भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, पुत्रवत्सला जननी प्रिय पुत्रको प्रेमसे हृदयमें लगाकर पुनः-पुनः चिपटानेका प्रयत्न करती है, तब क्या प्रेमको व्यवधानासहिष्णु नहीं कहा जा सकता ? वस्तुतः जहाँ जितनी मात्रामें प्रेम-तत्त्वका आधिक्य है, वहाँ उतनी ही मात्रामें व्यवधान या पार्थक्य असह्य है। इन्हीं अभिप्रायोंसे उत्तरोत्तर आचार्योंने जीव तथा परमेश्वरके असाधारण सम्बन्ध अर्थात् व्यवधानरहित सम्बन्धसिद्धिके लिये विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत इत्यादि अभेदानुगुण पक्ष स्वीकार किये हैं। श्रुति भी 'आत्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) इत्यादि वचनोंसे स्वभिन्न देवादिमें गौण प्रेम तथा व्यवधानशून्य स्वात्मामें ही सर्वातिशायी प्रेमको प्रदर्शितकर प्रेमको व्यवधानासहिष्णुत्व स्वाभाव्य सिद्ध करती है। प्रेमका स्वरूप ही वस्तुतः रसमय है। रसस्वरूप वस्तु परमात्मा ही है। 'रसो वै सः' (तैत्तिरीयोपनिषत् २।७) भावविशेषोंसे द्रुतचित्तपर अभिव्यक्त जो निखिल-रसामृत-सिन्धु भगवत्तत्त्व है, वही प्रेम- पदवाच्य होता है। प्रेम उक्त प्रकारसे स्वाश्रय-विषयमें व्यवधान मिटानेके अनुकूल है। जैसे रश्मिजाल या प्रकाश अपने उद्गमस्थल आदित्यमें ही निरतिशय तथा अव्यभिचारी भावसे रहता है, अन्यत्र सातिशय तथा व्यभिचारी भावसे ही रहता है। ठीक वैसे सर्वान्तरतम प्रत्यगभिन्न परम प्रेमास्पद रसस्वरूप भगवत्तत्त्वसे ही प्रादुर्भूत रसमय प्रेमतत्त्व निरतिशय तथा अव्यभिचारी भावसे अपने उद्गमस्थलमें ही होता है। अन्यत्र सातिशय एवं व्यभिचारी भावसे होता है। जैसे एक ही समुद्रमें समुद्र, तरंग एवं परस्पर सम्बन्ध वस्तुतः अविच्छिन्न होते हुए भी त्रिधा व्यवहृत तथा अनुभूत होते हैं, वैसे ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत निखिल सौख्य जिसके तुषारके समान हैं, उसी अचिन्त्यानन्त सौख्य-सुधासिन्धु परमतत्त्वमें परम विशुद्ध आह्लादिनी शक्तिके सम्बन्धसे प्रेम तथा उसके आश्रय विषयका अद्भुत चमत्कारी अनुपम विकास है। प्रेमतत्त्वके लिये जहाँ स्वाभिवृद्ध्यर्थ स्वाश्रय विषयका विप्रयोग अपेक्षित है, वहाँ उससे भी कहीं अधिक अव्यवधान लक्षण सम्प्रयोग भी अपेक्षित होता है; क्योंकि प्रथम किसी तरह सम्प्रयोग सम्पन्न होनेपर ही विप्रयोग भी रसका अभिव्यंजक होता है। विप्रयोगाग्नि-संतप्त भावुकका सम्प्रयोगामृत बिना जीवन ही असम्भावित है। यह बात दूसरी है कि बहिरंग अल्पदर्शी देशादिकृत व्यवधानराहित्यमें ही तृप्त हो जाते हैं। सूक्ष्मज्ञ तथा अन्तरंग भावुक देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत, समस्त व्यवधानराहित्य बिना नहीं तृप्त होते। स्वात्मसमर्पणसे ही भक्ति और भगवान्की पूर्णता यही बात स्वात्मसमर्पणरूप भक्तिके विषयमें भी समझनी चाहिये। अर्थात् कुछ महानुभाव वित्त, पुत्र, कलत्र, देहादि समर्पणकर स्वरूपका अस्तित्व रखते हुए भी तृप्त हो जाते हैं एवं कुछ महानुभाव अपरिच्छिन्न स्वप्रकाशात्मक परमतत्त्वमें अनेका- नर्थोपप्लुत जीवभावके पृथक् अस्तित्वकी कल्पना स्वप्रकाश सूर्यमें अन्धकारकी कल्पनाके समान अनुचित समझकर स्वस्वरूपको भी भगवान्में सर्वथा समर्पणकर भगवान्की पूर्णताके बाधकका अपनयन करते हैं। इसी वास्ते भगवान् भी अभेदका समर्थन करते हैं—'विभक्तमिव च स्थितम्'। (गीता १३।१६) परमतत्त्व वस्तुतः एक होता हुआ भी सुर, नर, तिर्यगादिरूपसे बहुधा स्थित है। 'विभक्तमिव' इत्यादि स्थलोंमें जो तटस्थ ईश्वरकी विभक्तवत् व्यवस्थिति मानते हैं, उनके यहाँ अप्रसिद्धरूपदोष अनिवार्य है; क्योंकि स्वरूपसे परमेश्वर विभक्तवत् अर्थात् वस्तुतः एक, परंतु पृथक्-पृथक् स्थितके समान होता है। यह अत्यन्त अप्रसिद्ध है। 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' (गीता १३।२) क्षेत्रज्ञ त्वंपदार्थको 'मां विद्धि' परमात्मस्वरूप ही समझना चाहिये। क्षेत्रज्ञ शब्दका जीव ही अर्थ है, परमेश्वर नहीं; क्योंकि जैसे मायाका असाधारण सम्बन्ध परमेश्वरके साथ है, अतः 'मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वेताश्वतर० ४।१०) के अनुसार मायी महेश्वर हैं, वैसे ही क्षेत्रका असाधारण सम्बन्ध जीवसे ही है। अन्यथा क्षेत्र