भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानकर निर्गुणका सर्वथा अपलाप ही करते हैं। अर्थात् सगुणको ही प्राकृत गुणगणराहित्यके अभिप्रायसे निर्गुण भी कहते हैं। द्वैती लोग आदित्यतत्त्वके समान सगुण भगवान्को मानकर आतपके समान निर्गुणतत्त्वको मानते हैं। अद्वैतियोंका कहना है कि गुणादिकी आवश्यकता स्वाश्रयमें सौख्यातिशय या महत्त्वातिशय सम्पादनके लिये ही हो सकती है। परमतत्त्व अनन्त पद, समभिव्याहृत ब्रह्म 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' (बृहदारण्यक० ४।३।३२) इत्यादि श्रुतिसे निरतिशय आनन्दस्वरूप स्वतःसिद्ध है। अतः गुणकृत अतिशयता-राहित्य तथा निर्गुणत्व श्रुतिके अनुरोधसे स्वतः निर्गुणतत्त्वमें ही गुण स्वतः अपने गुणत्व- सिद्ध्यर्थ भगवत्तत्त्वका समाश्रयण करते हैं। इस वास्ते भगवान् स्वरूपसे निर्गुण होते हुए भी सगुण कहे जा सकते हैं। मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्। सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ (श्रीमद्भा० ११।१३।४०) आदित्यस्थानीय सगुणतत्त्वरूप देशमें आतपस्थानीय निर्गुण तत्त्व देशमें यदि अविद्यमान है, तब तो परिच्छिन्नता अनिवार्य है। यदि निरतिशय रूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है, तब नामान्तरसे निर्गुण परमतत्त्व ही हुआ; क्योंकि अतिशयताकी कल्पना जहाँ जाकर स्थगित हो जाती है, वहीं निरतिशय प्रज्ञानानन्दघन परमतत्त्व कहलाता है। नाममें कोई विवाद नहीं। यदि शून्यवादी या विज्ञानवादी इसी तत्त्वको शून्य या विज्ञानतत्त्व शब्दसे कहते हों तो अद्वैतियोंका नाममात्रमें कोई विवाद नहीं। यदि 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः' (छान्दोग्य० २।१) 'असदद्वा इदमग्र आसीत्' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुति तथा दार्शनिकोंसे प्रसिद्ध क्षणिक विज्ञान संतति या तत्क्षयरूप अत्यन्तासत् विज्ञान या शून्य मानते हों तो उक्त परम- तत्त्वसे महान् भेद सुस्पष्ट सिद्ध है। अतः उक्त प्रकारसे परमतत्त्व स्वरूपसे निर्गुण और निरपेक्ष होते हुए भी सगुण तथा साकार है। जैसे प्राची दिक् चन्द्राभिव्यक्तिमें, वायु तरंगाभिव्यक्तिमें निमित्तमात्र है, वैसे ही अचिन्त्यानिर्वाच्य परम विशुद्ध शक्ति भी भगवान्के सगुण स्वरूपके प्रादुर्भावके निमित्तमात्र है। जैसे प्राची या वायु स्वयं चन्द्र या तरंगरूप नहीं है, वैसे ही विशुद्ध शक्तिमात्र सगुण भगवान् नहीं हैं। भगवान् तो स्वतः नित्यशुद्धबुद्ध मुक्तस्वभाव ही हैं। इसी भाँति तत्त्वदर्शी सर्वस्वरूप प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न प्रज्ञानानन्दघन भगवान्में आत्मभावसे प्रतिष्ठित होकर भी व्यावहारिक भेदका समाश्रयणकर अपरिगणित कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् सौन्दर्य-सुधासिन्धुके मुनिमन- मोहक माधुर्यका भी समास्वादन करते हैं। इस तरहसे यद्यपि अकुटिल भावसे श्रुतिस्मृति तदनुकूल तर्कानुमोदितमार्गद्वारा समस्त विरुद्ध धर्म एवं सिद्धान्तोंका साक्षात् या परम्परया सामंजस्य वेदोंके परमतात्पर्य विषयभूत भगवान्में निर्विवाद सिद्ध है तथापि लीलाविशेष अभिनयके लिये वस्तुतः अनन्यपूर्विकाओंमें भी अन्यपूर्विकात्वके लोक-दृष्टि- सिद्ध आरोपवत् अभिप्राय-भेदसे सकल विवादा- स्पदत्व भी लीलामयके स्वरूपानुरूप नहीं है। सबके अभिमत स्वरूपकी वास्तविक भगवद्रूपता वेदान्तके इस अद्वैत सिद्धान्तसे नास्तिकोंतकका विरोध नहीं पड़ता। जो भगवान् भक्तोंके सर्वस्व एवं ज्ञानियोंके एकमात्र परम तत्त्व हैं, वे ही नास्तिकोंसे नास्तिकोंके (नास्तिकशिरोमणियोंके) भी सब कुछ हैं। यह बात असम्भव-सी प्रतीत होती है, परंतु विवेचन करनेसे अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। चाहे कैसा भी नास्तिक क्यों न हो, वह अपने अभावसे घबराता है, वह यही चाहता है कि मैं सदा बना रहूँ। साधारण-से-साधारण प्राणी भी आत्मरक्षाके लिये व्यग्र रहता है। कोई भी अपने अस्तित्वको मिटाना नहीं चाहता। इस तरह नास्तिक भी अपने अस्तित्वका पूर्णानुरागी है। अपने-आप (वास्तव आत्मस्वरूप) कौन है, जिसका अस्तित्व वह चाहता है, इसे वह न जानता हो, यह बात दूसरी है। यदि सौभाग्यवश कभी इस ओर भी उसकी दृष्टि फिर गयी, तब तो