भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 770

७६० भक्तिसुधा या नामका समाश्रयणकर दूसरे स्वरूप या नामका तिरस्कार या निन्दा करनी कितनी बड़ी भूल है। क्या अपने ही एक अंगका तिरस्कार करनेवाले मूर्ख अनन्य भक्तपर भी कोई प्रसन्न हो सकता है ? शिवप्रधान या विष्णुप्रधान पुराणोंमें भी शिव तथा विष्णुके ही मुखसे स्थलान्तरोंमें सम्यक् अभेद या परस्पर उपास्योपासक-भावतक भी सुना जाता है। इसे विष्णुसहस्रनाम शांकर भाष्यमें देखना चाहिये। विस्तार-भयसे वहाँके वचन न देकर वैष्णवकुल- कमल-दिवाकर श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकी ही कुछ उक्ति दी जाती है। आपका कहना है कि— सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के॥ (रा०च०मा० १।२०४।५; १।१५।४) कुछ साम्प्रदायिक महानुभाव श्रीपार्वतीरमण सदाशिवजी तथा श्रीविष्णुजीके प्रणाम आदिमें अपने अनन्य वैष्णवत्व या शैवत्वकी त्रुटि समझते हैं; परंतु विचार करनेसे सुस्पष्ट प्रतीत होता है कि शैव या वैष्णव केवल विष्णु या शिवको प्रणाम करना छोड़ देनेसे अनन्य वैष्णव या शैव नहीं हो सकते; क्योंकि चाहे कोई शिवको प्रणामादि करना छोड़ भी दे, परंतु कामिनी-कांचन-कैंकर्य कैसे छूट सकता है? उसके बिना छूटे तो लोगोंको विधर्मियोंके पीछे-पीछे स्वार्थवश घूमना या नत होना अपरिहार्य ही है, तब अनन्य शैव या अनन्य वैष्णव कैसे हो सकते हैं? वस्तुतः परमेश्वरके आराधनका परम उत्कृष्ट मार्ग स्वस्ववर्णाश्रम-धर्म ही है। जैसा कि शास्त्रोंमें कहा है— 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवाः।' (गीता १८।४६) वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (विष्णुपुराण ३।८।९) अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः। स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ (श्रीमद्भा० १।२।१३) वर्णाश्रमानुसार वैदिक अग्निहोत्रादि कृत्योंमें अग्नि, इन्द्र, वरुण, रुद्र, विष्णु आदि सभी देवताओंका यजन करना पड़ता है। अतः कोई भी वैदिकत्वाभिमानी कैसे कह सकते हैं कि हम अनन्य वैष्णव या शैव हैं, अन्य देवका अर्चन नहीं करेंगे? तस्मात् अनन्यताका अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि देवता, ब्राह्मण, गुरु, माता, पिता आदि गुरुजनोंकी अर्च्चा-पूजा छोड़ देनी चाहिये, अपितु अनन्यताका अर्थ यही है कि देवपितृगुरुब्राह्मणादि सभीका आराधन-पूजन करो, परंतु वह सभी हो भगवदर्थ, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है— 'सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।' (रा०च०मा० २।१२९) इसी प्रकार व्यवस्था भस्मादिके विषयमें समझनी चाहिये। कारण कि रागतः प्राप्त पदार्थकी निन्दा निषेधके लिये होती है। जैसे सुरामांसादि रागतः प्राप्त हैं, अतः उनकी निन्दाका तात्पर्य उनके निषेधमें ही हो सकता है। भस्म, त्रिपुण्ड्रादि रागसे तो प्राप्त हैं नहीं; किन्तु किन्हीं शास्त्रवचनोंसे ही प्राप्त हैं। शास्त्रप्राप्तका अत्यन्तबाध शास्त्रान्तरसे भी नहीं हो सकता; क्योंकि शास्त्रान्तर निरवकाश हो जायगा। षोडशीग्रहण 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस शास्त्रसे ही प्राप्त है। अतः 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस साक्षात् निषेधसे भी अत्यन्तबाध नहीं होता; किंतु विकल्प ग्रहणाग्रहणका ही माना गया है। ठीक इसी तरह शास्त्रप्राप्त भस्मत्रिपुण्ड्रादिका विकल्प या सम्प्रदायभेदसे व्यवस्था है; अर्थात् 'शैवों' तथा 'वैष्णवों' के लिये सम्प्रदायानुसार व्यवस्था एवं श्रौतस्मार्तकर्म-निरत कर्मठोंको प्रातः- सायं भस्म इतरकालमें यथाकाम। यही पद्धति देखनेमें भी आ रही है। लिखा भी है— स्नात्वा पुण्ड्रं मृदा कुर्याद् धृत्वा चैव तु भस्मना। देवान् विप्रान् समभ्यर्च्य चन्दनेन समाचरेत्॥ आहिताग्नि लोग किसी समय भस्मादि और किसी समय चन्दनादि लगाते हैं। इतरोंके लिये यथाकाम ही समझना चाहिये। निषेधका विषय श्मशानादिगत भस्म है, न कि आहवनीयादिगत पवित्र भस्म। अद्वैतवादियोंका इनमें यथारुचि त्रिपुण्ड्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र शिव या विष्णुका सम्यक् आदर है। इस वास्ते इन