भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
भगवान् और प्रेम ६४१ सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सम्पूर्ण वस्तुओंके अन्तिम स्वरूप हैं। वस्तुओंका अन्तिम रूप अपना कारण अव्याकृत तत्त्व है। उस अव्याकृतकी भी अन्तिम पर्यवसान-भूमि श्रीकृष्ण हैं; क्योंकि कारणसे भिन्न कार्य और अधिष्ठानसे भिन्न कल्पित नामकी कोई वस्तु ठहरती ही नहीं है— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) वे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद हैं, वे ही अन्तरात्मा हैं, अतः सच्चा प्रेम उन्हींमें ही होना चाहिये। हाँ, सहज, स्वाभाविक प्रेम भी बिना जाने असत्-सा हो जाता है। जैसे छात्राध्ययनके शब्दोंके बीच मिले हुए अपने पुत्रके अध्ययनके शब्दका विविक्त स्पष्ट रूपसे प्राकट्य नहीं होता, वैसे ही आत्मप्रेम प्राणिमात्रमें होनेसे आत्माकी परमानन्दरूपता प्रतीत होनेपर भी अविद्याके कारण उसका स्पष्ट प्राकट्य नहीं होता है। परंतु इस तरह प्राणी अज्ञात रूपसे तो आत्मप्रेमी है ही। अतएव प्राणिमात्र ज्ञानसे, अज्ञानसे, किसी-न-किसी तरह अपने जीवनधन भगवान्का अवश्य ही प्रेमी है। जिसे जितना बोध है, उसे उतना ही प्राकट्य है। जहाँ वह प्रेम सम्यक्रूपसे प्रकट है, वहाँ परिपूर्ण ऐश्वर्य भी नतमस्तक हो जाता है। इसीलिये कहा जाता है कि महत्परिमाण- परिमिति-प्रेमवती व्रजांगनाओंके सामने ऐश्वर्य अपना प्रभाव नहीं डाल सका। कभी श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाओंको जब अकस्मात् कृष्ण किसी निकुंजमें मिल गये, तब कृष्ण अपनेको छिपानेके लिये अनन्त ऐश्वर्यपूर्ण श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट हो गये। गोपांगनाओंने उन्हें प्रणाम किया, परंतु उनसे माँगा यही कि आप कृपा करके हमारे मनमोहन कृष्णचन्द्रको मिला दो। वे उस नारायणरूपपर मोहित नहीं हुईं और श्रीवृषभानुनन्दिनीके पधारते ही वह ऐश्वर्यपूर्ण रूप टिक ही नहीं सका, सहसा कृष्णरूप प्रकट हो गया। निरुपाधिक प्रेम सर्वातिशायी प्रेम है तथापि प्रेम- प्राकट्यमें लौकिकताकी अपेक्षा अधिक होती है। इसीलिये देखते ही हैं कि प्राणियोंको जितना स्वारसिक प्रेम अपने पुत्र, कलत्र, धन-धान्यादिमें होता है, उतना स्वारसिक प्रेम देवता या भगवान्में नहीं होता। इसीलिये परिपूर्ण परमात्मा प्राणि-कल्याणार्थ अपनी अलौकिकताको छिपाकर लौकिक रूप ग्रहण करते हैं। भक्तोंने भी भक्तिके दो रूप माने हैं, एक वैधी, दूसरी रागानुगा। विधिसे प्राप्त भक्ति वैधी है। 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' के अनुसार अप्राप्तिमें ही विधि होती है। समझा जाता है कि जहाँ स्वारसिक, रागानुगामी नहीं है, वहीं विधिकी अपेक्षा होती है। किं बहुना माता-पिता, गुरुजनों एवं लौकिक विषयोंमें भी विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँ भी स्वारसिक प्रीतिमें कुछ कमी हो जाती है। उन सबकी अपेक्षा पत्नीमें प्रीति स्वाभाविक है। पत्नीके प्रति प्रीतिमें भी 'मातृदेवो भव', 'पितृदेवो भव', 'आचार्यदेवो भव' के समान ही 'स्वदारनिरतो भव' इस विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँपर भी स्वारसिक प्रेम नहीं है। जहाँ स्वारसिक प्रेम है, वहाँ निषेध होता है। जैसे बहते जलमें बाँध बाँधनेसे वेग उत्कट हो जाता है, वैसे ही स्वाभाविक प्रेममें निषेध या रुकावट डालनेसे वह भी उत्कट रूप धारण करता है। इसीलिये प्रेमियोंने कहा है— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) अर्थात् हे नाथ! जैसे लोभीको धन और कामुकको कामिनीमें प्रीति होती है, आपके श्रीचरणोंमें मुझे वैसी ही प्रीति होनी चाहिये। उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता लोकमें उपाधिको लेकर होनेवाले प्रेमकी यह दशा है। सर्वोपाधिविनिर्मुक्त होनेपर स्वाभाविक स्वान्तरात्मा चैतन्याभिन्न परमात्मा भगवान्में तो स्वाभाविक प्रेम ही अनन्त है, क्योंकि वहाँ तो भगवान्
६४२ भक्तिसुधा और प्रेम दोनों एक ही वस्तु हैं। परंतु देहादि उपाधियोंकी विद्यमानतामें इतना प्रेम उधर व्यक्त नहीं होता, इसीलिये अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्र भी लौकिक रूपसे भगवान्में प्रेम करते हैं—'अस तब रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥' (रा०च०मा० ३।१३।१३) यहाँतक कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य भगवान् सगुण होते हैं। परमहंसोंको श्रीपरमहंस बनाना भगवान्का उद्देश्य है; क्योंकि उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) अच्युत प्रेम बिना नैष्कर्म्य-विज्ञान भी सुशोभित नहीं होता, फिर भगवच्चरणोंमें समर्पण किये बिना निष्काम कर्म भी कैसे शोभित होगा ? सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥ (रा०च०मा० २।२९१।२) इन दृष्टियोंसे ही ज्ञानी भी भगवान्में प्रेम चाहते हैं। कहीं-कहीं तो न चाहनेपर भी भगवत्स्वरूप सौन्दर्य आदिसे भगवान्में ज्ञानियोंका मन मोहित हो जाता है। यही तो रागानुगा-प्रीति है, जिसके सम्पादनके लिये प्रयत्न अपेक्षित नहीं है, वह हठात् उत्पन्न होती है। सर्वथापि व्यावृत्त बाह्यौत्सुक्य, वीतराग ज्ञानी श्रीभगवान्की ओर आकर्षित होकर आश्चर्यमें कहते हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत् परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ अर्थात् अभ्याससे क्रमेण पंचक्लेशोंके क्षीण होनेपर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न विशुद्ध ब्रह्मसुखकी स्फूर्ति हुई थी, परंतु मेरे उस अद्भुत सुखको व्यर्थ-सा बनाता हुआ यह आमोदभर नराकार श्यामल तत्त्व कौन है ? रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्का प्राकट्य इसी रागानुगा प्रीतिका सम्पादन करनेके लिये भगवान् अलौकिक होते हुए भी लौकिकवत्, अप्राकृत होते हुए भी प्राकृतवत्, अग्राह्य होते हुए भी ग्राह्यवत्, अदृश्य होते हुए भी दृश्यवत्, विश्वके जननी-जनक होकर भी पुत्रवत् होकर प्रकट होते हैं। किं बहुना पति, उपपतितक बनकर भी भगवान् भिन्न-भिन्न प्रीतिको, विषयकी ओर उन्मुख मनको विषयोंसे प्रत्यावर्तित करके अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। यद्यपि वे पतियोंके भी पति, सबके परमपति हैं तथापि निरतिशय परप्रेमके आस्पद बननेके लिये वे ब्रह्म व्रजांगनाओंके उपपति होकर भी प्रकट होते हैं। इसीलिये प्राणियोंका चित्त अलौकिक एवं वैध वस्तुमें उतना नहीं खिंचता, जितना लौकिक एवं अवैधमें। पर वे अवैध होते हुए भी परम वैध हैं, उपपति होते हुए भी परमपति हैं। लौकिक जार लोक-परलोक, धर्म-कर्मको जलानेवाला होता है, पर भगवान् औपपत्य बुद्धिसे भी—जाररूपसे भी भावुकके चित्तपर अभिव्यक्त होकर उसके पंचकोश, स्थूल, सूक्ष्म, कारण—तीनों शरीरोंको, कर्म-बन्धनोंको, किं बहुना अविद्या, तत्कार्यात्मक जगत्को जलाकर भस्मसात् कर देते हैं, इसीलिये वे जार हैं। 'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) अर्थात् निष्काम रागानुगा भक्ति एवं ज्ञान कोशों और कर्मोंको जला देते हैं, जीवात्मा संसारसे छूटकर भगवद्भावको प्राप्त हो जाता है। किसीने भगवान्से परिहास किया था कि हे व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! जो प्राणी आपका नवनीतचौर्य और व्रजयुवतीजनोंमें औपपत्यका प्रख्यापन करते हैं, आप उन्हें शीघ्रतिशीघ्र ही अपना रूप इसलिये प्रदान करते हैं कि वे हमारे रूप हो जायँगे, तब हमारे इन कर्तव्योंका वर्णन न कर सकेंगे। अतः अपने कर्तव्योंको छिपानेके लिये ही नवनीत-चौरता और व्रजयुवतीजन-
भगवत्कथामृत ६४३ जारताको गानेवालोंको आप निजरूप प्रदान करते हैं— प्रथयति नवनीतचौरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यः। वितरसि निजरूपमीश तस्मै स्वकृतधिया परिगोपनाय नूनम्॥ वस्तुतस्तु येन-केनापि प्रकारेण भगवान्में मन जोड़ते ही प्राणीको भगवद्भावकी प्राप्ति हो जाती है। जैसे चिन्तामणिको दीपक समझकर दीपकबुद्ध्या भी प्रवृत्त होनेपर चिन्तामणिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ब्रह्ममें औपपत्यबुद्ध्या प्रवृत्त होनेपर भी प्राप्ति भगवान्की ही होती है। केवल रागानुगामिनी उत्कट प्रीतिके लिये ही भावुक लोग लौकिक रूपमें भगवान्को भजते हैं। ज्ञानीका भी प्रारब्धवशात् प्रत्युपस्थित लौकिक पदार्थोंमें जैसा चित्त स्वाभाविक रूपसे प्रवृत्त होता है, वैसा प्रत्यगात्मामें नहीं। इसीलिये भगवान्की मधुर लीलाओंका प्राकट्य होता है। चापल्यपूर्ण बाल्य, पौगण्डादि अवस्थाओंकी लीलाओंमें हठात् चित्त खिंचता है। इस दृष्टिसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही भगवान् अचिन्त्य, सगुण, साकार, दिव्य श्रीरामकृष्णादिके रूपमें प्रकट होते हैं।
भगवत्कथामृत
हम उस आनन्दकन्द, नन्दनन्दन, गोपिका- वल्लभ, पूर्णब्रह्म, मंगलमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके परम ऋणी हैं, जो हमें सृजनकर हमारा पालन- पोषण कर रहे हैं। उनके मधुर मुखारविन्द, मनोहारी नेत्र, नासिका, अधर और मकराकृत कुण्डल सब- के-सब हमारे हृदयस्थलको पवित्र करने एवं प्रसन्नता देनेवाले हैं, पर शोकके साथ कहना पड़ता है कि हम आज उस नटवर गोपालको—अज्ञानसागरमें अपनेको डालकर—एकदम भूल गये हैं और उसकी मधुरमय लीलासुधारसपानसे अपनेको दूर रखे हुए हैं। भावुकोंका कहना है कि यदि सहस्रों सिर प्रदान कर देनेपर भी उस महाप्रभुकी लीलाका वास्तविक ज्ञान हो जाय और उसका दर्शन हो तो यह सौदा बहुत ही सस्ता है, इसे शीघ्र-से-शीघ्र खरीद लो। ऐसे अमूल्य सौदेको, जो हजारों सिर देकर खरीदनेपर भी सस्ता पड़ता है, हम उपेक्षाकी दृष्टिसे देख रहे हैं। फिर यदि हम सुखकी अभिलाषा करें तो क्या यह हमारी निरी धृष्टता नहीं है? भगवदीय लीलासुधाका आस्वादन वास्तवमें जिन्होंने किया है, वे धन्य हैं और धन्य वे भी हैं, जो इस लीलासुधाके आस्वादनकी उत्कृष्ट अभिलाषा रखे हुए हैं और तत्प्राप्त्यर्थ सचेष्ट हैं। संसारके नाना प्रकारके कल्मषोंको दूर करनेका इससे बढ़कर दूसरा उपाय ही क्या है? इसके लिये विशेष परिश्रमकी भी आवश्यकता नहीं है। भगवल्लीला 'श्रवणेनैव मंगलम्', केवल श्रवणमात्रसे मंगल देनेवाली है, कल्याणसाधक है, तीनों प्रकारके दैहिक, दैविक और भौतिक तापोंसे मुक्तिदायक है। पर यह श्रवण श्रद्धा और भक्तिके साथ होना चाहिये। यह नहीं कि एक कानसे अमृतमय उपदेश सुना और दूसरे कानसे निकाल दिया। अज्ञानजन्य मोहका सर्वथा परित्याग करके ही प्राणी इस लीलासुधाका मधुर पान कर सकता है। अज्ञानजन्य मोहसे मन अस्थिर होता है। मनकी अस्थिरता ही भयका कारण है और मनकी अस्थिरताका कारण है सत्त्वगुणका अभाव। अतः ये दोनों लक्ष्यप्राप्तिमें बाधक हैं। सत्त्वगुणकी जिससे वृद्धि हो और रज, तम शान्त हों, वही प्रयत्न मनुष्यको करना चाहिये। फिर जहाँ, जिस दशा और जिस स्थानमें हों, श्रीमानोंद्वारा प्रसारित भगवदीय लीला-सुखका अनुभव हो सकता है। भगवान्के चरण निर्भयके स्थान हैं। इनकी प्राप्ति सत्कथा-श्रवण, मनन, निदिध्यासन
६४४ भक्तिसुधा और अहर्निश भगवद्भजनसे होती है। 'श्रीमद्भागवत' का एक श्लोक है— स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः। योऽमायया संततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम्॥ (श्रीमद्भा० १।३।३८) अर्थात् परमपिता, परमात्मा, अमितविक्रम, श्रीसुदर्शनचक्रधारी भगवान्के चरण उसीको प्राप्त होते हैं, जो निष्कपट होकर सतत भगवान्में अपने चित्तको लगाकर उनके चरणकमलोंका गन्ध-सेवन करता है अर्थात् उन्हें भजता है। भवभयसे पार करनेवाली नौका बस एकमात्र यही है। प्राणी द्वन्द्वधर्मसे विवर्जित होकर अर्थात् संसारके राग-द्वेष, शोक-मोह आदि जितने कल्मष हैं, सबका त्यागकर भगवदीय लीला-सुधा- समास्वादनका अधिकारी हो सकता है। बाह्य विषयोंके सुखसे मलिन मतिवालोंके लिये लीलासुख नीरस ही लगता है। स्त्रीसमुपभोगजन्य सौख्यतक इस लीलासुखके सामने कुछ नहीं है। वास्तविक सुखके स्वरूपको जिसने समझा है, उसपर जिसने विचार एवं मनन किया है, वही व्यक्ति यह बतला सकता है कि भगवदीय लीलाके माधुर्य रस-सुस्वादमें क्या आनन्द आता है। अनभिज्ञ लोगोंका तो कहना है कि ब्रह्मसुख कुछ है ही नहीं, मरकर गधे आदि भी होकर ऐहिक सुख भोगना वे पसन्द करते हैं, पर निर्विषयक मोक्ष उन्हें पसन्द नहीं। ब्रह्मसुख किसीमें नहीं है, यह एक हास्यास्पद बात है। अनभिज्ञ लोग अविद्याके कारण सौषुप्त सुखको ब्रह्मसुखसे अधिक तो मानते हैं, पर यदि उनकी वह अविद्या हट जाय, उनका हृदयपटल बाह्य सौख्य वासनासे वासित न हो तो उन्हें मालूम हो कि ब्रह्मसुखसे वास्तवमें कितना आनन्द आता है। लोमड़ीको जब अंगूर बार-बार छलांगें भरनेपर भी नहीं मिले तो उसने झट कह दिया कि 'अंगूर तो खट्टे हैं'। इसी तरह ब्रह्मसुखका सुस्वाद जिन अनभिज्ञोंको प्राप्त नहीं होता, वे ही कहते हैं कि इसमें कोई तत्त्व नहीं, कोई आनन्द नहीं। ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है वास्तवमें ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है। सुसौख्य और परमानन्दकी प्राप्ति ब्रह्मसुखके अनुभवसे ही होती है। चैतन्यान्दात्मकसौख्य मृत्युपरिगृहीत प्राणियोंको प्राप्त करनेका प्रयत्न सदैव करते रहना चाहिये, पर पहले कलुषित मतिको विशुद्धातिविशुद्ध बनाना होगा; क्योंकि अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा अपनी मतिको विमल बनाये बिना नहीं की जा सकती। भौतिक धनोंका मोह त्यागकर पारमार्थिक धनका चिन्तन होगा। अन्तःकरणको सभी विकारोंसे रहित करना होगा। इसके बाद भगवदीय लीलाकथा-श्रवणमें मन लगेगा और वही कथा-श्रवण सर्वस्व-समर्पण करायेगा, ब्रह्मप्राप्ति करा देगा और नित्य, शुद्ध, बुद्ध, पूर्ण, निर्विकार, निर्विशेष चैतन्यान्दघनके माधुर्यको हमारे समक्ष पानके लिये उपस्थित करेगा। कथा-श्रवणद्वारा कर्मरन्ध्रसे भगवान् अन्तस्तलमें प्रविष्ट होते हैं। पूर्णब्रह्म चैतन्यान्द परमात्मा सबमें हैं। स्थावर- जंगम सभी प्राणियोंमें उनकी अवस्थिति है। पर हम सब जीव अज्ञानमें पड़े हुए उनकी अवस्थितिको स्वीकार नहीं करते, इसलिये उनको समझनेके लिये भगवदीय कथा-श्रवणका महर्षियोंने आदेश किया है। कथाका श्रवण भी करना चाहिये और उसे प्रदान भी करना चाहिये। दोनों हाथमें लड्डू है। इसका फल परोक्ष नहीं, साक्षात् होता है। कथा-श्रवण एवं उसका प्रदान साक्षात् सुखका प्रभाव दिखलाता है। पर जिनका मन रजस्तमोलेशसे अव्याप्त है, अन्तःकरण शुद्ध है, उन्हींको हरि-कथा सुनने एवं सुनानेका अधिकार है, अन्योंको नहीं। विघ्नकारक तमोलेश- सुसम्पादित मूढ़ता, रजोलेश-सम्पादित धीरतासे लीलासुधासमास्वादन नहीं हो सकता। जिस पिपीलिकाके मुखमें लवणकण वर्तमान है, उसे भला मिसरीके माधुर्यका अनुभव कैसे हो सकता है? वैसे ही मनको घोर मूढ़तारूप लवणकणके रहते शुद्ध नहीं किया जा सकता और जब मन शुद्ध नहीं है, तब फिर
भगवत्कथामृत ६४५ भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? मनुष्य जबतक ऐहिक-आमुष्मिक प्रपंचसे विरक्त न हो, विविध प्रकारके बाह्य सुखोंसे मनको दूर न कर ले, तबतक उसे परमध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, भगवान्की मधुरतापूर्ण लीलाका सुस्वादानुभव नहीं हो सकता। इस सुस्वादानुभवके लिये पूर्ण श्रद्धाका होना अपेक्षित है। देखा-देखी नहीं कि चलो अमुक स्थानपर कथा हो रही है, मैं भी चलकर देखूँ क्या होता है। इस तरहसे लक्ष्यकी प्राप्ति नहीं होती। पूर्ण श्रद्धाके होनेसे क्षणमात्रमें ही भगवत्प्राप्ति होती है। वर्णाश्रमधर्मानुसार वैदिक कर्मसे हृदयको शुद्ध बनाकर अन्धकारपूर्ण आवरणको हृदय-पटलसे दूरकर दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य, माधुर्यका स्वाद लेनेका प्रयत्न करना चाहिये। भगवान् सबके परम प्रकाशक भगवान् सबके परम प्रकाशक हैं। देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, जीव, अहंकार सबके वे प्रकाशक हैं। इनके प्रत्यक्षके लिये आलोककी आवश्यकता नहीं है। जैसे सूर्यके प्रकाशको देखनेके लिये दीपककी कोई जरूरत नहीं है, वैसे ही उसके प्रचण्ड प्रसरित प्रकाशको देखनेके लिये आलोक अपेक्षित नहीं, वह तो प्रत्यक्ष है। जो उस प्रकाशको जानते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं; जो नहीं जानते, वे अनेकानेक अनर्थ- परिप्लुत होते हैं, दीन-दुःखी हो इतस्ततः भ्रमण करते रहते हैं। वे तो हम सबके अन्दर व्याप्त हैं, पर दुःख है कि हम जीव उसे देखनेकी चेष्टा नहीं करते और ठोकरें खाते फिरते हैं। घरमें जैसे अपार सम्पत्ति गड़ी पड़ी हो, पर उसका पता न रहनेसे मनुष्य दुःखी होता है, पैसे-पैसेके लिये मुहताज रहता है, वैसी ही गति आज संसारके जीवोंकी हो रही है। अपने अन्दर वह प्रकाश वर्तमान है, पर उसे न देखकर वे अँधेरेमें पड़े भटक रहे हैं, मायाके चक्करमें घूम रहे हैं। ज्ञानी ऐसी गलती कभी नहीं करते। पाशोंका जो हनन करना चाहे, उसके लिये परम कर्तव्य है कि वह परमतत्त्व चैतन्यान्दघनको देखे तथा जाने और इस भवसागरमें अनन्तकालतक पड़े न रहकर अपनेको इससे मुक्त करे। श्रवणकी महिमा कर्म, भक्ति, ज्ञान तीनोंका मुख्य साधन श्रवण ही बतलाया गया है। सभी कर्मकाण्डका उपदेश वेदमें है और वह वेद गुरुमुखसे अधिकारानुसार यथाविधि श्रवणसे ही प्राप्त किया जाना चाहिये। गुरुमुखद्वारा उच्चारित होनेपर श्रवण किये जानेके कारण ही वेदके अनुश्रव, श्रुति आदि नाम हैं। भक्तिमार्गके पथिकोंके लिये भी श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि नवविध भक्तिसाधनों या भक्तिमें सर्वप्रथम श्रवण ही बतलाया गया है। भगवच्चरित्रश्रवणमात्रसे सर्वान्तरनिवासी प्रभुकी ओर, समुद्रकी ओर अभिमुख होनेवाले अखण्ड, निर्मल गंगा-प्रवाहकी तरह निर्मल अन्तःकरणका भक्तिरूप अविच्छिन्न प्रवाह होता है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) ज्ञानमें भी 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' (बृहदारण्यक० २।४।५) आदि वचनोंद्वारा श्रवणकी ही प्रधानता वर्णित है। 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठोपनिषद् १।२।१५) सब वेद सर्वाश्रय भगवान्का ही प्रतिपादन करते हैं। 'वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते॥' (कल्किपुराण ३।२१।३८) वेद, रामायण, पुराण और महाभारत आदि समस्त शास्त्रोंके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र एकमात्र पापतापहारी भगवान् हरिके ही गुण, लीला आदिका गान है। इत्यादि वचनोंसे यही विदित होता है कि सभी शास्त्रोंके एकमात्र प्रतिपाद्य भगवान् ही हैं। श्रवणमें सभीका अधिकार प्राणीमात्रके लिये सर्वविध कल्याणकारक होनेसे भगवच्चरित्र-श्रवणमें सभीका अधिकार है। भगवच्चरित्रका श्रवण एवं गान मुक्त, मुमुक्षु तथा
६४६ भक्तिसुधा संसारी सभीका कर्तव्य है। निवृत्तेच्छ, निरीह मुक्तोंके परप्रेमास्पद स्वात्मा होनेसे प्रभु भजनीय होते हैं, इसीलिये भजन-भक्तिके लिये मुक्त, पुरुषोंका भी शरीरधारण उपनिषदने बतलाया है, 'मुक्त अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भजन्ते।' (नृसिंहपूर्वता० शांकरभाष्य) भवसागरको पार होनेमें एकमात्र साधन होनेसे मुमुक्षुओंके भी वे परमाश्रयणीय हैं और श्रोत्र, मनके आकर्षक होनेसे संसारियोंके भी श्रोतव्य हैं। ऐसे सर्वश्रेयस्कर प्रभुके चरित्र, कथाका जो श्रवण नहीं करते, वे या तो आत्मघाती हैं या निरे जड़ काष्ठ हैं— निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१।४) श्रवण, संकीर्तनसे श्रोत्रद्वारा श्रोताके मानसपंकजमें प्रविष्ट होकर भगवान् उसके अशेष दोषोंका वैसे ही शमन कर देते हैं, जैसे अन्धकारको सूर्य और तीव्र वायु घनावलिको। जिस कथामें भगवान् अधोक्षजका गुणानुवाद नहीं, वह असती, असत्कथा है, अतः व्यर्थ ही वाणीका उपयोग है। जिस कथामें भगवान्के गुणोंका वर्णन होता है, वही सत्य, मंगल, पुण्य, रम्य, रुचिर, नित्य नवनवायमान मनका महोत्सवस्वरूप और शोकार्णवशोषक है। कोई वाक्यप्रयोग चाहे कितना ही विचित्र शब्दावलि एवं अलंकारोंसे युक्त क्यों न हो, यदि जगत्को पवित्र करनेवाले भगवान्के मंगलमय यशसे निबद्ध नहीं है तो वह हंसतीर्थ नहीं, अपितु वायसतीर्थ है। अतः विवेकियोंका परम कर्तव्य है कि व्यक्तिगत रूपसे प्रतिदिन नियमपूर्वक नियत समयमें भगवान्की परम पवित्र कथाओंका आदर, श्रद्धापूर्वक श्रवण करे और अधिकारानुसार स्वयं भी दूसरोंको सुनाये। प्रत्येक ग्रामों, मुहल्लोंमें किसी देवमन्दिरादिमें कम-से-कम महीनेमें दो-चार दिन भगवत्कथाका आयोजन होना परम आवश्यक है। इस मर्त्यलोकमें भगवान्की कथा साक्षात् अमृत है, अनेक शोक-दुःखसे सन्तप्त प्राणियोंके तापको अपहरण करनेमें समर्थ है, शुक-सनकादि परम विवेकी सत्पुरुषोंसे स्तुत है, सकल पाप-पंकका शोषण करनेवाली है, श्रवणमात्र मंगलप्रद है और व्यासादि महर्षियों द्वारा जगतीतलपर विस्तृत है, अतः सर्वार्थसाधक है। इसको श्रवण करानेवालेसे बढ़कर अधिक दानकर्ता संसारमें और कौन हो सकता है ? तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।९) प्रभुकृपा भगवत्कृपाके बिना मायासे पार होना असम्भव है प्रभुकृपाके बिना प्रभुकी दुस्तरा मायाको तरना अत्यन्त असम्भव है। यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण प्राणी सर्वान्तरात्मा, सर्वाधिष्ठान भगवान्के अंश ही हैं। जैसे जलसे तरंग, अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारियाँ), महाकाशसे घटाकाश, उदंचनाकाश आदि उद्गत (उत्पन्न) होते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण चेतन वर्गकी उत्पत्ति भगवान्से होती है। वस्तुतः अत्यन्त निरुपाधिक तत्त्वमें वास्तविक अंशांशिभाव भी नहीं बन सकता; क्योंकि निरवयव, निरंशमें अवयव एवं अंशकी भावना सर्वथा असम्भव है तथापि जैसे अविकृत कौन्तेय (कर्ण)-में भ्रमसे ही राधासुत होनेकी भ्रान्ति हो गयी, वैसे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, स्वप्रकाश चिद्रूपमें ही भ्रमसे जीवभाव भासित होता है। जैसे मायावी अपनी चमत्कारपूर्ण मायाद्वारा निर्विकार रूपसे स्थिर रहकर ही आकाशमें कच्चे सूत्रकी कुखरी (बण्डल) फेंककर शस्त्रास्त्रसुसज्जित वीरवेशमें सूत्रके सहारे ऊपर चढ़ता है, चढ़ते-चढ़ते अदृश्य हो जाता है और फिर दैत्योंसे युद्ध करता है, युद्ध करते-करते
उसके अंग-प्रत्यंग—सिर आदि अवयव पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, उसकी पत्नी उन्हें लेकर चितारोहण करके पतिकी सहगामिनी हो जाती है, यह सब घटना प्रत्यक्ष दिखायी देनेके पश्चात् वह उसी तागेके सहारे फिर आकाशसे उतरता हुआ दिखायी देता है, फिर भी वास्तविक मायावी अपनी मायासे लोगोंकी दृष्टिसे ओझल होकर जहाँ-का-तहाँ ही विराजमान रहता है, वैसे ही प्रत्यक् चिदात्मा भगवान् निर्विकार, कूटस्थ, एकरस रूपसे सर्वदा स्वरूपस्थ होनेपर भी समष्टि- व्यष्टि, स्थूल-सूक्ष्म-कारण जगत्, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-अवस्था आदि प्रपंच फैलाकर उनपर विश्व- तैजस्-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ-अव्याकृतरूपमें अनुभूय- मान होता है, अनेक व्यवहारोंमें तल्लीन, तज्जन्य शोक-मोहादि उपद्रवोंमें फँसा हुआ दिखायी देता है, परंतु फिर भी उसके स्वरूपमें किंचित् भी विकार या हलचल नहीं होती। प्रपंच एवं प्रपंचरूप स्वरूपसे पृथक्, असंग, कूटस्थ स्वरूप सर्वदा एकरस ही रहता है। इसी देहमें अन्तर्मुख होकर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहमर्थ आदि अतत् (अनात्मा)-का अपोहन करते हुए, यदि ढूँढ़े तो उसके उपलब्ध होनेमें कठिनाई नहीं, परंतु जैसे कोई घरमें खोयी हुई वस्तुको वनमें ढूँढ़े, वैसे ही बहिर्मुख प्राणी आन्तर वस्तुको—भीतरकी खोयी वस्तुको बाहर ढूँढ़ता है। विचार करनेपर सर्वभास्य दृश्यके भासक निर्विकार दृक्स्वरूप भानात्मक भासकके उपलम्भमें कार्य- परम्पराको परम कारणमें और परम कारणको भी कार्यकारणातीत तत्त्वमें विलीन या बाधित कर देनेपर अशेष विशेषातीत वस्तुको पा लेने में कठिनाई नहीं है तथापि भगवत्कृपाके बिना मिथ्या विश्वसे अभिनिवेश नहीं छूटता— वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः। तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम्॥ (श्रीमद्भा० ५।१८।४) अर्थात् क्रान्तदर्शी लोग विश्वको विनश्वर बतलाते हैं, अध्यात्मविद् विद्वान् विश्वकी विनश्वरताका अनुभव भी करते हैं तथापि आपकी मायासे मोहित हो जाते हैं, ऐसे विस्मयजनक कृत्यवाले अज अव्यात्मा आपको नमस्कार है। इस श्वान, शृगाल, गृध्र, काकादि पिशिताशियोंके भक्ष्य, अस्थि-मांस-चर्ममय पंजर, मूत्र- पुरीष-भाण्डागार, मायामय, क्षणभंगुर, बुद्बुदोपम देहसे उन्हीं लोगोंकी अहंता-ममता छूटती है और वे ही लोग दुस्तरा, गुणमयी मायाको तर सकते हैं, जिन्होंने निष्कपटभावसे सर्वात्मना भगवान्के श्रीचरणोंका सहारा लेकर उनकी दयादृष्टिको प्राप्त कर लिया है— येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ (श्रीमद्भा० २।७।४२) अन्यथा अविवेक, अज्ञानसे प्रत्यक्ष सिद्ध करतलस्थित आमलकके समान अत्यन्त अपरोक्ष- सर्वात्मभाव भी परोक्ष या असत्कल्प हो जाता है और फिर प्राणी आध्यात्मिकता, आधिदैविकताको भूलकर केवल आधिभौतिक वैषयिक भोग-विलासोंके किंकर बनकर आसक्ति, असन्तोष, विद्वेष आदि आसुर भावोंसे ग्रस्त होकर परस्पर एक-दूसरेके संहारक बन जाते हैं। इसीलिये सन्तोंने सर्वदा ही भगवत्कृपाकी प्रतीक्षाको मुख्य माना है, अपने और विश्वके कल्याणके लिये प्रभुमें चित्तको—निष्काम मतिको जोड़ना ही मुख्य पुरुषार्थ माना है। सम्पूर्ण प्राप्तव्य तत्त्वोंकी प्राप्ति इतनेहीसे सम्पन्न हो जाती है। भगवान्के श्रीचरणोंमें अहैतुकी मतिवाले नैष्ठिक भक्त सम्पूर्ण विश्वको—सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मवत् भगवत्स्वरूप ही देखते हैं। वे खलोंका भी अहित न चाहकर हित ही चाहते हैं। उनके स्वार्थ-परमार्थमें अन्तर नहीं रह जाता। जब प्राणी आत्मसम्बन्धी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, कलत्र, मित्र, क्षेत्र, वित्त आदि अत्यन्त अनात्माको भी प्रेमास्पद बनाकर उनका हित चाहता है; देह, इन्द्रिय,
भ
Position under स: ग
Position under ी: या
Position under प: च्ञा
Wait!
Position under व: य
Position under र: द
Position under ा: द्भ???
WAIT! Look at that:
Under व is य.
Under र is द!
Under ा is द्भ or भ??
Wait! It's य, then द, then भ!
Wait, is भ combined with द, or is it द followed by भ?
Wait! Look at द् + भ vs द + भ:
Wait, look at द:
It has a top bar, a vertical stem, a curved body, and a tail curving down.
Then NEXT to it is भ?
Wait! Look at the top bar above भ:
It has a top bar, with a gap for भ's head, and a right vertical stem!
Wait, is द separate from भ?
Look at: यद then भ?
Wait, look at the tail of द: does it touch भ?
Wait, look at य द भ ग्न या च्ञा?
Wait, if it's य द भ, why would there be a द?
निर्बलका बल ६४९ नहीं। भगवान्के तोषका हेतु उच्चकुलमें जन्म, सौभाग्य, मनोहर वाक्, दिव्य बुद्धि, सुन्दर आकृति आदि नहीं; क्योंकि इन सब गुणोंसे रहित भी बन्दरोंको भगवान्ने अपना सखा बनाया— न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः। तैैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस- श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः॥ (श्रीमद्भा० ५।१९।७) श्रीहनुमान्जी कहते हैं कि जब सर्वगुणविहीन बन्दर—जिसके नामसे रोटी मिलनेमें भी बाधा उपस्थित हो सकती है—उस सर्वविधहीनको भी सजल नयन होकर गुणग्राम सुननेसे प्रभुने अपना लिया, तब फिर औरोंकी तो बात ही क्या है? कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ (रा०च०मा० ५।७।७-८, ५।७) जो ऐसे प्रभुको समझ-बूझकर भी भूल जायें, फिर वे क्यों न दुःखी हों— जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ (रा०च०मा० ५।८।१) जो प्राणी मनुष्य-शरीर पाकर भी भगवत्कृपा- सम्प्रदानपूर्वक भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदाश्रयण नहीं करते, वे मायामय प्रलोभनोंमें फँसकर बार-बार बन्दरोंके समान बन्धनको प्राप्त होते हैं— प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् । न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ (श्रीमद्भा० ५।१९।२५) निर्बलका बल भगवान्का गुणगान भवरोगका सर्वश्रेष्ठ महौषध है हर एक श्रेणीके प्राणीको श्रीभगवान्का स्मरण एवं आराधन हर समय करना आवश्यक है। यही कारण है कि भगवान्के मंगलमय परमपवित्र चरित्रादिके श्रवण-मननके अधिकारी ज्ञानी-अज्ञानी, सिद्ध-साधक सभी हैं और सभीको उनके अनुरूप फल भी मिलता है। फिर वे उसे चाहें अथवा न चाहें। यद्यपि जो महापुरुष स्ववर्णाश्रम-धर्मानुसार भगवान्की आराधनाद्वारा निर्मलान्तःकरण होकर वेदान्तोंके श्रवण-मनन- निदिध्यासन एवं तत्त्वसाक्षात्कारसे कृतार्थ हो चुके हैं, उन्हें किसीकी भी अपेक्षा नहीं होती, न उन्हें कुछ करनेसे प्रयोजन है, न उनका किसीसे कुछ अर्थ ही है, बल्कि यदि उन्हें कुछ कर्तव्यबुद्धि हो तो उनकी तत्त्वज्ञतामें भी संदेह किया जाता है— ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्॥ तथापि भगवान्के भजनमें उनकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। अतएव भगवान्के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी—इन चार भक्तोंमें ज्ञानीको सर्वश्रेष्ठ भक्त कहा है—'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ति- र्विशिष्यते।' (गीता ७।१७) अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण निर्ग्रन्थ होकर भी भगवान्में निष्काम भक्ति करते हैं; क्योंकि भगवान्में कोई अद्भुत आत्मारामचित्ताकर्षक लोकोत्तर गुण ही हैं— आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ (रा०च०मा० ७।५३।२; ७।३२।६) इतना ही नहीं, विशेषतः ऐसे ही तृणारहित महामुनीन्द्र ही भगवान्के गुणगानके अधिकारी माने गये हैं; क्योंकि जिसका मन निरन्तर भगवत्स्वरूपा-
६५० भक्तिसुधा मृतसास्वादनमें लगा रहता है, वही उस रसका वितरण कर सकता है। जिस समय राजर्षि परीक्षित्ने ब्रह्माके वत्सहरण-सम्बन्धमें कुछ पूछा, उस समय ब्रह्मर्षि शुकदेवका मन प्रश्नद्वारा हृदयमें अभिव्यक्त भगवान्के स्वरूप-गुण-लीलारसमें लीन हो गया। फिर बड़ी कठिनाईसे जब घण्टा-शंख-निनाद आदिसे वे सावधान किये गये, तब कथा चली— इत्थं स्म पृष्टः स तु बादरायणि- स्तत्स्मारितानन्तहृताखिलेन्द्रियः । कृच्छ्रात् पुनर्लब्धबहिर्दृशिः शनैः प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।४४) वस्तुतः जैसे पात्रमें भरपूर भरा हुआ रस वायुके आघात या उफानसे बहिर्भूत होता है, वैसे ही भावुकके हृदयमें अनुभूयमान भगवदीय रस प्रेमोद्रेकसे उद्गीर्ण होकर कथासुधारूपमें व्यक्त होता है। अतः वे ही चरित्र-वर्णनके मुख्य अधिकारी होते हैं— निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१।४) अर्थात् भगवान्का गुणानुवाद तृष्णाविरहित योगीन्द्रोंद्वारा गाया जाता है और वह भवरोगका सर्वश्रेष्ठ महौषध है। साथ ही श्रोत्र और मनको आनन्द देनेवाला है अर्थात् विमुक्त, मुमुक्षु और विषयी सभी भगवच्चरित्रसेवनके अधिकारी होते हैं— सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई। (रा०च०मा० ७।१५।५) अर्थात् भगवान्का चरित्र सुननेसे विमुक्तको भक्ति, मुमुक्षुको गति और विषयीको सम्पत्ति मिलती है। इसके साथ-ही-साथ श्रवण-सुख मिलता है और मनको प्रसन्नता भी मिलती है— बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥ (रा०च०मा० ७।५३।४) निरन्तर भगवत्स्मरण सभीके लिये परम श्रेयस्कर है पूर्णपरमात्मरति ब्रह्मनिष्ठका भगवद्भजन स्वाभाविक कर्म हो जाता है—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।’ अमानित्व, अदम्भित्व आदि गुणगण जैसे स्वभावसे ही ज्ञानीमें होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन, भगवत्परायणता भी ज्ञानीमें स्वाभाविक होती है। इसके सिवा भगवत्कृपासे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परमात्मतत्त्वमें स्थिति होती है, अतः कृतघ्नता- निवृत्यर्थ भी ज्ञानी भगवान्को भजता है। सभी वेदान्ताचार्योंने कहा है— यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरुरीश्वरः । आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये ॥ अर्थात् ज्ञानीको यावज्जीवन वेदान्त, गुरु और ईश्वरकी वन्दना करते रहना चाहिये। प्रथम ब्रह्मविद्या- प्राप्तिके लिये इन सबका वन्दन होता है, पश्चात् कृतघ्नता दूर करनेके लिये। विवेकियोंने ज्ञानीके लिये अभेदभावसे ब्रह्मात्मनिष्ठा या भेदभावसे भगवद्भक्तिको समान ही कहा है। जैसे प्रेयसी प्रेमोद्रेकमें प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहरण करे अथवा सावधानीसे पादयुग्मकी परिचर्या करे, दोनों एकही-से हैं तथापि जैसे चित्त मिल जानेपर भी चतुर नायिका अपने प्रियतमको घूँघट-पटकी ओटसे ही देखती है, वैसे ही भेदभावके मिट जानेपर भी ज्ञानी भेदभावसे भगवान्को भजते हैं। पारमार्थिक तत्त्व जानकर, व्यावहारिक द्वैतको लेकर भगवान्की भक्ति मुक्तिसे भी अत्यन्त श्रेष्ठ है और भक्त्यर्थभावित द्वैत अद्वैतसे भी श्रेष्ठ होता है। यह स्थिति लोकसंग्रहनिरपेक्ष पूर्णपरमात्मनिष्ठ विज्ञानीकी है। परंतु लोकसंग्रही ज्ञानीको तो लौकिक, वैदिक, धार्मिक, नैतिक अनेक प्रकारके कर्म करने पड़ते हैं और उनमें अनेक प्रकारकी विषम परिस्थितियोंका भी अनुभव करना पड़ता है। अनेक प्रकारके तापोंका भी योग उपस्थित होता है, अतः उन लोकसंग्रहियोंको यह परम आवश्यक होता है कि वे
[Page-header: निर्बलका बल ६५१]
विनश्वर विषम प्रपंचके भीतर सम अविनश्वर परमात्मतत्त्वका स्मरण रखें। लोककल्याणार्थ या आत्मकल्याणार्थ कार्यक्षेत्रमें अवतीर्ण होनेपर सहस्रों दोषोंके संचारकी सम्भावना होती है, इसलिये उन सबसे बचकर अव्याहत स्वरूपनिष्ठा बनाये रखनेके लिये निरन्तर श्रीभगवान्की स्मृति परमावश्यक है। तीसरे हैं मुमुक्षु लोग, ये दो श्रेणीके हैं, एक तो मोक्षकी आकांक्षासे श्रीहरिके चरणपंकजमें समर्पण- बुद्धिसे स्वधर्मानुष्ठान करनेवाले एवं दूसरे शुद्धान्तःकरण हो जानेपर तीव्र विविदिषासे श्रवण, मनन, निदिध्यासन करनेवाले। इन दोनों ही श्रेणीके पुरुषोंको निरन्तर भगवत्स्मृति परमावश्यक है। नैष्कर्म्य-तत्त्वज्ञान भी बिना श्रीहरि-प्रेमके शोभित नहीं होता, फिर कर्म चाहे निष्काम ही क्यों न हो, भगवच्चरणपंकजमें बिना समर्पण किये वह शोभित नहीं होता— 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।' (श्रीमद्भा० १२।१२।५२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥' (रा०च०मा० २।२७७।५) 'सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहाँ न राम पद पंकज भाऊ॥' (रा०च०मा० २।२९१।१) जो कर्म भगवत्समर्पणके लिये अनुष्ठित होंगे, उन कर्मोंकी शुद्धिपर ध्यान रहेगा, बुद्धिमान् भगवान्को अशुद्ध कर्मोंका समर्पण नहीं करेंगे। अतः यदि 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥' (गीता ९।२७), 'कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा' (श्रीमद्भा० ११।२।३६) इत्यादि भगवान् और भगवदीयोंके कथनानुसार सभी कर्मोंको भगवान्में समर्पण करनेका नियम बनाया जायगा तो लौकिक-वैदिक सभी कर्मोंमें शुद्धि रहेगी और हर एक कर्मको करते समय भगवान्का स्मरण रखनेसे अन्तरात्माको त्रितापसे तप्त न होना पड़ेगा। भगवद्भक्ति, भगवत्स्मृतिकी महिमासे शीघ्र ही भगवान्का साक्षात्कार भी हो सकेगा— 'भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।' (गीता १८।५५) भगवत्प्रेमसे निर्मल एवं एकाग्र मनपर सहजमें ही परमात्मस्वरूपकी अभिव्यक्ति हो जाती है। प्रापंचिक व्यवहारमें आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अनेक तापोंसे तप्त होना पड़ता है। परंतु जिनके हृदयमें भगवान्की पदनखमणिचन्द्रिकाकी आभा रहती है, उन्हें वे ताप उसी तरह नहीं तपा सकते, जैसे शारदी चान्द्रमसी ज्योत्स्नाके विकसित होनेपर सूर्य- ताप नहीं तपा सकता। जैसे साँपके विषसे परिश्रान्त होकर नकुल विश्रान्तिके लिये अरण्यमें जाकर विषघ्नी दिव्य महौषधियोंका सेवन करता है, वैसे ही संसार- विषसे व्याकुल होनेपर संसारियोंको भी सत्संगमें जाकर भगवत्स्मृतिका सेवन करना चाहिये। कहा जाता है कि भगवान्का स्मरण-भजन और लौकिक कर्म दोनों साथ कैसे बन सकते हैं? परंतु भगवान् तो और कार्योंकी कौन कहे, सबसे विषम कर्म जो युद्ध है, उसको करते हुए भी भगवत्स्मृतिको आवश्यक बतलाते हैं। कृषि, व्यापार आदि सभी कर्मोंसे युद्ध कठिन है, उसमें अस्त्र-शस्त्रकी वर्षा होती है, उससे हर समय अपने मर्मोंको बचाना, परच्छिद्रान्वेषण करना, अस्त्र-शस्त्र चलाना, शस्त्र-अस्त्रोंके लगनेपर व्यथाओंको भी सहन करना पड़ता है। परंतु भगवान्के मतसे उस समय भी परमात्मस्मरण रखना परमावश्यक है— 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।' (गीता ८।७) चौथी कोटिके वे पुरुष हैं जो निष्काम नहीं हैं, किंतु आर्त और अर्थार्थी होकर आर्ति-निवृत्ति एवं अर्थप्राप्तिके लिये विविध प्रकारके लौकिक कर्मोंमें प्रयत्नशील होते हैं। उन्हें भी अपने प्रयत्नोंकी सफलताके लिये भगवान्का स्मरण-भजन करते रहना चाहिये, केवल अपने साधन-बलके गर्वमें भगवान्को नहीं भूलना चाहिये। अतएव यद्यपि अर्जुन बुद्धिबल, बाहुबल, सैनिकबल, धनबल आदिमें सम्पन्न थे तो भी उन्हें भगवत्स्मरणकी आवश्यकता बतलायी गयी है। वस्तुतः जितना भी साम्राज्य, स्वाराज्य,
६५२ भक्तिसुधा वैराग्य, शौर्य, वीर्य, ऐश्वर्य, अभ्युदय है, वह सभी धर्म और ईश्वराराधनका ही फल है। दरिद्रता, परतन्त्रता, आधि, व्याधि, शोक, सन्ताप आदि अनर्थ धर्मकी उपेक्षा और ईश्वरविमुख होनेका फल है। महा-महा शूरवीर एवं ऐश्वर्यवानोंके चरित्रोंपर ध्यान देनेसे विदित होगा कि उन्होंने धर्म और ईश्वरके सेवनसे उच्चतम स्थिति प्राप्त की है। अतएव सुख एवं तत्साधनोंकी न्यूनाधिकतासे उसके हेतुभूत पुण्यकी न्यूनाधिकताकी कल्पना होती है, दुःख और दुःखसाधनोंके तारतम्यसे उसके हेतु पापके तारतम्यकी कल्पना होती है। इस जन्ममें भी धर्म और भगवान्का आश्रयण करके जो अभीष्ट फलसिद्धिके लिये प्रयत्नशील होते हैं, उन्हें बड़ी सुगमतासे सफलता मिलती है— ‘मामाश्रित्य यतन्ति ये।’ (गीता ७। २९) पाँचवीं कोटिके वे पुरुष हैं, जो आर्त एवं अर्थार्थी तो हैं, परंतु आर्ति-निवृत्ति एवं अर्थप्राप्तिके लिये उनके पास कोई साधन नहीं है, उनके लिये भी एक भगवान्का ही सहारा रह जाता है—‘निरबलके बल राम।’, ‘हारेको हरिनाम॥’ जब सर्वसाधनसम्पन्नोंको भी साधनबलका दर्प छोड़कर श्रीभगवान्का सहारा लेना पड़ता है, तब साधनहीन किसकी शरण जायें ? निर्बल, निराश्रय पुरुष किसी आश्रयका अन्वेषण करता ही है, गिरते हुए पुरुषके हाथ-पैर स्वभावसे ही किसी आश्रयको पकड़नेके लिये प्रवृत्त होते हैं। बालक विपन्न एवं उपद्रुत होकर माता-पिता एवं बन्धुकी ओर दौड़ता है, प्रजा राजाकी ओर दौड़ती है, निर्बल बलवान्की ओर दौड़ता है। परंतु जहाँ इन किन्हींका वश या सहारा नहीं है, वहाँ सिवा पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् सर्वान्तरात्माके और किसका सहारा हो सकता है ? वस्तुतः परमज्ञानी, भगवत्परायण और इस साधनशून्य अर्थार्थी या आर्तकी स्थिति समान ही है, उसके भी सब कुछ भगवान् ही हैं और इसके भी सब कुछ भगवान् ही हैं। निरालम्ब, निःसाधन आर्त एवं अर्थार्थी बड़े प्रेम और विश्वाससे भगवान्को पुकारता है और भगवान् उसकी जल्दी ही सुनते भी हैं। प्रतिज्ञा भी उनकी यह है, एक बार भी जो प्रपन्न होता है, उसे मैं अभय देता हूँ— सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ (वाल्मीकीय० ६।१८।३३) हतभाग्य प्राणीको भगवान्के इस व्रतपर विश्वास नहीं होता, किंतु साधारण राजाओं और उनकी झूठी प्रतिज्ञाओंपर विश्वास होता है। आर्तकी आर्ति मिटाकर भगवान् उसे परम अभय देते हैं, कृतार्थ कर देते हैं। अर्थार्थीको भी अर्थप्रदानके बाद निष्काम, जिज्ञासु एवं ज्ञानी बनाकर तार देते हैं। विभीषण पहले अवश्य अर्थार्थी था। परंतु अन्तमें तो पूर्ण परमार्थी हो गया। भगवान्का दर्शन करके उसने कहा था— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ (रा०च०मा० ५।४९।६-७) परंतु इन सब परिस्थितियोंसे भिन्न एक और भी छठी परिस्थिति उस प्राणीकी है, जो कृतकृत्य भी नहीं, निष्काम और विरक्त भी नहीं, आर्त- अर्थार्थी होकर भी निराश्रय एवं साधनविहीन है और साथ ही भगवान्पर जिसे विश्वास भी नहीं है। परंतु यदि उसकी आन्तर भावना ऐसी हो कि भगवान्में हमारा विश्वास उत्पन्न हो और हम अपनी परिस्थितियोंको समझकर भगवान्को पुकारें कि ‘हे नाथ! आप ही ऐसी कृपा करो, जिससे हम आपपर विश्वासकर आपको पुकारें और आपको न भूलें और मैं ब्रह्म (भगवान्)-का निराकरण (उपेक्षण) न करूँ।’—‘माहं ब्रह्म निराकुर्याम्।’ वस्तुतः भगवान्की कृपासे ही प्राणी विश्वासपूर्वक भगवान्की शरण जाता है। श्रीअक्रूरजीने कहा है— ‘हे नाथ! आज मैं आपके श्रीचरणोंके शरण आया हूँ, यह भी आपकी कृपाका ही फल है। जब प्राणियोंकी सांसारिक विपत्तियाँ मिटनेको होती हैं, तभी सदुपासनासे आपके श्रीचरणोंमें उनकी प्रीति होती है’—
सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) सचमुच आज भारतकी यही अन्तिम दशा है। न वह कृतकृत्य है, न निष्काम एवं विरक्त। वह आर्त एवं अर्थार्थी होकर भी आश्रय एवं साधनविहीन है। बुद्धिबल, बाहुबल, सैन्यबलसे रहित निःसहाय है। हिन्दू-मुसलमानके अतिरिक्त शैव-वैष्णव एवं वैष्णव- वैष्णव ही परस्पर कटकर मर सकते हैं। यदि कथंचित् धरना आदि अशास्त्रीय मार्गसे कुछ मिल भी जाय तो वह उसकी रक्षा भी नहीं कर सकता। इतनेपर भी उसमें धर्म और भगवान्से विश्वास उठ चला है— ग्रह गृहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ (रा०च०मा० २।१८०) जहाँ अर्जुन ऐसे साधनसम्पन्न योद्धाके लिये भी ‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (गीता ८।७)-का आदेश था, वहाँ सर्वसाधनशून्य दशामें भी भगवान्का स्मरण नहीं होता, इससे अधिक इसकी शोचनीय दशा और क्या हो सकती है ? अस्तु, इसके हितैषियों और इसको चाहिये कि वह भगवान्को पुकारे और प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! हम सबको आपमें विश्वास और भक्ति दो, जिससे कि हम आपको पुकारें। हम सबको धर्मग्लानि—अधर्माभ्युत्थान मिटाकर परमकल्याण— मूलभूत धर्ममें प्रीति दो, जिससे सब तरहके अनर्थ मिटकर भारत फिर अभ्युदय एवं निःश्रेयसका भागी हो।’
करुणालहरी
प्रेमी भक्तका भगवान्के प्रति मधुर उपालम्भ पण्डितराज श्रीजगन्नाथजीकी ‘गंगालहरी’ का नाम भला कौन नहीं जानता? उन्हींकी एक अत्यन्त अद्भुत सरस कृति ‘करुणालहरी’ है। उसीमेंसे कुछ सदुक्तियाँ यहाँ निदर्शित की जा रही हैं। एक पद्यमें वे कहते हैं—भगवन्! मैं तो नरकोंकी तरह-तरहकी यातनाओंसे परिचित हूँ, मेरी लज्जा भी विदा हो चुकी है, फिर दूसरोंके द्वारोंपर भटकनेसे मेरा क्या बिगड़ेगा? परंतु नाथ! जरा आपको सूक्ष्म दृष्टिसे विचारना चाहिये, जनता आपको क्या कहेगी?— नितरां नरकेऽपि सीदतः किमु हीनं गलितत्रपस्य मे। भगवन् कुरु सूक्ष्ममीक्षणं परतस्त्वां जनता किमालपेत्॥ नाथ! यद्यपि नरकोंमें अपने कर्मोंके ही परिणामस्वरूप मुझे बड़ी-बड़ी यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं, फिर भी यह बड़ी असह्य बात है कि देखनेवाले मुझे अनाथ कहते हैं। नाथ! भवजालबन्धनमें तो नृग, गजेन्द्र आदि मेरे साथ ही बँधे थे। मेरी उपेक्षा करके उन्हें मुक्त करते हुए क्या आपके मनको करुणा नहीं द्रवित करती ? प्रभो! आप बिना उपाधि (कारण) ही प्राणियोंकी विपत्तियोंको दूर करते हैं, यह जानकर ही मैंने पुण्यपुंजोंकी उपेक्षा की है। आपको पतित-पावन सुनकर ही मैंने अहर्निश पाप किया। फिर अब आप उपेक्षा करते हैं? प्रभो! मैंने पुण्य कभी नहीं किया, सब कुछ पाप ही किया है, फिर मैं अब आपसे कैसे क्या कहूँ? नाथ! आपके सामने ही मुझे मद, काम, मोह आदि अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। आपको क्या लज्जा नहीं लगती? गढ़ेमें गिरते हुए शिशुको पथिक भी शीघ्रताके साथ बचा लेता है। नाथ! आप तो जनक ही हैं, फिर भवार्णवमें डूबते हुएको क्यों नहीं बचाते?— अयि गर्तमुखे गतः शिशुः पथिकेनापि निवार्यते जवात्। जनकेन पतन्भवार्णवे न निवार्यो भवता कथं विभो॥ हे सुकृतप्रिय! यदि आप सुकृतियोंको ही सुखद होकर मुझ पातकीको धारण नहीं करोगे तो आपका विश्वम्भर नाम भी दुर्लभ हो जायगा। प्रभो! यदि आप मेरे परुष (कठोर) वाक्योंसे रुष्ट हो गये हों तो मुझ मुखर और अपराधीको अपने संसारसे निकाल दो। प्रभो! पतित, दुर्गत एवं अकृतज्ञ कैसा भी क्यों न हो,
६५४ भक्तिसुधा 'मैं आपका हूँ' ऐसा कहनेमात्रसे आपको लज्जासे ही उसपर दया करनी चाहिये। किसी पुण्यप्रकृतिपर कृपा करनेसे कोई विशेष महत्त्व नहीं है। कृपानिधे ! यदि मुझ-सरीखे पापियोंपर कृपा की जाय तो आप ही सोचिये, कितनी कीर्ति होगी ? जो बालक शैशवावस्थामें लालित किया गया है, बड़ा होनेपर उसीकी ताड़ना उचित है। परंतु आपने तो मेरा कभी भी लालन नहीं किया। फिर मेरी ताड़ना क्यों ? अथवा भगवन् ! मेरा ही दोष है, मैं ही दूषित हूँ, व्यर्थ ही आपको उपालम्भ देता हूँ। जैसे रमणीके विरहज्वरसे ज्वलित कुमति प्राणी अमृतांशुकी निन्दा करता है, वैसे ही मैं अपने ही दोषसे आपको उपालम्भ देता हूँ। प्रभो ! मैं अत्यन्त नम्रतासे पूछता हूँ, जरा अच्छी तरह विचारकर इसका उत्तर मुझे दें। मैं क्या गजेन्द्र और गोवर्धनपर्वतसे भी अधिकतर गुरु (भारी) हूँ, जो आप शीघ्रतासे मेरा उद्धरण नहीं करते ?— [
गजेन्द्र-मुक्ति ६५५ गजेन्द्र-मुक्ति आर्तभक्तकी प्रार्थना क्षीरसागरसे आवृत एक त्रिकूट पर्वत था। उसके चाँदी, लोहे और सोनेके शृंगोंकी दिव्य दीप्तिसे क्षीरसागर और सारी दिशाएँ प्रदीप्त हो रही थीं। नाना प्रकारके रत्नों, मणियों, वृक्षों, लताओं तथा पक्षियों, सिद्ध, चारण, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराओंसे उस पर्वतकी शोभा निरन्तर बढ़ रही थी। उसी पर्वतकी द्रोणीमें ही एक बड़ा विशाल सरोवर था, जिसमें बहुत-से कंचन वर्णके पंकज शोभायमान थे। कुमुद-कमल आदिकी श्रीसे समवेत, षट्पदोंके घोष और पक्षियोंके कलनादसे उसकी शोभा बड़ी अद्भुत हो रही थी। उसी पहाड़ और जंगलोंमें एक गजेन्द्र रहता था। वह अपनी हथिनियों और यूथोंके साथ सकण्टक वेणु और वेत्रोंके वनोंको तोड़ता-फोड़ता, बड़ी-बड़ी वनस्पतियोंको भी गिराता हुआ सरोवरमें स्नान करनेके लिये चला। उसकी गन्धमात्रसे दूसरे हाथी, सिंह, व्याघ्र, व्याल आदि भयभीत होकर भागने लगे। उसके अनुग्रहसे हरिण, शश आदि क्षुद्र जन्तु निर्भय होकर विचरण करते थे। घामसे तप्त होकर मतवाले हाथियों और हथिनियोंके साथ अपनी गुरुतासे उस पर्वतको प्रकम्पित करता हुआ, मद पीनेवाले भ्रमरोंकी मालाओंसे निषेवित वह गजेन्द्र पंकजरेणुरूपित वायुको सूंघता हुआ सरोवरके पास जा पहुँचा। तृषार्दित अपने यूथके साथ उस सरोवरमें प्रविष्ट होकर उसने खूब जल पीया और अपनी शुण्डसे जल डाल-डालकर अपनेको नहलाने लगा। शुण्डोद्भूत जलकणोंसे अपनी हथिनियों और बच्चोंको पिलाने और नहलानेमें दूसरे गृहस्थोंके समान ही वह दयालु गजेन्द्र संलग्न हो गया। ईश्वरकी मायासे मोहित होनेके कारण उसे विपत्ति दृष्टिगोचर नहीं हुई। इतनेमें ही किसी दैवप्रेरित बलवान् ग्राहने आकर क्रोधसे उसका पाँव पकड़ लिया। महाबलवान् गजेन्द्रने अपनेको छुड़ानेके लिये बड़ा प्रयत्न किया। उसे आतुर देखकर हथिनियों और हाथियोंने भी छुड़ानेका प्रयत्न किया, परंतु ग्राहसे आकृष्ट गजेन्द्रको बचानेमें असमर्थ होकर वे दीन- बुद्धिसे चिल्लाने लगे। गजेन्द्र कभी ग्राहको बाहरकी तरफ ले जाता था और कभी ग्राह गजेन्द्रको भीतरकी तरफ ले जाता था। इस तरह परस्पर एक-दूसरेको खींचते और लड़ते हुए हजार वर्ष बीत गये, फिर भी दोनों जीते रहे। देवता भी आश्चर्य मान रहे थे। पानीमें दिन-रात आकृष्ट होनेके कारण गजेन्द्रके मन, बल और ओजका बहुत व्यय हो गया, अतः शिथिलता आ गयी। इसके विपरीत ग्राहकी शक्ति बढ़ गयी; क्योंकि ग्राहका तो जलमें घर ही था, उसकी स्थिति अनुकूल थी। जब गजेन्द्र प्राणके संकटमें पड़ गया और विवश हो गया, अपनेको छुड़ानेमें असमर्थ हो गया, तब चिरकालतक ध्यान करके उसने निश्चय किया कि यह मेरे जातीय हाथी मुझ आतुरको बचा नहीं सकते तो फिर मेरी हथिनियाँ मुझे बचा ही कैसे सकती हैं? यह ग्राह नहीं, विधाताका पाश है, उसमें मैं ग्रस्त हो रहा हूँ, उसी परमेश्वरकी शरण जाऊँ, जो ब्रह्मादि सभी प्राणियोंके एकमात्र आश्रय हैं। जो भगवान् प्रचण्ड वेगवाले बलवान् कालसर्पसे भयभीत प्राणीकी रक्षा करते हैं, मौत भी जिनसे डरकर भागती फिरती है, उसी भगवान्की मैं शरण जाता हूँ। श्रीशुकभगवान्ने राजा परीक्षित्से कहा कि ऐसा निश्चयकर और मनको समाहित करके वह गजेन्द्र पिछले जन्मके शिक्षित परम जाप्यका जप करने लगा। गजेन्द्रने कहा— 'मैं उन भगवान्का मनन कर रहा हूँ अर्थात् ध्यानमात्रसे उन्हें नमस्कार कर रहा हूँ। ग्राहसे गृहीत होनेके कारण शरीरसे प्रणाम करना भी मेरे लिये अशक्य है, जिन भगवान्के कारण देहादि जड़ प्रपंच भी चेतन हो रहे हैं। जो पुरुष हैं अर्थात् जिनसे
सम्पूर्ण विश्व पूर्ण हो रहा है। विश्वके कारण होनेसे घटमें मृत्तिकाके समान विश्वमें भगवान् पूर्ण हैं; अतः उन्हींसे सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हो रहा है। कहा जाता है कि जगत्के कारण प्रकृति और पुरुष हैं, अतः कहा कि वह आदिबीजस्वरूप हैं। आदिप्रकृति, बीज-पुरुष अर्थात् जो प्रकृतिपुरुष-स्वरूप हैं, फिर भी वह जीवके समान पराधीन नहीं हैं, किंतु सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर हैं, उन भगवान्का मैं अभिध्यान करता हूँ। जिस अधिष्ठानसे सम्पूर्ण विश्व है, जिस उपादानसे विश्व उत्पन्न होता है, जिस कर्तासे जो पद अपने-आप बन जाता है और जो इस कार्य और कारणसे पर है, उस स्वयम्भू स्वतःसिद्ध परमात्माकी मैं शरण हूँ।' 'जो स्वात्मामें ही अपनी मायासे अर्पित, प्रकाशित और कभी तिरोहित विश्वका साक्षीरूपसे प्रकाशन करते हैं और साथ ही अविलुप्तदृक् हैं और जो आत्ममूल अर्थात् स्वप्रकाश हैं, परप्रकाशकचक्षु आदिसे भी पर हैं अर्थात् चक्षु आदिके भी प्रकाशक हैं— चक्षुषश्चक्षुः, ('ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्त- मसः परमुच्यते।') (गीता १३।१७) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट है कि भगवान् ही विभिन्न प्रकाशक ज्योतियोंके भी प्रकाशक ज्योति हैं। कालके प्रभावसे सम्पूर्ण लोक और लोकपाल जब पंचतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं, तब दुरवग्राह्य, गम्भीर अनन्तपार तम ही रह जाता है, उस तमके पार विराजमान विभु हैं, मैं उन्हींको नमन करता हूँ।' ('आदित्यवर्णस्तमसः परस्तात्')' श्रुति कहती है कि वे भगवान् आदित्यवत् सर्वभासक एवं स्वतःप्रकाश हैं और तमसे परे हैं। देवता और ऋषि भी उनके पदको नहीं जानते, फिर दूसरे साधारण कौन जन्तु उन्हें जान सकते हैं? उनका जानना और कहना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है। जैसे विभिन्न आकृतियोंद्वारा विचेष्टा करते हुए नटके आक्रमणोंका परिज्ञान दुष्कर है, वैसे ही भगवान्के विभिन्न चरित्रों और अनुक्रमणोंका भी जानना और कहना बहुत दुष्कर है। दुर्गम चरित्रवाले वे भगवान् श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जिनके समंगल पदारविन्दके दर्शनकी इच्छासे विमुक्तसंग सुसाधु मुनि सम्पूर्ण भूतोंमें असक्त दृष्टि रखते हुए अव्रण—छिद्रवर्जित और अवलोकव्रत— आश्चर्यव्रतका आचरण करते हैं, वे ही भगवान् मेरी गति हैं। उन भगवान्का जन्म, कर्म, नाम, रूप, गुण, दोष कुछ नहीं होता तथापि लोककी उत्पत्ति, लय एवं पालनके लिये अपनी मायासे वे जन्म, कर्म आदिको स्वीकार करते हैं। अनन्तशक्ति, परेश, परब्रह्म भगवान्को नमस्कार है। जो अरूप हैं, साथ ही बहुस्वरूप हैं, उन आश्चर्यकर्मवाले भगवान्को प्रणाम है। जो प्रकाशान्तरकी अपेक्षा न करके प्रकाशमान हैं, जो सर्वप्रकाशक साक्षी तथा जीवके भी नियन्ता हैं, चित्तवृत्ति एवं वाणीसे भी जो अप्राप्य हैं, जो निपुण पुरुष शुद्ध अन्तःकरणसे संन्यासके द्वारा प्रत्येक स्वरूपसे प्राप्त होनेवाले हैं, जो कैवल्यके दाता हैं, निर्वाणसुख-संवित्स्वरूप हैं, उन प्रभुके लिये प्रणाम है।' 'जो सत्त्वादि गुणधर्मोंका अनुसरण करके शान्त, घोर एवं मूढ़ प्रतीत होते हैं, साम्य, निर्विशेष और ज्ञानघन हैं, जो क्षेत्रज्ञ एवं सर्वाध्यक्ष हैं, साक्षी हैं, आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञोंके भी मूल हैं तथा मूल अर्थात् प्रकृतिके भी प्रकृति अर्थात् मूल हैं; क्योंकि स्वतः पूर्वसिद्ध पुरुष हैं, उन प्रभुको प्रणाम है। जो सर्वेन्द्रियोंके, शब्दादि विषयोंके द्रष्टा हैं और सर्वेन्द्रियवृत्तिरूप प्रत्ययोंके हेतु हैं अथवा चित्प्रतिबिम्बित वृत्तियोंके द्वारा बिम्बस्वरूपसे जो परिलक्षित होते हैं, छायामय असत्स्वरूप अहंकारादि प्रपंचोंसे बोधित किये जाते हैं, जो तद्रूपसे विषयोंमें भासमान होते हैं, उन भगवान्को प्रणाम है। सबके कारणरूप अतएव स्वयं निष्कारण तथा मृदादि विकारविलक्षण अद्भुत
गजेन्द्र-मुक्ति ६५७ कारण हैं, उन भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। जो पंचरात्र आदि समस्त आगम (शास्त्र) और समस्त वेद आदिके समुद्रस्थानीय हैं तथा जो मोक्षरूप एवं सत्पुरुषोंके आश्रय हैं, ज्ञानाग्निरूप, गुणविस्फूर्जक, विधि-निषेधविवर्जित और स्वयंप्रकाश हैं, उन भगवान्को मेरा प्रणाम है।' 'जो अज्ञानपाशका छेदन करनेवाले, सकरुण, निरालस, अन्तर्यामिरूपसे सब जीवोंके मनमें प्रतीत होनेवाले, सबका नियमन करनेमें समर्थ और अपरिच्छिन्न हैं, उन भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। गृह-कुटुम्ब- चिन्तामें आसक्त जनोंके लिये दुष्प्राप्य, गुणोंके संगसे रहित, मुक्तात्माजनोंसे परिभाषित, ज्ञातात्मा, ईश्वर हैं; उन भगवान्को मेरा प्रणाम है।' 'जिनकी आराधना करनेवाले अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं तथा न चाही गयी भी आशिषोंको प्राप्त करते हैं, जो अव्यय (नित्य) शरीर भी देते हैं, वे परम कृपालु मेरा विमोक्षणकर आनन्दमें मग्न होकर अति अद्भुत परममंगल उनके चरितको ही गाते हैं, उन अक्षर ब्रह्म, आध्यात्मिक योगगम्य, अतीन्द्रिय, सूक्ष्म, अनन्त और परिपूर्ण भगवान्की मैं स्तुति करता हूँ।' 'ब्रह्मादि देवता, वेद, चराचर लोक नाम-रूपके विभेदसे जिनके कलामात्रसे बनते हैं, जैसे अग्निकी अर्चि और सूर्यकी किरणें उनसे उठती तथा उन्हींमें लीन हो जाती हैं, वैसे ही जिनसे तथा जिनमें यह गुणोंका प्रवाह, बुद्धि, मन, इन्द्रिय आदि उद्भूत, तिरोभूत होते हैं तथा जो न देव हैं, न असुर; न मर्त्य हैं, न पक्षी,; न स्त्री हैं, न पुरुष, न नपुंसक; न गुण हैं, न कर्म और न सत् हैं, न असत् तथा जो अशेषात्मक हैं, उनकी जय हो।' 'मुझे ग्राहसे शरीर छुड़ाकर जीनेकी इच्छा नहीं है; क्योंकि बाहर-भीतर अविवेकसे व्याप्त इस गजत्वसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो यह चाहता हूँ कि मेरे आत्मप्रकाशका आवरण—अज्ञान मिट जाय, मैं इसीका मोक्ष चाहता हूँ। मैं ऐसा मोक्ष चाहता हूँ, जिसका फिर किसी भी कालमें नाश न हो। मुमुक्षु मैं विश्वरूप, विश्वव्यतिरिक्त, विश्वके स्रष्टा, विश्वके आत्माको केवल प्रणाम करता हूँ। भगवद्धर्मानुष्ठानसे कर्मोंको दग्ध कर देनेवाले योगी जिनको अपने हृदयमें भावित करते हैं, उन योगेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका वेग असह्य है, जिनकी शक्तियाँ असह्य हैं, जो शब्दादिरूपसे प्रतीयमान हैं, प्रपन्नजनोंके पालक हैं, जिनकी शक्ति अनन्त है, कुत्सित इन्द्रियोंवाले दुराचारी जिनके मार्गको नहीं प्राप्त कर सकते, उनको बार-बार मेरा प्रणाम है। जिनकी मायासे उत्पन्न हुए अहंकारसे आवृत हुआ यह जन कुछ भी नहीं जानता, 'उन सदा जाग्रत् माहात्म्यवाले भगवान्की शरणमें मैं प्राप्त हूँ।'- नमो नमस्तुभ्यमसहायवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२८) इस प्रकार गजेन्द्रद्वारा निर्विशेष तत्त्वका उपवर्णन किये जानेपर अपनेमें मूर्तिभेदका अभिमान रखनेवाले देवता जब नहीं आये, तब सर्वात्मा, निखिल देवतामय श्रीहरि आविर्भूत हुए। गजेन्द्रको उस प्रकार पीड़ित देखकर और उसके स्तोत्रको सुनकर वेदमय अपने स्वच्छन्द शीघ्रगामी गरुड़पर विराजमान होकर देवताओंसे स्तुत होते हुए चक्रको धारण किये भगवान् वहाँ शीघ्र पधारे, जहाँ वह गजेन्द्र था। उस समय गजेन्द्र सरोवरमें डूब रहा था, बड़े बली ग्राहने उसे जोरसे पकड़ रखा था, वह बड़ा ही पीड़ित था। चक्रधारी श्रीहरिको आकाशमें गरुड़पर देखकर कमलसहित कर (सूँड़) उछालकर प्रेमपारवश्यसे, बड़ी कठिनाईसे वह बोला- 'नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥' (श्रीमद्भा० ८।३।३२) हे अखिलगुरो! भगवान् नारायण! आपको
४५८ भक्तिसुधा प्रणाम है। उसे दुःखी देखकर श्रीहरि सहसा गरुड़से उतर पड़े और कृपापूर्वक शीघ्रतासे ग्राहसहित गजेन्द्रको सरोवरसे बाहर निकालकर देवताओंके देखते-ही- देखते चक्रसे नक्रका मुख विदारित करके भगवान्ने गजेन्द्रको मुक्त कर दिया- तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ (श्रीमद्भा० ८।३।३३) यह कथा व्यापक रूपसे अध्यात्मभावमें देखी जाती है। कारण (अव्यक्त) चैतन्य क्षीरसमुद्र है, त्रिगुणात्मिका माया त्रिकूटाचल है। तदाश्रित संसारारण्यमें भटकनेवाला जीवात्मा ही गजेन्द्र है। आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अनुगुण वृत्तियाँ तथा विविध सम्बन्धी ही उसके साथी हाथी और हथिनी हैं, महामोहरूप ग्राहसे ग्रस्त जीवात्माको कोई भी सम्बन्धी बचानेमें समर्थ नहीं होते। जब जीवात्माकी अपनी शक्ति बेकार हो जाती है, वह निराधार, निराश्रय होकर डूबनेको होता है, तब उसे प्राकृत सुकृत कर्मोंके सद्विपाकसे भगवान्का स्मरण होता है, सर्वसाधनविहीन विपन्न प्राणीके मानस प्रणाममात्रसे प्रभु सन्तुष्ट हो जाते हैं, अपना सब कुछ भूलकर दौड़ पड़ते हैं। भावुकोंका कहना है कि गजेन्द्र 'हरि'-इन दो अक्षरोंका नाम भी उच्चारण नहीं करने पाया था कि भगवान् आ गये। सुनते हैं कि सत्यभामाने प्रभुसे पूछा कि कहाँ जानेकी जल्दी है, तब भगवान् ने 'हाथी' कहा। परंतु 'हा' सत्यभामाके पास और 'थी' वहाँ ग्राहके मुखमें गजेन्द्रको उबारकर। ऐसे अशरणशरण, अकारणकरुण, करुणावरुणालय भगवान् आर्तत्राण- परायण हैं। वृन्दावनके श्रीगोविन्ददेवजी महाराजके उपासक एक मेरे स्नेहीने कहा था कि श्रीगोविन्दजी महाराजका संकेत है कि इस समयके धार्मिक संकट और विविध अशान्तिमय उपद्रवोंको दूर करनेके लिये गजेन्द्रस्तुतिका पाठ घर-घरमें होना परमावश्यक है और भी वृद्धोंसे सुना जाता है कि इसका आश्रय लेनेसे लोग बड़ी- बड़ी विपत्तियोंसे छुटकारा पा जाते हैं। संकल्प-बल संकल्प, विचार या भावनाका महत्त्व संसारके सभी विद्वानोंको मान्य है। संसारके सभी बलोंसे संकल्पका बल श्रेष्ठ है। वेदादि शास्त्रोंका तो कहना है कि परमात्माके संकल्पसे ही अनन्तकोटिब्रह्माण्ड बनकर तैयार हो जाता है। वैसे तो किसी भी कार्यके मूलमें संकल्प होना आवश्यक है। स्थूल, सूक्ष्म किसी प्रकारके संकल्प, विचार हुए बिना कोई भी कार्य नहीं हो सकता। देह, इन्द्रिय आदि किसीकी भी हलचलमें मनकी हलचल आवश्यक है। अतएव यह भी कहा जा सकता है कि संसारकी सभी गति अथवा उन्नतिका मूल संकल्प ही है, परंतु साधारण स्थानोंमें संकल्पके पश्चात् अन्यान्य सामग्रियों और प्रयत्नोंकी भी अपेक्षा हुआ करती है। जैसे कुलाल (कुम्भकार) घटनिर्माणका विचार करता है। तत्पश्चात् मृत्तिका, दण्ड, चक्र, चीवरादि सामग्रियोंका संचय करता है, फिर हस्त आदि व्यापारसे घटको बनाता है। परंतु परमात्मा किसी भी सामग्रीकी अपेक्षा न करके ही अपने संकल्पमात्रसे विश्वका उत्पादन, पालन और संहार करता है।
संकल्प-बल ६५९ परमात्मा ही जगत्के उपादान और निमित्त कारण वेदान्तके सिद्धान्तानुसार यह जगत् जड़ परमाणुओंके एकत्रित हो जानेमात्रसे नहीं बना, साथ ही विद्युत्कणों या प्रकृतिकी हलचलसे भी नहीं बना, अपितु अनिर्वचनीय, मायाशक्तिविशिष्ट वस्तुतः सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदशून्य परमात्मासे ही यह संसार बना है, वे ही इसके उपादान हैं, वे ही निमित्त भी हैं। नैयायिक, वैशेषिक, योगी आदिकोंके मतानुसार भी विश्वप्रपंच जड़का कार्य नहीं हो सकता। इसका निर्माता कोई सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् चेतन ही हो सकता है। जब संसारके कोई भी प्राचीन विलक्षण कार्य एवं आधुनिक रेल, तार, मोटर, वायुयानादि विविध कल- पुर्जे बिना किसी बुद्धिमान् चेतनके अपने-आप नहीं बन जाते; परमाणुओं, विद्युत्कणों या प्रकृतिसे इनका निर्माण बतलानेवाला अश्रद्धेय समझा जाता है, तब विलक्षण संसार और तदन्तर्गत विभिन्न यन्त्रोंके आविष्कारक वैज्ञानिकोंके मन, बुद्धि (मस्तिष्क, दिमाग) आदिकोंके बनानेवालेको जड़ कैसे कहा जाय ? जब साधारण-से चित्र (ड्राइंग) भी परमाणुओंके एकत्रित हो जानेमात्रसे नहीं बनते तो विश्व कैसे बन सकता है ? भेद यही है कि इन मतोंमें परमाणु, प्रकृति आदिका नियामक परमेश्वर माना जाता है; परमाणु, प्रकृति समवायिकारण या उपादान माने जाते हैं, परमात्मा निमित्तकारण माना जाता है, परंतु वेदान्त- सिद्धान्तमें परमात्मा ही उपादान और निमित्त दोनों ही तरहका कारण है। वह अपने संकल्पसे अपने- आपको ही प्रपंचरूपमें प्रकट करता है। योगी आदि भी परमात्माके संकल्पसे सृष्टि मानते हैं, परंतु वहाँ उपादान विद्यमान है, परमेश्वरके संकल्पसे ही वे-वे उपादान उन-उन कार्योंके रूपमें परिणत होते हैं। कुम्भकारके समान परमेश्वरको हस्तादि व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती है। विशिष्टशक्तिसम्पन्न योगियोंके भी संकल्पमात्रसे प्रकृति और प्राकृतप्रपंचमें उथल-पुथल मच जाती है। किसी वस्तुका प्रकृतिमें विलयन और किसीको प्रकृतिसे साहाय्य (आपूर) प्राप्त होता है। वाचस्पतिमिश्रने कहा है कि— निश्श्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ ( भामती १।२) ‘भगवान्के स्वाभाविक सहज निःश्वाससे अनन्त विद्याओंके उद्गम-स्थान वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, उनके अवलोकन (निहारने)-से ही ब्रह्माण्डोंके उपादानभूत पंचमहाभूत—आकाश, वायु, तेज आदिकी उत्पत्ति होती है और भगवान्के मन्द हास (मुसकराहट)- से ही अनन्तकोटिब्रह्माण्ड बनकर तैयार हो जाता है। उनके सोनेसे—आँख मीच लेनेसे ही विश्वका प्रलय हो जाता है।' यहाँ भी रूपकके द्वारा परमात्माके संकल्पसे ही साक्षात् एवं परम्परासे विश्वकी उत्पत्त्यादिका वर्णन किया गया है। यहाँ पूर्व-पूर्व कार्योंमें बुद्धि एवं प्रयत्नकी निरपेक्षता उत्तरोत्तर कार्योंमें कुछ सापेक्षता कही गयी है। संकल्पका प्राधान्य सारांश यह है कि भगवान् अपने संकल्पसे ही सब संसारको बनाते हैं। भगवान्का ही अंश जीवात्मा है और भगवान्की मायाका ही अंश जीवका मन है। अतः भगवान् और मायाकी शक्ति उसी तरह जीवात्मा और मनमें रहती है, जैसे महाकाशकी अवकाश- प्रदत्वशक्ति घटाकाशमें रहती है। जलकी शीतलता, मधुरता उसके अंश तरंगमें हुआ करती है; अग्निका दहन-प्रकाशन-सामर्थ्य उसके अंश स्फुलिंग (चिनगारी)-में रहा करता है। इस दृष्टिसे भगवान्की सभी शक्तियाँ जीवात्मामें होती हैं। मायाकी शक्तियाँ मनमें रहती हैं। इसीलिये शास्त्रोंने कहा है कि जीवात्मा अपने संकल्पों—विचारोंसे बहुत कुछ कार्य कर सकता है। हाँ, अत्याचार, अनाचार, पापाचार,
व्यभिचार आदिकोंसे संकल्पकी शक्ति कमजोर हो जाती है। सदाचार, सद्विचार, सद्धर्म, तपस्या आदिसे संकल्पकी शक्तियाँ दृढ़ (जोरदार) हो जाती हैं। परमेश्वरकी आराधनासे जीवात्मामें स्वाभाविक परमात्मसम्बन्धी ऐश्वर्य प्रकट होते हैं, अन्यथा छिपे रहते हैं। सिद्ध, योगीन्द्र-मुनीन्द्र अपने संकल्पसे ही घटको पट और पटको घट बना सकते हैं। लौकिक महर्षियोंका वचन अर्थानुसारी हुआ करता है, अर्थात् जैसा अर्थ होता है, उनका वैसा ही वचन होता है, परंतु सिद्ध प्राचीन महर्षियोंके वचनोंका अनुसरण तो अर्थको ही करना पड़ता है, अर्थात् वे अर्थको जैसा कहते हैं, अर्थको वैसा ही बनना पड़ता है। इसीलिये विश्वामित्रके संकल्पसे मेनका अप्सराको संकल्पानुसार बनना पड़ा, अगस्त्यके वचनसे नहुषको अजगर बनना पड़ा था। संकल्पसे ही विश्वामित्रने बहुत-से नक्षत्रों और वस्तुओंको बनाया था। वचनके साथ भी संकल्प रहता है। अतएव वचनके प्रभावके साथ संकल्पका प्रभाव रहता है। सुना जाता है, अमेरिका आदिमें बहुत-से मनोविज्ञानके अभ्यासी संकल्प या विचारसे ही गुलाबके फूलोंको घटाने या बढ़ानेमें सफल हो जाते हैं। एलोपैथिक, होमियोपैथिक आदि चिकित्साओंसे निराश रोगियोंको मनोविज्ञानकी महिमासे लाभान्वित करते हैं। एक मनोविज्ञानके पण्डितने जीवनसे निराश किसी लड़कीको कई दिवसतक बर्फके भीतर रखकर मनोविज्ञानके बलसे आराम पहुँचाया था। इसी तरह मनोविज्ञानद्वारा ही बहुत-से रोगोंमें आराम हो रहा है। वैसे प्रत्येकके मनमें भी संकल्पकी प्रधानता रहती है। कारण, सभी काम पहले मन या बुद्धिके साहाय्यकी अपेक्षा रखते हैं, पश्चात् किसी अन्यकी सफलतामें बुद्धि या सूझका बड़ा हाथ रहता है। अच्छी सूझसे ही व्यापारमें लाभ होता है। संग्राम जीतनेमें भी मन्त्रियों, सेनापतियोंकी उत्तम सूझ ही लाभदायक होती है। कितने स्थलोंमें नीतिनिर्धारणकी ही बुद्धिमानी या गलतीसे व्यक्ति या समाज ही नहीं, अपितु राष्ट्र-का-राष्ट्र उन्नत या अवनत हो सकता है। विचारकी गलतीसे ही कहीं-कहीं बड़े-बड़े विजयी लोग एकदम पतनके गर्तमें चले जाते हैं। विचारकी ही अच्छाईसे कितने पथभ्रष्ट व्यक्तियोंका अतर्कित कायापलट देखा जाता है। इसीलिये मानना पड़ता है कि स्थूल जगत् किसी सूक्ष्म जगत्के ही नियन्त्रणमें रहता है। ऊपरसे देखनेमें स्थूल जगत् ही सब कुछ है, परंतु जब देखते हैं कि चींटी, चिड़िया, ऊँट, हाथी आदिकोंके छोटे-बड़े शरीर सूक्ष्म विचारपर ही उठते, चलते, फिरते, बैठते हैं; तब यह कहनेमें कोई भी संकोच नहीं रह जाता कि ब्रह्मादि-स्तम्बपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जो भी हलचलें हैं और उन हलचलोंसे जो भी कार्य सम्पन्न होते हैं, सब सूक्ष्म विचार, मन या बुद्धिके ही कार्य हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदिकोंकी भी हलचलका कारण सूक्ष्म विचार ही हो सकता है। वह विचार अपनेसे भी सूक्ष्म चेतनाभास या अखण्ड बोधकी अपेक्षा रखता है। इसीलिये कहा जाता है कि अचेतनकी प्रवृत्ति तभी होती है, जब वह चेतनसे अधिष्ठित होता है। जैसे अश्व, सारथी आदिसे अधिष्ठित होनेपर ही रथ चलता है अन्यथा नहीं, वैसे ही विचार या चेतनासे अधिष्ठित होनेपर ही सम्पूर्ण जड़ जगत् चल होता है। इसी न्यायसे यह कहा जाता है कि दृश्य जगत्का नियन्त्रण अदृश्य जगत्से होता है। इसी तरह आधिदैविक जगत्से आधिभौतिक जगत्का नियन्त्रण समझना चाहिये। विशेषकर जीवोंका उत्थान-पतन बहुत कुछ विचारोंपर ही अवलम्बित है। शास्त्र कहते हैं कि पुरुष क्रतुमय है। अतएव— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।५)