भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 777

सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६७ वह समझ लेगा कि विनश्वर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार तथा ये सभी दृश्य मेरे हैं और मैं इनसे पृथक् तथा इनका द्रष्टा हूँ और मैं उसी निर्विकार, दृक्- स्वरूप स्वात्माका ही सदा अस्तित्व चाहता हूँ। विवेचन करनेसे यह भी विदित होता है कि स्वप्रकाश दृक्का अस्तित्व 'तत्' स्वरूप ही है। इसीलिये आत्मा स्वप्रकाश कहा जाता है। जगत्की अनेकानेक वस्तुओंमें चाहे जितना भी सन्देह हो, परंतु 'मैं हूँ या नहीं' ऐसा आत्मविषयक सन्देह किसीको भी नहीं होता। जगत्, परमेश्वर, धर्म, कर्म सभीका अभाव सिद्ध करनेवाले शून्यवादीको भी अनिच्छया स्वात्माका अस्तित्व मानना ही पड़ता है। कारण, जो सबके अभावका सिद्ध करनेवाला है, यदि वह रह गया, तब तो स्वातिरिक्त ही सबका अभाव सिद्ध होगा, अपना अभाव नहीं सिद्ध हो सकता। सर्वनिराकर्ता, सर्वनिषेधकी अवधि एवं साक्षीभूतके अस्वीकार करनेपर शून्य भी अप्रामाणिक होगा। अतः वही अत्यन्त अबाधित, सर्वबाधका अधिष्ठान एवं साक्षीभूत अस्तित्व या सत्ता भगवान्‌का 'सत्' रूप है। साथ ही बोध और प्रकाशके लिये प्राणिमात्रमें उत्सुकता दिखायी देती है। पशु-पक्षी भी स्पर्शसे, आघ्राणसे, किसी तरह ज्ञानके प्रेमी हैं। यह ज्ञानकी वांछा उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। हमें अब अमुक तत्त्वका ज्ञान हो, अब अमुकका हो, इतिहास, भूगोल, खगोल, अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव सभी तत्त्वोंको जाननेको मन चाहता है। किं बहुना, बिना सर्वज्ञताके, ज्ञानमें सन्तोष नहीं होता। पूर्ण सर्वज्ञता कहाँ हो सकती है, यह विवेचन करनेसे स्पष्ट हो जाता है कि सर्व पदार्थ जिस स्वप्रकाश, अखण्ड, विशुद्ध भान (बोध)-में कल्पित हैं, वही सर्वावभासक एवं सर्वज्ञ हो सकता है; क्योंकि प्रकाश या भान अत्यन्त असंग एवं निरवयव और अनन्त है। उसका दृश्यके साथ सिवा आध्यासिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध बन ही नहीं सकता। अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक, सर्वाधिष्ठान, विशुद्ध, अखण्ड बोध होनेकी ही वांछा है। यह अखण्ड बोध ही भगवान्‌का 'चित्' रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निज रूप है, वैसे ही यह अबाध्य, अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। संसारमें पशु, कीट, पतंग कोई भी ऐसा नहीं है, जो आनन्दके लिये व्यग्र न रहता हो। प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी भी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती। एक उन्मत्त भी चाहे भ्रम या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाओंको करता है। समस्त वस्तुओंमें भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे सन्देह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है? इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द बहुत प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही 'आनन्द' होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री, पुत्र आदिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही उनसे द्वेष हो जाता है। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी भी, किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह सभी आनन्दको चाहते हैं और उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील तथा लालायित रहते हैं। परंतु उसे पहचाननेकी कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्र, शब्द- स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है, परंतु विवेचनसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं, किंतु सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जगत्के सम्भोग-साधन पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णाप्रशमनके अनन्तर जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास