही है, 'सोऽहं' मैं वही हूँ—ये तीन तरहके भाव होते हैं। तीसरे भावके 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्', 'अहं ब्रह्म परं धाम', 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इत्यादि उदाहरण हैं। 'मामेकं शरणं व्रज' इत्यादि गीताके उपसंहारात्मक श्लोकका तात्पर्य भी अन्तिम भावना ही है। 'एकं' एक अद्वितीय त्रिविधभेदशून्य 'मां' मुझ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको 'शरणं' घटाकाशका महाकाशके समान, तरंगका जलराशिके समान आश्रय अथवा रक्षक निश्चित रूपसे जानो। 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति' इस श्रुतिके अनुसार प्रत्यगभिन्नता रूपसे विदित ब्रह्म ही अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचका अपनোদন करता है, इसीलिये वह रक्षक है। परब्रह्मकी प्रेमास्पदता परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न होनेपर ही प्रत्यक् आत्माकी पूर्णता एवं प्रत्यगात्मासे अभिन्न होनेसे परब्रह्मकी अपरोक्षता अनौपाधिक अनतिशय परप्रेमास्पदता सिद्ध होती है। यदि प्रत्यगात्मासे तटस्थ परमात्मा ठहरा तो उपर्युक्त बातें बन नहीं सकतीं। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) यह श्रुति प्रत्यगात्माके शेष रूपसे ही सबकी प्रेमास्पदता बतलाती है। अपने कल्याणके लिये भगवान्का भजन कड़वी गुडुचीके पान करनेके समान ही ठहरेगा,
भक्तिरसामृतास्वादन ६१७ क्योंकि स्वास्थ्यके लिये कड़वी गुडुची भी पी जाती है। फिर भगवान्में सातिशय ही प्रेम रहेगा निरतिशय नहीं, जब प्रत्यगात्माका स्वरूप भगवान्को माना जाता है, तभी भगवान्की निरुपाधिक परप्रेमास्पदता बन सकती है। 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इस श्रुतिने ब्रह्मकी अवेद्यतासे ही अपरोक्षता बतलायी है, जो कि प्रत्यगात्मासे भिन्न, तटस्थ ब्रह्मकी किसी तरह नहीं बन सकती। आत्मासे भिन्न पदार्थकी सिद्धि प्रमाणके अधीन ही होती है, स्वतः भासमान स्वारसिक अनतिशय प्रेमस्वरूप ही भगवान् हैं, इसीलिये श्रीशुकाचार्यने भगवान् श्रीकृष्णको सबका अन्तरात्मा बतलाया है— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इसीलिये ब्रह्मविद्वरिष्ठोंके भी चित्तमें हठात् उनकी स्फूर्ति होती है— यावन्निरञ्जनमजं पुरुषं जरन्तं सञ्चिन्तयामि सकले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः ॥ प्रकृत ग्रन्थकार श्रीमद्मधुसूदनसरस्वतीके भी निम्न- लिखित वचन हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्। पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत् किमपि तन्नीलं महो धावति॥२ अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥ इसी तरह श्रीशुक, सनकादि, शंकर, सुरेश्वर, पद्मपाद, चित्सुख, सर्वज्ञात्म, श्रीधरस्वामी आदि सहस्रों ब्रह्मविद्वरिष्ठोंको भी वैसा ही अकैटव प्रेम था। भगवान्ने स्वयं ही श्रीमुखसे 'एकभक्तिर्विशिष्यते' इन शब्दोंसे उपर्युक्त अर्थोंका समर्थन किया है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' इत्यादि श्रुतियोंने किसीको भी अनात्मा समझनेको अनर्थकारक माना है, फिर भगवान्को अनात्मा समझनेकी बात ही क्या? प्रेममें व्यवधान सहनकी क्षमता नहीं होती, इसीलिये दूरमें या व्यवहितमें स्वाभाविक स्वारसिक अकैटव प्रेम नहीं होता। इसीलिये भगवान्को सर्वान्तर परम सन्निहित या प्रत्यगात्मा कहा गया है— 'कैटवरहितं प्रेम न तिष्ठति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे भवति को जीवति॥' —यह प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्में अभेद श्रीअचिन्त्यकल्याणगुणगणाकर भूमा भगवान्की अघटितघटनापटीयसी सदसद्विलक्षणा, समस्त आश्चार्योंकी एकमात्र निवासभूमि, अनन्तशक्तिकी केन्द्रभूता मायाके प्रवाहमें पड़े हुए प्रपंचमें सूक्ष्म विचार करनेपर बुद्धिमानोंके लिये क्रमशः आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व ठहरता है। कोई आत्माको अणुपरिमाण, कोई मध्यम परिमाण तथा कोई विभु मानते हैं। विभुत्ववादियोंमें भी कोई आत्माको अचित्, कोई १. जिसके हाथोंमें वंशी सुशोभित है, जो नवनीरदसुन्दर है, पीताम्बर पहने है, जिसके होठ बिम्बाफलके समान लाल-लाल हैं, जिसका मुखमण्डल पूर्णचन्द्रके सदृश और जिसके नेत्र कमलवत् हैं, उस कृष्णसे परे कोई तत्त्व हो तो मैं उसे नहीं जानता। २. ध्यानके अभ्याससे जिनका चित्त वशमें हो गया है, वे योगी यदि उस निर्गुण और निष्क्रिय परमज्योतिको देखते हैं तो देखा करें। हमारे नेत्रोंको तो कालिन्दीतटविहारी नीले तेजवाला साँवरा ही सुख पहुँचाता रहे।