भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७५१
विधान पाया जाता है। शास्त्रविहित कृत्यकी अकर्तव्यता 'नहि शास्त्रविहितं किञ्चिदकर्तव्यतामियात्' (ईशा- भाष्य) इत्यादि भगवान् शंकराचार्यकी उक्ति के अनुसार हो नहीं सकती। यदि उनका निन्दामें ही तात्पर्य होता तो 'कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको, देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति' (बृहदारण्यक० १।५।१६) इत्यादि श्रुति-सिद्ध फल अनुपपन्न होगा; क्योंकि कहींपर भी निषिद्ध कृत्यकी शुभफलकता श्रुतिसिद्ध नहीं है। इस वास्ते वैदिकोंने समुच्चयविधानकी स्तुतिके ही लिये एक- एककी निन्दा मानी है। ठीक इसी तरह उक्त निन्दाओंका भी तात्पर्य निन्दामें न होकर स्वोपास्य देवमें दृढ़ताके लिये स्तुतिमें ही है। किंवा जैसे कोई कौतुकी अपनी मुग्धा भार्याको चिढ़ानेके लिये अपने कुत्तेको श्यालके नामसे पुकारकर गाली देता है, न कि श्यालको गाली देता है, परंतु मुग्धा अपने भ्राताको गाली समझकर चिढ़ती है। कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म और कार्यकारणातीत परब्रह्ममें पूर्व-पूर्वकी निन्दा उत्तरोत्तरकी उत्कृष्टताकी स्वस्थ दिशा शिवपुराणादि-प्रतिपाद्य अनन्तकोटिब्रह्माण्डाधीश्वर शिवतत्त्वमें ही दृढ़ निष्ठाके लिये शिवस्वरूपाभिन्न विष्णुपुराणादिप्रतिपाद्य सर्वेश्वर श्रीविष्णुके नामसे ही ब्रह्माण्डान्तर्गत कार्य विष्णुकी निन्दा की गयी है तथा विष्णुपुराणादि-प्रतिपाद्य अनन्तकोटिब्रह्माण्डाधीश्वर श्रीविष्णुतत्त्वके उपासकोंके निष्ठादाढर्यार्थ तदभिन्न ही श्रीशिवके नामसे कार्य ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट रुद्रकी निन्दा की जाती है। कहीं-कहीं तो शिव या विष्णुकी उपासनासे नरक होनातक लिखा पाया जाता है। ऐसे स्थलोंमें भी नरकका अर्थ नरक न होकर कार्यकारणातीत परमतत्त्वप्राप्तिकी अपेक्षासे ब्रह्मलोकादि ही नरक पदसे कहे गये हैं—'तस्य स्थानवरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः' (महा०शान्ति० १९८।११); क्योंकि वेदोंमें भी 'असुर्या नाम ते लोकाः' (ईशावास्य० ३) इत्यादि मन्त्रमें परमात्म-तत्त्वकी अपेक्षा देवताओंको भी असुर बतलाया गया है— चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्यास्य बृहस्पतेः। मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि॥ रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम्। एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः॥ (महा०शान्ति० १९८।५-६) 'तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम—इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा देवोंके जो लोक हैं, वे सब परमात्माके परमात्मस्वरूप परमधामके सामने नरक हैं।' असुरोंके अर्थात् परमात्मव्यतिरिक्त अशोभन प्रपंचमें या असुसंज्ञक प्राणादि अनात्मामें रमण करनेवालोंके अदर्शनात्मक तमसे आवृत्त लोकात्मक फलको 'आत्महन' आत्माके वास्तविक नित्य शुद्ध- बुद्धस्वरूपको न जानकर कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनेक कलंकको उसपर आरोपण करनेवाले अनात्मज्ञ देहत्यागके अनन्तर प्राप्त होते हैं। जैसे यहाँ देवलोकादिकी निन्दामें तात्पर्य नहीं, किंतु आत्मज्ञानार्थ प्रयत्नातिशय करनेके लिये ही है, वैसे शास्त्रोंके गम्भीर अभिप्राय किसीकी निन्दामें न होकर स्वोपास्य निष्ठा या (किसी) बड़े कल्याण- विषयक प्रयत्नमें प्रवृत्तिके लिये समझना चाहिये। अनभिज्ञ लोग मुग्धा भार्याकी तरह दुःखी होकर परस्पर कलह करते हैं। बुद्धिमान् तो अपने स्वप्रकाशात्मक पूर्ण परम प्रेमास्पदको ही सर्वस्वरूप सर्वोपास्य समझकर मुदित होते हैं और रागद्वेषादिरहित भगवान्के किसी एक रूपमें निष्ठा रखते हैं। जैसे किसी मर्मज्ञ भावुककी उक्ति प्रसिद्ध है— श्रीनाथे जानकीनाथे विभेदो नास्ति कञ्चन। तथापि मम सर्वस्वं रामः कमललोचनः॥ तथा— महेश्वरे वा जगतामधीश्वरे जनार्दने वा जगदन्तरात्मनि। न वस्तुभेदप्रतिपत्तिरस्ति मे तथापि भक्तिस्तरुणेन्दुशेखरे॥ इत्यादि। जब एक ही परमतत्त्व भगवान् भक्तानुग्रहार्थ अनेकधा प्रादुर्भूत होते हैं, तब उन्हींके एक स्वरूप