भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुःखादिका सम्बन्ध भी परमेश्वरमें अनिवार्य होगा। 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'मां' का यदि एक ही अर्थ है, तब अभेद सम्बन्धसे शाब्दबोध भी असम्भव है, यदि पृथक् है तो भी उद्देश्य-विधेयमें लक्षण-लक्ष्यकी तरह ज्ञातता-अज्ञातता अपेक्षित है। 'रामं सीतापतिं विद्धि' इत्यादि स्थलोंमें भी ज्ञात रामको उद्देश्यकर अज्ञात सीतापतित्व विधेय है। यहाँ भी दोमें एकको उद्देश्यकर एकको विधेय मानना चाहिये। क्षेत्रज्ञ यदि ईश्वररूपसे प्रसिद्ध है तो उसे ईश्वरत्व-विधान व्यर्थ है, यदि अप्रसिद्ध है तो भी ईश्वरत्व-विधान निष्प्रयोजन है। ईश्वरको क्षेत्रज्ञातृत्व विवक्षित हो तो भी 'एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥' (गीता १३।१) इत्यादि वचनोंसे क्षेत्रज्ञ पृथक् निर्देश व्यर्थ होगा; क्योंकि क्षेत्रज्ञाताको सीधे ईश्वर बतलाया जा सकता था। फिर क्षेत्रज्ञ संज्ञा निर्धारणकर परम्परासे ईश्वरत्व कहना सर्वथा अपार्थक है। सर्वज्ञको क्षेत्रज्ञमात्र कथन प्रतिकूल ही है। क्षेत्रज्ञ शब्दसे यदि परमेश्वर कहा गया, तब जीवका स्वरूप पृथक् दिखलाना चाहिये। भोग्यवर्ग-प्रतिपादनानन्तर भोक्तृवर्गका निरूपण ही संगत होनेसे भोक्तृवर्गका लंघनकर नियन्ताका प्रतिपादन भी असंगत है। इस वास्ते 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध क्षेत्र तथा उसके ज्ञाताको अनुवादकर यथायोग्य बाध सामानाधिकरण्य तथा मुख्य सामानाधिकरण्यसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका परमात्मत्व- विधान ही भगवान्को अभिप्रेत है। अतएव 'पैङ्गी रहस्य' श्रुति भी 'अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञ' इत्यादि वचनोंसे शारीर अर्थात् शरीराभिमानी जीवको ही क्षेत्रज्ञ बतलाती है। यदि शारीर शब्दका अर्थ भी 'शरीरे भवः' इस व्युत्पत्तिसे परमेश्वर मानें तो शरीरमें होनेवाला व्यापक आकाश भी शारीर पदसे कहा जा सकता है, पर यह लोकाप्रसिद्ध है, अतः ठीक नहीं। सारांश यह निकला कि अद्वैत सिद्धान्त सर्वाविरुद्ध एवं भगवान् और उनके भक्तोंको सर्वथा अभिमत है। अतः सोपानारोह-क्रमसे सभी सिद्धान्त उक्त सिद्धान्तके अनुकूल हैं। कोई-कोई महानुभाव यह भी कहते हैं कि उक्त अद्वैत सिद्धान्तमें सगुण भगवान् भी व्यावहारिक या मिथ्या तत्त्व हैं, तब मिथ्यातत्त्वमें अनुरक्ति कैसे सम्भावित हो सकती है ? परंतु विचार करनेसे यह कथन निर्मूल है। जैसे प्राची दिक्-सम्बन्धसे पूर्णचन्द्रका सम्यक् प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही परम विशुद्ध अनिर्वाच्य दिव्य शक्तिके सम्बन्धसे परतत्त्वका दिव्य मंगलमय विग्रहरूपमें प्रादुर्भाव होता है। भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता व्यावहारिक कहनेका भी अर्थ अलीक या रज्जु-सर्पके समान नहीं हो सकता, जैसे पार्थिवत्व अंशमें बराबर होते हुए भी हीरकादिमें महद् वैषम्य है एवं व्यावहारिकत्व अंशमें बराबर होते हुए भी विष और अमृतमें महान् भेद है, वैसे ही जगदुपादानभूता माया शक्ति तथा भगवान्के मंगलमय विग्रहरूपमें विकासकी निमित्तभूत विशुद्ध शक्तिमें महान् प्रभेद है। जैसे मेघादि अस्वच्छ पदार्थके सम्बन्धसे यद्यपि सूर्य- स्वरूप समावृत है, परंतु विशुद्ध काँचादिके योगसे सूर्यस्वरूप समावृत न होकर प्रत्युत अधिक विशुद्ध रूपमें प्रकट होता है; ठीक वैसे ही अचिन्त्य विशुद्ध शक्तिके योगसे परतत्त्वका स्वरूप समावृत भी नहीं होता। प्रत्युत आत्माराम मुनीन्द्रोंके भी चित्तको आकर्षण करनेवाले दिव्य स्वरूपमें प्रकट होते हैं। इतना भेद अवश्य है कि अद्वैतसिद्धान्ती जहाँ एक ओर भगवान्को अचिन्त्यानन्त समस्त कल्याण- गुणगणास्पद मानते हैं वहाँ दूसरी ओर 'निर्गुणं, निष्क्रियं, शान्तम्' (अध्यात्मोपनिषत् ६२, श्वेताश्वत- रोपनिषत् ६।१९) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत्ता- भेदसे निर्गुण, निष्क्रिय, निष्कल भी मानते हैं। स्वरूपतः निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता अन्यान्य सिद्धान्ती केवल सगुणतत्त्वको ही