भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

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सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६१ विषयोंमें अद्वैतियोंका किसीके साथ विरोध नहीं है। तीर्थ, व्रत, मन्दिर, शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, शक्ति आदि प्रतिमार्चन, वर्णाश्रमनुसार श्रौतस्मार्त-कृत्य आदि विषयोंका उनके यहाँ कितना आदर या प्रचार है, इसका पता काश्यादि पुण्यस्थलोंमें ही नहीं, प्रत्युत ग्रामीणोंने भी उनके अनुयायियोंके दर्शनसे ही सुस्पष्ट लग सकता है। भगवान् शंकराचार्यका सिद्धान्त है कि अनादि- कालसे प्रवृत्त यह संसारचक्र बिना परमतत्त्व, परब्रह्मके स्वरूप-साक्षात्कारके कदापि नहीं शान्त हो सकता। भगवत्स्वरूपसाक्षात्कारके लिये वर्णाश्रमनुसार शिष्टाचारप्राप्त सभी लौकिक-वैदिक कृत्य अनुष्ठान- सहित भगवद्भक्ति ही परमावश्यक है। वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम्। पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयता- मात्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम् ॥ (उपदेशपञ्चकम् १) महाभारतके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि पापक्षयके अनन्तर निष्काम कर्मोपासनाके अमोघ प्रभावसे निर्मल-निश्चल तथा रसरूप ज्ञानालोकसे मण्डित चित्तपर आत्मदेवका स्फुट अभिव्यंजन सम्भव है— ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः। यथादर्शतले प्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि॥ (महा० शान्ति० २०४।८) शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ (महा० शान्ति० २७०।३८) भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ (गीता १८।५५) उक्त वचनोंके अनुसार अद्वैत तत्त्व अव्यवहार्य है, अतः व्यावहारिक सत्य नहीं कहा जा सकता। द्वैतप्रपंच ही व्यवहार्य होनेसे व्यावहारिक सत्य कहा जा सकता है। द्वैत-अद्वैत समान सत्तासे विरुद्ध होते हैं; अतः पारमार्थिक व्यावहारिक सत्ता-भेदसे व्यवस्था उचित है। भगवत्पाद शंकराचार्यने स्वयं बदरीनारायण आदि पुण्यस्थलोंमें शतशः शिव और विष्णुकी प्रतिमाएँ स्थापन करके भक्तिका सम्यक् प्रचार किया। सत्ताभेदकी समीचीनता रहा भगवद्व्यतिरिक्त समस्त प्रपंचको मिथ्या बतलाना, सो भगवान् तथा भगवद्भक्त दोनोंको ही अभीष्ट है। भगवान् ही स्वयं कहते हैं, यही बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता है, जो कि मरणशाली मिथ्या शरीरसे मुक्त परम सत्य अमृतको प्राप्त कर लेते हैं। एषा बुद्धिमतां बुद्धीर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।२९।२२) तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्। त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। (रा०च०मा० १।६ श्लोक) जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥ (रा०च०मा० १।११२।२) समस्त शास्त्रोंका परम तात्पर्य केवल भगवत्तत्त्वमें ही है, उसी परमतत्त्वप्राप्तिके लिये अवान्तर तात्पर्य- विषयभूत अन्यान्य विषयोंका निर्देश है। इसी अभिप्रायसे 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। मिथ्या संसार भी पूर्वकथनानुसार बिना सम्यक् धर्मानुष्ठान किये नहीं निवृत्त हो सकता। प्राचीन तथा अर्वाचीन साम्प्रदायिक कलहशून्य वैष्णव ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदास आदि सभी महानुभावोंने वैराग्यादिके लिये संसारके मिथ्यात्वपर बड़ा जोर दिया। देहादिको ही सत्य माननेवाले प्राकृत पुरुषोंसे देहादिपोषणार्थ कितने अनिष्टोंकी सम्भावना है, यह विज्ञोंसे तिरोहित नहीं है। श्रीसूरदास, हरिदास प्रभृति भावुक वृन्दोंने भी प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके