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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

दुःखादिका सम्बन्ध भी परमेश्वरमें अनिवार्य होगा। 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'मां' का यदि एक ही अर्थ है, तब अभेद सम्बन्धसे शाब्दबोध भी असम्भव है, यदि पृथक् है तो भी उद्देश्य-विधेयमें लक्षण-लक्ष्यकी तरह ज्ञातता-अज्ञातता अपेक्षित है। 'रामं सीतापतिं विद्धि' इत्यादि स्थलोंमें भी ज्ञात रामको उद्देश्यकर अज्ञात सीतापतित्व विधेय है। यहाँ भी दोमें एकको उद्देश्यकर एकको विधेय मानना चाहिये। क्षेत्रज्ञ यदि ईश्वररूपसे प्रसिद्ध है तो उसे ईश्वरत्व-विधान व्यर्थ है, यदि अप्रसिद्ध है तो भी ईश्वरत्व-विधान निष्प्रयोजन है। ईश्वरको क्षेत्रज्ञातृत्व विवक्षित हो तो भी 'एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥' (गीता १३।१) इत्यादि वचनोंसे क्षेत्रज्ञ पृथक् निर्देश व्यर्थ होगा; क्योंकि क्षेत्रज्ञाताको सीधे ईश्वर बतलाया जा सकता था। फिर क्षेत्रज्ञ संज्ञा निर्धारणकर परम्परासे ईश्वरत्व कहना सर्वथा अपार्थक है। सर्वज्ञको क्षेत्रज्ञमात्र कथन प्रतिकूल ही है। क्षेत्रज्ञ शब्दसे यदि परमेश्वर कहा गया, तब जीवका स्वरूप पृथक् दिखलाना चाहिये। भोग्यवर्ग-प्रतिपादनानन्तर भोक्तृवर्गका निरूपण ही संगत होनेसे भोक्तृवर्गका लंघनकर नियन्ताका प्रतिपादन भी असंगत है। इस वास्ते 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध क्षेत्र तथा उसके ज्ञाताको अनुवादकर यथायोग्य बाध सामानाधिकरण्य तथा मुख्य सामानाधिकरण्यसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका परमात्मत्व- विधान ही भगवान्‌को अभिप्रेत है। अतएव 'पैङ्गी रहस्य' श्रुति भी 'अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञ' इत्यादि वचनोंसे शारीर अर्थात् शरीराभिमानी जीवको ही क्षेत्रज्ञ बतलाती है। यदि शारीर शब्दका अर्थ भी 'शरीरे भवः' इस व्युत्पत्तिसे परमेश्वर मानें तो शरीरमें होनेवाला व्यापक आकाश भी शारीर पदसे कहा जा सकता है, पर यह लोकाप्रसिद्ध है, अतः ठीक नहीं। सारांश यह निकला कि अद्वैत सिद्धान्त सर्वाविरुद्ध एवं भगवान् और उनके भक्तोंको सर्वथा अभिमत है। अतः सोपानारोह-क्रमसे सभी सिद्धान्त उक्त सिद्धान्तके अनुकूल हैं। कोई-कोई महानुभाव यह भी कहते हैं कि उक्त अद्वैत सिद्धान्तमें सगुण भगवान् भी व्यावहारिक या मिथ्या तत्त्व हैं, तब मिथ्यातत्त्वमें अनुरक्ति कैसे सम्भावित हो सकती है ? परंतु विचार करनेसे यह कथन निर्मूल है। जैसे प्राची दिक्-सम्बन्धसे पूर्णचन्द्रका सम्यक् प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही परम विशुद्ध अनिर्वाच्य दिव्य शक्तिके सम्बन्धसे परतत्त्वका दिव्य मंगलमय विग्रहरूपमें प्रादुर्भाव होता है। भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता व्यावहारिक कहनेका भी अर्थ अलीक या रज्जु-सर्पके समान नहीं हो सकता, जैसे पार्थिवत्व अंशमें बराबर होते हुए भी हीरकादिमें महद् वैषम्य है एवं व्यावहारिकत्व अंशमें बराबर होते हुए भी विष और अमृतमें महान् भेद है, वैसे ही जगदुपादानभूता माया शक्ति तथा भगवान्‌के मंगलमय विग्रहरूपमें विकासकी निमित्तभूत विशुद्ध शक्तिमें महान् प्रभेद है। जैसे मेघादि अस्वच्छ पदार्थके सम्बन्धसे यद्यपि सूर्य- स्वरूप समावृत है, परंतु विशुद्ध काँचादिके योगसे सूर्यस्वरूप समावृत न होकर प्रत्युत अधिक विशुद्ध रूपमें प्रकट होता है; ठीक वैसे ही अचिन्त्य विशुद्ध शक्तिके योगसे परतत्त्वका स्वरूप समावृत भी नहीं होता। प्रत्युत आत्माराम मुनीन्द्रोंके भी चित्तको आकर्षण करनेवाले दिव्य स्वरूपमें प्रकट होते हैं। इतना भेद अवश्य है कि अद्वैतसिद्धान्ती जहाँ एक ओर भगवान्‌को अचिन्त्यानन्त समस्त कल्याण- गुणगणास्पद मानते हैं वहाँ दूसरी ओर 'निर्गुणं, निष्क्रियं, शान्तम्' (अध्यात्मोपनिषत् ६२, श्वेताश्वत- रोपनिषत् ६।१९) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत्ता- भेदसे निर्गुण, निष्क्रिय, निष्कल भी मानते हैं। स्वरूपतः निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता अन्यान्य सिद्धान्ती केवल सगुणतत्त्वको ही

मानकर निर्गुणका सर्वथा अपलाप ही करते हैं। अर्थात् सगुणको ही प्राकृत गुणगणराहित्यके अभिप्रायसे निर्गुण भी कहते हैं। द्वैती लोग आदित्यतत्त्वके समान सगुण भगवान्‌को मानकर आतपके समान निर्गुणतत्त्वको मानते हैं। अद्वैतियोंका कहना है कि गुणादिकी आवश्यकता स्वाश्रयमें सौख्यातिशय या महत्त्वातिशय सम्पादनके लिये ही हो सकती है। परमतत्त्व अनन्त पद, समभिव्याहृत ब्रह्म 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' (बृहदारण्यक० ४।३।३२) इत्यादि श्रुतिसे निरतिशय आनन्दस्वरूप स्वतःसिद्ध है। अतः गुणकृत अतिशयता-राहित्य तथा निर्गुणत्व श्रुतिके अनुरोधसे स्वतः निर्गुणतत्त्वमें ही गुण स्वतः अपने गुणत्व- सिद्ध्यर्थ भगवत्तत्त्वका समाश्रयण करते हैं। इस वास्ते भगवान् स्वरूपसे निर्गुण होते हुए भी सगुण कहे जा सकते हैं। मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्। सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ (श्रीमद्भा० ११।१३।४०) आदित्यस्थानीय सगुणतत्त्वरूप देशमें आतपस्थानीय निर्गुण तत्त्व देशमें यदि अविद्यमान है, तब तो परिच्छिन्नता अनिवार्य है। यदि निरतिशय रूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है, तब नामान्तरसे निर्गुण परमतत्त्व ही हुआ; क्योंकि अतिशयताकी कल्पना जहाँ जाकर स्थगित हो जाती है, वहीं निरतिशय प्रज्ञानानन्दघन परमतत्त्व कहलाता है। नाममें कोई विवाद नहीं। यदि शून्यवादी या विज्ञानवादी इसी तत्त्वको शून्य या विज्ञानतत्त्व शब्दसे कहते हों तो अद्वैतियोंका नाममात्रमें कोई विवाद नहीं। यदि 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः' (छान्दोग्य० २।१) 'असदद्वा इदमग्र आसीत्' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुति तथा दार्शनिकोंसे प्रसिद्ध क्षणिक विज्ञान संतति या तत्क्षयरूप अत्यन्तासत् विज्ञान या शून्य मानते हों तो उक्त परम- तत्त्वसे महान् भेद सुस्पष्ट सिद्ध है। अतः उक्त प्रकारसे परमतत्त्व स्वरूपसे निर्गुण और निरपेक्ष होते हुए भी सगुण तथा साकार है। जैसे प्राची दिक् चन्द्राभिव्यक्तिमें, वायु तरंगाभिव्यक्तिमें निमित्तमात्र है, वैसे ही अचिन्त्यानिर्वाच्य परम विशुद्ध शक्ति भी भगवान्‌के सगुण स्वरूपके प्रादुर्भावके निमित्तमात्र है। जैसे प्राची या वायु स्वयं चन्द्र या तरंगरूप नहीं है, वैसे ही विशुद्ध शक्तिमात्र सगुण भगवान् नहीं हैं। भगवान् तो स्वतः नित्यशुद्धबुद्ध मुक्तस्वभाव ही हैं। इसी भाँति तत्त्वदर्शी सर्वस्वरूप प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न प्रज्ञानानन्दघन भगवान्‌में आत्मभावसे प्रतिष्ठित होकर भी व्यावहारिक भेदका समाश्रयणकर अपरिगणित कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् सौन्दर्य-सुधासिन्धुके मुनिमन- मोहक माधुर्यका भी समास्वादन करते हैं। इस तरहसे यद्यपि अकुटिल भावसे श्रुतिस्मृति तदनुकूल तर्कानुमोदितमार्गद्वारा समस्त विरुद्ध धर्म एवं सिद्धान्तोंका साक्षात् या परम्परया सामंजस्य वेदोंके परमतात्पर्य विषयभूत भगवान्‌में निर्विवाद सिद्ध है तथापि लीलाविशेष अभिनयके लिये वस्तुतः अनन्यपूर्विकाओंमें भी अन्यपूर्विकात्वके लोक-दृष्टि- सिद्ध आरोपवत् अभिप्राय-भेदसे सकल विवादा- स्पदत्व भी लीलामयके स्वरूपानुरूप नहीं है। सबके अभिमत स्वरूपकी वास्तविक भगवद्रूपता वेदान्तके इस अद्वैत सिद्धान्तसे नास्तिकोंतकका विरोध नहीं पड़ता। जो भगवान् भक्तोंके सर्वस्व एवं ज्ञानियोंके एकमात्र परम तत्त्व हैं, वे ही नास्तिकोंसे नास्तिकोंके (नास्तिकशिरोमणियोंके) भी सब कुछ हैं। यह बात असम्भव-सी प्रतीत होती है, परंतु विवेचन करनेसे अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। चाहे कैसा भी नास्तिक क्यों न हो, वह अपने अभावसे घबराता है, वह यही चाहता है कि मैं सदा बना रहूँ। साधारण-से-साधारण प्राणी भी आत्मरक्षाके लिये व्यग्र रहता है। कोई भी अपने अस्तित्वको मिटाना नहीं चाहता। इस तरह नास्तिक भी अपने अस्तित्वका पूर्णानुरागी है। अपने-आप (वास्तव आत्मस्वरूप) कौन है, जिसका अस्तित्व वह चाहता है, इसे वह न जानता हो, यह बात दूसरी है। यदि सौभाग्यवश कभी इस ओर भी उसकी दृष्टि फिर गयी, तब तो

सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६७ वह समझ लेगा कि विनश्वर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार तथा ये सभी दृश्य मेरे हैं और मैं इनसे पृथक् तथा इनका द्रष्टा हूँ और मैं उसी निर्विकार, दृक्- स्वरूप स्वात्माका ही सदा अस्तित्व चाहता हूँ। विवेचन करनेसे यह भी विदित होता है कि स्वप्रकाश दृक्का अस्तित्व 'तत्' स्वरूप ही है। इसीलिये आत्मा स्वप्रकाश कहा जाता है। जगत्की अनेकानेक वस्तुओंमें चाहे जितना भी सन्देह हो, परंतु 'मैं हूँ या नहीं' ऐसा आत्मविषयक सन्देह किसीको भी नहीं होता। जगत्, परमेश्वर, धर्म, कर्म सभीका अभाव सिद्ध करनेवाले शून्यवादीको भी अनिच्छया स्वात्माका अस्तित्व मानना ही पड़ता है। कारण, जो सबके अभावका सिद्ध करनेवाला है, यदि वह रह गया, तब तो स्वातिरिक्त ही सबका अभाव सिद्ध होगा, अपना अभाव नहीं सिद्ध हो सकता। सर्वनिराकर्ता, सर्वनिषेधकी अवधि एवं साक्षीभूतके अस्वीकार करनेपर शून्य भी अप्रामाणिक होगा। अतः वही अत्यन्त अबाधित, सर्वबाधका अधिष्ठान एवं साक्षीभूत अस्तित्व या सत्ता भगवान्‌का 'सत्' रूप है। साथ ही बोध और प्रकाशके लिये प्राणिमात्रमें उत्सुकता दिखायी देती है। पशु-पक्षी भी स्पर्शसे, आघ्राणसे, किसी तरह ज्ञानके प्रेमी हैं। यह ज्ञानकी वांछा उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। हमें अब अमुक तत्त्वका ज्ञान हो, अब अमुकका हो, इतिहास, भूगोल, खगोल, अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव सभी तत्त्वोंको जाननेको मन चाहता है। किं बहुना, बिना सर्वज्ञताके, ज्ञानमें सन्तोष नहीं होता। पूर्ण सर्वज्ञता कहाँ हो सकती है, यह विवेचन करनेसे स्पष्ट हो जाता है कि सर्व पदार्थ जिस स्वप्रकाश, अखण्ड, विशुद्ध भान (बोध)-में कल्पित हैं, वही सर्वावभासक एवं सर्वज्ञ हो सकता है; क्योंकि प्रकाश या भान अत्यन्त असंग एवं निरवयव और अनन्त है। उसका दृश्यके साथ सिवा आध्यासिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध बन ही नहीं सकता। अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक, सर्वाधिष्ठान, विशुद्ध, अखण्ड बोध होनेकी ही वांछा है। यह अखण्ड बोध ही भगवान्‌का 'चित्' रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निज रूप है, वैसे ही यह अबाध्य, अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। संसारमें पशु, कीट, पतंग कोई भी ऐसा नहीं है, जो आनन्दके लिये व्यग्र न रहता हो। प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी भी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती। एक उन्मत्त भी चाहे भ्रम या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाओंको करता है। समस्त वस्तुओंमें भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे सन्देह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है? इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द बहुत प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही 'आनन्द' होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री, पुत्र आदिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही उनसे द्वेष हो जाता है। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी भी, किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह सभी आनन्दको चाहते हैं और उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील तथा लालायित रहते हैं। परंतु उसे पहचाननेकी कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्र, शब्द- स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है, परंतु विवेचनसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं, किंतु सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जगत्के सम्भोग-साधन पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णाप्रशमनके अनन्तर जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास

७६८ भक्तिसुधा

पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो अन्तरात्मा है, वही 'आनन्द' है। जो लक्षण आनन्दका, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और वही निरतिशय, निरुपाधिक परम प्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'मैं सुखी हूँ' ऐसा अनुभव होता है। इसीके लिये समस्त कार्य-करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है। यह सुख- दुःख-मोहात्मक, नानात्मक, संघातसे विलक्षण सुख- दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही भगवान्‌का 'आनन्द' रूप है। इस तरह सभी 'सच्चिदानन्द' भगवान्‌के उपासक हैं। प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहते हैं। एक चींटी भी पकड़ी जानेपर व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है। शुक, सारिका आदि पक्षी सोनेके पिंजड़ेमें रहकर सुन्दर मधुर भोजनकी अपेक्षा बन्धनमुक्त हो, स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन व्यतीत करनेमें ही सच्चे आनन्दका अनुभव करते हैं। इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित है। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा? परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्‌का ही स्वरूप है। बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्‌को प्राप्त किये बन्धन- मुक्ति और स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निराधार है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध बना है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी? भले ही कोई माता-पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है। कारण, जबतक कुछ स्वतन्त्रता त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूर करके शरीरत्रय-बन्धनसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता ही नहीं। इस विवेचनसे स्पष्ट होता है कि 'स्वतन्त्रता' भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न भगवान्‌का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रकी यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। ये सभी भाव भी जीवभावके रहते नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्‌के ही परतन्त्र हो सकते हैं। इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व— ये सब भगवान्‌में ही होते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, ये वही भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं? क्योंकि प्राणिमात्र किंवा तत्त्वमात्रका अन्तरात्मा भगवान् ही हैं। फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है—'लोके न हि स विद्येत यो न राममनुव्रतः।' लोकमें ऐसा कोई हुआ ही नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निज सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते ही नहीं। विश्वेश्वरयतीन्द्रस्य श्रीगुरोश्चरणाम्बुजयोः । कृतिरेषार्पिता भूयान्मुदे सुमनसां सदा ॥