भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 773

सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६३ प्रकारसे भगवदुपासना नहीं हो सकती, इस वास्ते अद्वैतियोंके साथ विरोध है तो यह भी नहीं; क्योंकि यावत् प्रारब्ध अविद्या लेशकी अनुवृत्ति प्रारब्धरूप प्रतिबन्धकसे अद्वैतवादी भी मानते हैं। अतः जबतक उपाधिका अस्तित्व है, तबतक जीव-परमेश्वरका वास्तविक अभेद होते हुए भी व्यावहारिक भेद अनिवार्य है। जबतक जल विद्यमान है, तबतक जैसे प्रतिबिम्ब-भाव अवश्य है वैसे ही जीवभाव भी अनिवार्य है। जैसे वायुयोगसे समुद्रमें तरंग भाव होता है, वैसे ही उपाधिपर्यन्त अनिर्वाच्य भगवच्छक्तिके योगसे जीवभाव भी अनिवार्य होगा। इसी दृष्टिसे भेदभाव भगवद्भक्तिमें पर्याप्त है। इसी वास्ते श्रीमच्छंकर भगवत्पादने कहा है कि—'सत्यपि भेदापगमे, नाथ! तवाहं न मामकीनस्त्वं, सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः' (षट्पदी ३) हे नाथ! जैसे तरंग यद्यपि समुद्रसे वस्तुतः भिन्न नहीं होता, किन्तु वायुयोगसे अवस्थान्तरापन्न समुद्र ही तरंग कहलाता है तथापि व्यवहारसे समुद्र-तरंगका भेद सिद्ध ही है। उस व्यवहार-सिद्ध भेद दशामें भी समुद्रका तरंग है, ऐसा ही कहा जाता है, तरंगका समुद्र है ऐसा नहीं! ठीक इसी तरह हमारा-आपका यद्यपि वास्तविक भेद नहीं है तथापि मायाकृत व्यवहार-सिद्ध भेद विद्यमान है। ऐसी दशामें भी हे प्रभो! मैं आपका हूँ, आप मेरे नहीं। यदि कहा जाय कि भक्तिके लिये पारमार्थिक भेद ही अपेक्षित है, अभेद-ज्ञान भक्तिका प्रतिबन्धक है तो यह भी उचित नहीं परिलक्षित होता, कारण यह कि प्रथम तो भेद लोकमें अनादिकालसे प्रसिद्ध ही है। लोक-प्रसिद्ध भेदको ही लेकर परमानर्थके हेतु तथा नश्वर भी कामिनी, कांचन आदि विषयोंमें अनिवार्य प्रेम देखा जाता है। यहाँतक कि भावुकोंने— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) —इत्यादि वचनोंसे भगवान्में तादृश प्रेम पानेकी बड़ी उत्कण्ठा प्रकट की है। अतः व्यावहारिक भेदसे प्रेम-सिद्धान्तके निर्वाहमें कोई अनुपपत्ति नहीं। दूसरे यह कि अभेद प्रथमोपस्थित ही नहीं है; क्योंकि अभेदज्ञान तो धर्मानुष्ठानपूर्वक भगवदाराधनादिद्वारा विशुद्ध स्वान्तः- करणको ही श्रवणादिमें बड़े प्रयाससे सिद्ध हो सकता है। फिर वह प्रेममें ही प्रतिबन्धक क्यों हो सकता है? इस वास्ते सिद्ध हुआ कि व्यावहारिक भेद या द्वैतको लेकर भगवत्प्रेम सम्यक् सम्पादन किया जा सकता है। यह प्रथम प्रसिद्ध ही है। प्रतिबन्धक भी उसका कोई उपस्थित नहीं। अतः द्वैतियोंका अद्वैतियोंके साथ भी कोई विरोध नहीं हो सकता। यदि द्वैतियोंका भगवत्प्रेममें परमतात्पर्य न होकर द्वैत या भेद-सिद्धमें ही तात्पर्य हो, तब अवश्य अद्वैतियोंके साथ विरोध अनिवार्य है; क्योंकि अद्वैतियोंका तो परमतात्पर्य या परमपुरुषार्थ निष्प्रपंच ब्रह्म अद्वैत- सिद्धिमें ही है। समान विषयमें विरुद्ध विकल्प अवश्य ही विरोधका प्रयोजक होता है; परंतु यह हो नहीं सकता; क्योंकि द्वैतभेद आबालगोपाल सर्वत्र प्रसिद्ध है। अतः उसके साधनका प्रयास व्यर्थ है। यदि द्वैतसिद्धि ही मोक्ष या परम पुरुषार्थकी हेतु होती तो अनायास ही समस्त प्राणी अबतक विमुक्त हो गये होते। नाना प्रकारके कर्मोपासना- ज्ञानादि साधनोपदेश करनेवाले वेदशास्त्रोंकी आवश्यकता ही नहीं होती। कठिनातिकठिन तप आदिकी भी कोई आवश्यकता न होती! इसीलिये सूरदासप्रभृति अर्वाचीन भक्तशिरोमणि भी निःसार संसारकी सत्यता- असत्यताके झगड़ेमें न पड़कर केवल भव-भयहारी भगवान्के प्रेममें ही निमग्न रहते थे। सर्वविध व्यवधानकी असहिष्णुता भगवत्प्रेमकी प्रगल्भता प्रेमतत्त्वपर भी यदि कुछ गम्भीर दृष्टिसे विचार किया जाय तो वस्तुतः प्रेमतत्त्व व्यवधानासहिष्णु होनेसे अभेदका ही पोषक है। जहाँ भावुकोंको अनुरागतिशयसे प्रियतमके संश्लेषकालमें रोमावलियोंकी भी उद्गति व्यवधायक होनेसे सहृदयहृदयवेद्य अनिर्वाच्य व्यथा पहुँचानेवाली होती