भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

७६२ भक्तिसुधा चरित्र-गानमें ही अपना अमूल्य समय व्यतीत किया, न कि निःसार जगत्की सत्यता-प्रतिपादनमें। मिथ्या कहनेका भी अभिप्राय यही है कि 'त्रिकालाबाध्य' परमार्थ सत्य भगवान्‌की सत्यताके समान इसकी सत्यता नहीं है; किंतु व्यवहारमें आनेवाली केवल व्यावहारिक सत्यता है, न कि गगनकुसुमके समान अत्यन्त असत्। मिथ्या शब्दका यहाँ अपह्नव अर्थ नहीं है, अपि तु अनिर्वचनीयता अर्थ समझना चाहिये, जैसे अविद्या शब्दका विद्या-व्यतिरिक्त कर्म विवक्षित है, न कि विद्याका अभाव। अधर्मसे धर्मविरुद्ध पापादि विवक्षित है, न कि धर्मका अभाव। यद्यपि साधारणतया लोकमें सत्यता एक ही प्रकारकी प्रसिद्ध है तथापि अध्यात्मशास्त्रवेत्ता सूक्ष्म स्तरभेदसे सत्यतामें महान् भेद समझते हैं। उनकी दृष्टिमें किसी वस्तुकी सत्ताके बिना उसकी अपरोक्ष प्रतीति असम्भव है। इसी वास्ते रज्जु-सर्प आदिकी भी प्रतीति तत्काल उत्पन्न अनिर्वाच्य सर्पको विषय करनेवाली होती है; क्योंकि अत्यन्त असत् खपुष्पादिके समान रज्जु-सर्पकी अपरोक्ष प्रतीति तथा भय-कम्पादिकी जनकता नहीं हो सकती, इस वास्ते उसे असत् खपुष्पादिसे विलक्षण, परंतु रज्जुज्ञानसे बाध्य होनेवाला मानना चाहिये; अतः व्यावहारिक घटादिसे भी विलक्षण प्रातिभासिक सत्य कहलाता है एवं आकाशादि जो कि व्यवहारकालमें कभी बाधित न होनेसे रज्जु- सर्पादिसे विलक्षण हैं तथा ब्रह्मसाक्षात्कार होनेसे एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है, तद्व्यतिरिक्तका बाध हो जाता है, अतः त्रिकालाबाध्य परमार्थ सत्यसे भी विलक्षण हैं। व्यवहारकालमें अबाधित आकाशादि व्यावहारिक सत्य कहलाते हैं और जो सदा एकरस परम तत्त्व है, वही परमार्थ सत्य कहलाता है। जैसे द्वैतवादियोंके यहाँ घटकी अनित्यता, आकाशकी नित्यता, रूप-विलक्षणता सत्यताके बराबर होनेपर भी समंजस है, वैसे ही बाध्य तथा बाधककी बाध्यरूपताके कारण दोनोंका मिथ्यात्व बराबर होते हुए भी व्यावहारिक समस्त प्रपंचकी विनिवृत्तिके लिये व्यावहारिक साधनोंकी ही आवश्यकता है। शास्त्रोंमें स्वाभाविक कामकर्म लक्षण मृत्युके अपनयनार्थ ही अविद्यापदवाच्य कर्मोंका विधान भी है—‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा।’ (ईशावास्य० ११) उपाधिपर्यन्त व्यावहारिक भेदके कारण भगवद्भक्तिके लिये अपेक्षित जीवेश्वरभेदकी सम्पन्नता विशुद्धस्वान्तःकरण तत्त्वनिष्ठके लिये ‘योगा- रूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते’ (गीता ६।३) के अनुसार विधिपूर्वक सर्व-कर्म-संन्यास शास्त्रानुसार ही है। कर्मसंन्यासकी शास्त्रसम्मतता द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः। प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ तु सुभाषितः॥ कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते। तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।६, ७) ‘प्रवृत्तिलक्षणा धर्म और निवृत्तिके उद्देश्यसे प्रतिपादित धर्म—ये दो मार्ग हैं, जहाँ वेद प्रतिष्ठित है। कर्मसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; पारदर्शी यति कर्म नहीं करते।' कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ। विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।११) ‘कर्मके फल हैं, सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु, कर्मद्वारा मनुष्य इन्हींको प्राप्त करते हैं; परंतु ज्ञानके द्वारा उन्हें परम पदकी प्राप्ति होती है, जहाँ जानेसे शोकसे मुक्त हो जाता है।' शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।३८) ‘कर्म स्थूल-सूक्ष्म-कारणसंज्ञक त्रिविध शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है, जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष दग्ध हो जाते हैं, तब जीव रसस्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है।' जीव-परमेश्वरका भेद न माननेसे सम्यक्