भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७५१
विधान पाया जाता है। शास्त्रविहित कृत्यकी अकर्तव्यता 'नहि शास्त्रविहितं किञ्चिदकर्तव्यतामियात्' (ईशा- भाष्य) इत्यादि भगवान् शंकराचार्यकी उक्ति के अनुसार हो नहीं सकती। यदि उनका निन्दामें ही तात्पर्य होता तो 'कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको, देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति' (बृहदारण्यक० १।५।१६) इत्यादि श्रुति-सिद्ध फल अनुपपन्न होगा; क्योंकि कहींपर भी निषिद्ध कृत्यकी शुभफलकता श्रुतिसिद्ध नहीं है। इस वास्ते वैदिकोंने समुच्चयविधानकी स्तुतिके ही लिये एक- एककी निन्दा मानी है। ठीक इसी तरह उक्त निन्दाओंका भी तात्पर्य निन्दामें न होकर स्वोपास्य देवमें दृढ़ताके लिये स्तुतिमें ही है। किंवा जैसे कोई कौतुकी अपनी मुग्धा भार्याको चिढ़ानेके लिये अपने कुत्तेको श्यालके नामसे पुकारकर गाली देता है, न कि श्यालको गाली देता है, परंतु मुग्धा अपने भ्राताको गाली समझकर चिढ़ती है। कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म और कार्यकारणातीत परब्रह्ममें पूर्व-पूर्वकी निन्दा उत्तरोत्तरकी उत्कृष्टताकी स्वस्थ दिशा शिवपुराणादि-प्रतिपाद्य अनन्तकोटिब्रह्माण्डाधीश्वर शिवतत्त्वमें ही दृढ़ निष्ठाके लिये शिवस्वरूपाभिन्न विष्णुपुराणादिप्रतिपाद्य सर्वेश्वर श्रीविष्णुके नामसे ही ब्रह्माण्डान्तर्गत कार्य विष्णुकी निन्दा की गयी है तथा विष्णुपुराणादि-प्रतिपाद्य अनन्तकोटिब्रह्माण्डाधीश्वर श्रीविष्णुतत्त्वके उपासकोंके निष्ठादाढर्यार्थ तदभिन्न ही श्रीशिवके नामसे कार्य ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट रुद्रकी निन्दा की जाती है। कहीं-कहीं तो शिव या विष्णुकी उपासनासे नरक होनातक लिखा पाया जाता है। ऐसे स्थलोंमें भी नरकका अर्थ नरक न होकर कार्यकारणातीत परमतत्त्वप्राप्तिकी अपेक्षासे ब्रह्मलोकादि ही नरक पदसे कहे गये हैं—'तस्य स्थानवरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः' (महा०शान्ति० १९८।११); क्योंकि वेदोंमें भी 'असुर्या नाम ते लोकाः' (ईशावास्य० ३) इत्यादि मन्त्रमें परमात्म-तत्त्वकी अपेक्षा देवताओंको भी असुर बतलाया गया है— चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्यास्य बृहस्पतेः। मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि॥ रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम्। एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः॥ (महा०शान्ति० १९८।५-६) 'तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम—इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा देवोंके जो लोक हैं, वे सब परमात्माके परमात्मस्वरूप परमधामके सामने नरक हैं।' असुरोंके अर्थात् परमात्मव्यतिरिक्त अशोभन प्रपंचमें या असुसंज्ञक प्राणादि अनात्मामें रमण करनेवालोंके अदर्शनात्मक तमसे आवृत्त लोकात्मक फलको 'आत्महन' आत्माके वास्तविक नित्य शुद्ध- बुद्धस्वरूपको न जानकर कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनेक कलंकको उसपर आरोपण करनेवाले अनात्मज्ञ देहत्यागके अनन्तर प्राप्त होते हैं। जैसे यहाँ देवलोकादिकी निन्दामें तात्पर्य नहीं, किंतु आत्मज्ञानार्थ प्रयत्नातिशय करनेके लिये ही है, वैसे शास्त्रोंके गम्भीर अभिप्राय किसीकी निन्दामें न होकर स्वोपास्य निष्ठा या (किसी) बड़े कल्याण- विषयक प्रयत्नमें प्रवृत्तिके लिये समझना चाहिये। अनभिज्ञ लोग मुग्धा भार्याकी तरह दुःखी होकर परस्पर कलह करते हैं। बुद्धिमान् तो अपने स्वप्रकाशात्मक पूर्ण परम प्रेमास्पदको ही सर्वस्वरूप सर्वोपास्य समझकर मुदित होते हैं और रागद्वेषादिरहित भगवान्के किसी एक रूपमें निष्ठा रखते हैं। जैसे किसी मर्मज्ञ भावुककी उक्ति प्रसिद्ध है— श्रीनाथे जानकीनाथे विभेदो नास्ति कञ्चन। तथापि मम सर्वस्वं रामः कमललोचनः॥ तथा— महेश्वरे वा जगतामधीश्वरे जनार्दने वा जगदन्तरात्मनि। न वस्तुभेदप्रतिपत्तिरस्ति मे तथापि भक्तिस्तरुणेन्दुशेखरे॥ इत्यादि। जब एक ही परमतत्त्व भगवान् भक्तानुग्रहार्थ अनेकधा प्रादुर्भूत होते हैं, तब उन्हींके एक स्वरूप
७६० भक्तिसुधा या नामका समाश्रयणकर दूसरे स्वरूप या नामका तिरस्कार या निन्दा करनी कितनी बड़ी भूल है। क्या अपने ही एक अंगका तिरस्कार करनेवाले मूर्ख अनन्य भक्तपर भी कोई प्रसन्न हो सकता है ? शिवप्रधान या विष्णुप्रधान पुराणोंमें भी शिव तथा विष्णुके ही मुखसे स्थलान्तरोंमें सम्यक् अभेद या परस्पर उपास्योपासक-भावतक भी सुना जाता है। इसे विष्णुसहस्रनाम शांकर भाष्यमें देखना चाहिये। विस्तार-भयसे वहाँके वचन न देकर वैष्णवकुल- कमल-दिवाकर श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकी ही कुछ उक्ति दी जाती है। आपका कहना है कि— सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के॥ (रा०च०मा० १।२०४।५; १।१५।४) कुछ साम्प्रदायिक महानुभाव श्रीपार्वतीरमण सदाशिवजी तथा श्रीविष्णुजीके प्रणाम आदिमें अपने अनन्य वैष्णवत्व या शैवत्वकी त्रुटि समझते हैं; परंतु विचार करनेसे सुस्पष्ट प्रतीत होता है कि शैव या वैष्णव केवल विष्णु या शिवको प्रणाम करना छोड़ देनेसे अनन्य वैष्णव या शैव नहीं हो सकते; क्योंकि चाहे कोई शिवको प्रणामादि करना छोड़ भी दे, परंतु कामिनी-कांचन-कैंकर्य कैसे छूट सकता है? उसके बिना छूटे तो लोगोंको विधर्मियोंके पीछे-पीछे स्वार्थवश घूमना या नत होना अपरिहार्य ही है, तब अनन्य शैव या अनन्य वैष्णव कैसे हो सकते हैं? वस्तुतः परमेश्वरके आराधनका परम उत्कृष्ट मार्ग स्वस्ववर्णाश्रम-धर्म ही है। जैसा कि शास्त्रोंमें कहा है— 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवाः।' (गीता १८।४६) वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (विष्णुपुराण ३।८।९) अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः। स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ (श्रीमद्भा० १।२।१३) वर्णाश्रमानुसार वैदिक अग्निहोत्रादि कृत्योंमें अग्नि, इन्द्र, वरुण, रुद्र, विष्णु आदि सभी देवताओंका यजन करना पड़ता है। अतः कोई भी वैदिकत्वाभिमानी कैसे कह सकते हैं कि हम अनन्य वैष्णव या शैव हैं, अन्य देवका अर्चन नहीं करेंगे? तस्मात् अनन्यताका अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि देवता, ब्राह्मण, गुरु, माता, पिता आदि गुरुजनोंकी अर्च्चा-पूजा छोड़ देनी चाहिये, अपितु अनन्यताका अर्थ यही है कि देवपितृगुरुब्राह्मणादि सभीका आराधन-पूजन करो, परंतु वह सभी हो भगवदर्थ, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है— 'सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।' (रा०च०मा० २।१२९) इसी प्रकार व्यवस्था भस्मादिके विषयमें समझनी चाहिये। कारण कि रागतः प्राप्त पदार्थकी निन्दा निषेधके लिये होती है। जैसे सुरामांसादि रागतः प्राप्त हैं, अतः उनकी निन्दाका तात्पर्य उनके निषेधमें ही हो सकता है। भस्म, त्रिपुण्ड्रादि रागसे तो प्राप्त हैं नहीं; किन्तु किन्हीं शास्त्रवचनोंसे ही प्राप्त हैं। शास्त्रप्राप्तका अत्यन्तबाध शास्त्रान्तरसे भी नहीं हो सकता; क्योंकि शास्त्रान्तर निरवकाश हो जायगा। षोडशीग्रहण 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस शास्त्रसे ही प्राप्त है। अतः 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस साक्षात् निषेधसे भी अत्यन्तबाध नहीं होता; किंतु विकल्प ग्रहणाग्रहणका ही माना गया है। ठीक इसी तरह शास्त्रप्राप्त भस्मत्रिपुण्ड्रादिका विकल्प या सम्प्रदायभेदसे व्यवस्था है; अर्थात् 'शैवों' तथा 'वैष्णवों' के लिये सम्प्रदायानुसार व्यवस्था एवं श्रौतस्मार्तकर्म-निरत कर्मठोंको प्रातः- सायं भस्म इतरकालमें यथाकाम। यही पद्धति देखनेमें भी आ रही है। लिखा भी है— स्नात्वा पुण्ड्रं मृदा कुर्याद् धृत्वा चैव तु भस्मना। देवान् विप्रान् समभ्यर्च्य चन्दनेन समाचरेत्॥ आहिताग्नि लोग किसी समय भस्मादि और किसी समय चन्दनादि लगाते हैं। इतरोंके लिये यथाकाम ही समझना चाहिये। निषेधका विषय श्मशानादिगत भस्म है, न कि आहवनीयादिगत पवित्र भस्म। अद्वैतवादियोंका इनमें यथारुचि त्रिपुण्ड्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र शिव या विष्णुका सम्यक् आदर है। इस वास्ते इन
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सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६१ विषयोंमें अद्वैतियोंका किसीके साथ विरोध नहीं है। तीर्थ, व्रत, मन्दिर, शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, शक्ति आदि प्रतिमार्चन, वर्णाश्रमनुसार श्रौतस्मार्त-कृत्य आदि विषयोंका उनके यहाँ कितना आदर या प्रचार है, इसका पता काश्यादि पुण्यस्थलोंमें ही नहीं, प्रत्युत ग्रामीणोंने भी उनके अनुयायियोंके दर्शनसे ही सुस्पष्ट लग सकता है। भगवान् शंकराचार्यका सिद्धान्त है कि अनादि- कालसे प्रवृत्त यह संसारचक्र बिना परमतत्त्व, परब्रह्मके स्वरूप-साक्षात्कारके कदापि नहीं शान्त हो सकता। भगवत्स्वरूपसाक्षात्कारके लिये वर्णाश्रमनुसार शिष्टाचारप्राप्त सभी लौकिक-वैदिक कृत्य अनुष्ठान- सहित भगवद्भक्ति ही परमावश्यक है। वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम्। पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयता- मात्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम् ॥ (उपदेशपञ्चकम् १) महाभारतके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि पापक्षयके अनन्तर निष्काम कर्मोपासनाके अमोघ प्रभावसे निर्मल-निश्चल तथा रसरूप ज्ञानालोकसे मण्डित चित्तपर आत्मदेवका स्फुट अभिव्यंजन सम्भव है— ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः। यथादर्शतले प्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि॥ (महा० शान्ति० २०४।८) शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ (महा० शान्ति० २७०।३८) भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ (गीता १८।५५) उक्त वचनोंके अनुसार अद्वैत तत्त्व अव्यवहार्य है, अतः व्यावहारिक सत्य नहीं कहा जा सकता। द्वैतप्रपंच ही व्यवहार्य होनेसे व्यावहारिक सत्य कहा जा सकता है। द्वैत-अद्वैत समान सत्तासे विरुद्ध होते हैं; अतः पारमार्थिक व्यावहारिक सत्ता-भेदसे व्यवस्था उचित है। भगवत्पाद शंकराचार्यने स्वयं बदरीनारायण आदि पुण्यस्थलोंमें शतशः शिव और विष्णुकी प्रतिमाएँ स्थापन करके भक्तिका सम्यक् प्रचार किया। सत्ताभेदकी समीचीनता रहा भगवद्व्यतिरिक्त समस्त प्रपंचको मिथ्या बतलाना, सो भगवान् तथा भगवद्भक्त दोनोंको ही अभीष्ट है। भगवान् ही स्वयं कहते हैं, यही बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता है, जो कि मरणशाली मिथ्या शरीरसे मुक्त परम सत्य अमृतको प्राप्त कर लेते हैं। एषा बुद्धिमतां बुद्धीर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।२९।२२) तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्। त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। (रा०च०मा० १।६ श्लोक) जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥ (रा०च०मा० १।११२।२) समस्त शास्त्रोंका परम तात्पर्य केवल भगवत्तत्त्वमें ही है, उसी परमतत्त्वप्राप्तिके लिये अवान्तर तात्पर्य- विषयभूत अन्यान्य विषयोंका निर्देश है। इसी अभिप्रायसे 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। मिथ्या संसार भी पूर्वकथनानुसार बिना सम्यक् धर्मानुष्ठान किये नहीं निवृत्त हो सकता। प्राचीन तथा अर्वाचीन साम्प्रदायिक कलहशून्य वैष्णव ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदास आदि सभी महानुभावोंने वैराग्यादिके लिये संसारके मिथ्यात्वपर बड़ा जोर दिया। देहादिको ही सत्य माननेवाले प्राकृत पुरुषोंसे देहादिपोषणार्थ कितने अनिष्टोंकी सम्भावना है, यह विज्ञोंसे तिरोहित नहीं है। श्रीसूरदास, हरिदास प्रभृति भावुक वृन्दोंने भी प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके
७६२ भक्तिसुधा चरित्र-गानमें ही अपना अमूल्य समय व्यतीत किया, न कि निःसार जगत्की सत्यता-प्रतिपादनमें। मिथ्या कहनेका भी अभिप्राय यही है कि 'त्रिकालाबाध्य' परमार्थ सत्य भगवान्की सत्यताके समान इसकी सत्यता नहीं है; किंतु व्यवहारमें आनेवाली केवल व्यावहारिक सत्यता है, न कि गगनकुसुमके समान अत्यन्त असत्। मिथ्या शब्दका यहाँ अपह्नव अर्थ नहीं है, अपि तु अनिर्वचनीयता अर्थ समझना चाहिये, जैसे अविद्या शब्दका विद्या-व्यतिरिक्त कर्म विवक्षित है, न कि विद्याका अभाव। अधर्मसे धर्मविरुद्ध पापादि विवक्षित है, न कि धर्मका अभाव। यद्यपि साधारणतया लोकमें सत्यता एक ही प्रकारकी प्रसिद्ध है तथापि अध्यात्मशास्त्रवेत्ता सूक्ष्म स्तरभेदसे सत्यतामें महान् भेद समझते हैं। उनकी दृष्टिमें किसी वस्तुकी सत्ताके बिना उसकी अपरोक्ष प्रतीति असम्भव है। इसी वास्ते रज्जु-सर्प आदिकी भी प्रतीति तत्काल उत्पन्न अनिर्वाच्य सर्पको विषय करनेवाली होती है; क्योंकि अत्यन्त असत् खपुष्पादिके समान रज्जु-सर्पकी अपरोक्ष प्रतीति तथा भय-कम्पादिकी जनकता नहीं हो सकती, इस वास्ते उसे असत् खपुष्पादिसे विलक्षण, परंतु रज्जुज्ञानसे बाध्य होनेवाला मानना चाहिये; अतः व्यावहारिक घटादिसे भी विलक्षण प्रातिभासिक सत्य कहलाता है एवं आकाशादि जो कि व्यवहारकालमें कभी बाधित न होनेसे रज्जु- सर्पादिसे विलक्षण हैं तथा ब्रह्मसाक्षात्कार होनेसे एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है, तद्व्यतिरिक्तका बाध हो जाता है, अतः त्रिकालाबाध्य परमार्थ सत्यसे भी विलक्षण हैं। व्यवहारकालमें अबाधित आकाशादि व्यावहारिक सत्य कहलाते हैं और जो सदा एकरस परम तत्त्व है, वही परमार्थ सत्य कहलाता है। जैसे द्वैतवादियोंके यहाँ घटकी अनित्यता, आकाशकी नित्यता, रूप-विलक्षणता सत्यताके बराबर होनेपर भी समंजस है, वैसे ही बाध्य तथा बाधककी बाध्यरूपताके कारण दोनोंका मिथ्यात्व बराबर होते हुए भी व्यावहारिक समस्त प्रपंचकी विनिवृत्तिके लिये व्यावहारिक साधनोंकी ही आवश्यकता है। शास्त्रोंमें स्वाभाविक कामकर्म लक्षण मृत्युके अपनयनार्थ ही अविद्यापदवाच्य कर्मोंका विधान भी है—‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा।’ (ईशावास्य० ११) उपाधिपर्यन्त व्यावहारिक भेदके कारण भगवद्भक्तिके लिये अपेक्षित जीवेश्वरभेदकी सम्पन्नता विशुद्धस्वान्तःकरण तत्त्वनिष्ठके लिये ‘योगा- रूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते’ (गीता ६।३) के अनुसार विधिपूर्वक सर्व-कर्म-संन्यास शास्त्रानुसार ही है। कर्मसंन्यासकी शास्त्रसम्मतता द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः। प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ तु सुभाषितः॥ कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते। तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।६, ७) ‘प्रवृत्तिलक्षणा धर्म और निवृत्तिके उद्देश्यसे प्रतिपादित धर्म—ये दो मार्ग हैं, जहाँ वेद प्रतिष्ठित है। कर्मसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; पारदर्शी यति कर्म नहीं करते।' कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ। विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।११) ‘कर्मके फल हैं, सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु, कर्मद्वारा मनुष्य इन्हींको प्राप्त करते हैं; परंतु ज्ञानके द्वारा उन्हें परम पदकी प्राप्ति होती है, जहाँ जानेसे शोकसे मुक्त हो जाता है।' शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति॥ (महाभारत-शान्तिपर्व २४१।३८) ‘कर्म स्थूल-सूक्ष्म-कारणसंज्ञक त्रिविध शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है, जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष दग्ध हो जाते हैं, तब जीव रसस्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है।' जीव-परमेश्वरका भेद न माननेसे सम्यक्
सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६३ प्रकारसे भगवदुपासना नहीं हो सकती, इस वास्ते अद्वैतियोंके साथ विरोध है तो यह भी नहीं; क्योंकि यावत् प्रारब्ध अविद्या लेशकी अनुवृत्ति प्रारब्धरूप प्रतिबन्धकसे अद्वैतवादी भी मानते हैं। अतः जबतक उपाधिका अस्तित्व है, तबतक जीव-परमेश्वरका वास्तविक अभेद होते हुए भी व्यावहारिक भेद अनिवार्य है। जबतक जल विद्यमान है, तबतक जैसे प्रतिबिम्ब-भाव अवश्य है वैसे ही जीवभाव भी अनिवार्य है। जैसे वायुयोगसे समुद्रमें तरंग भाव होता है, वैसे ही उपाधिपर्यन्त अनिर्वाच्य भगवच्छक्तिके योगसे जीवभाव भी अनिवार्य होगा। इसी दृष्टिसे भेदभाव भगवद्भक्तिमें पर्याप्त है। इसी वास्ते श्रीमच्छंकर भगवत्पादने कहा है कि—'सत्यपि भेदापगमे, नाथ! तवाहं न मामकीनस्त्वं, सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः' (षट्पदी ३) हे नाथ! जैसे तरंग यद्यपि समुद्रसे वस्तुतः भिन्न नहीं होता, किन्तु वायुयोगसे अवस्थान्तरापन्न समुद्र ही तरंग कहलाता है तथापि व्यवहारसे समुद्र-तरंगका भेद सिद्ध ही है। उस व्यवहार-सिद्ध भेद दशामें भी समुद्रका तरंग है, ऐसा ही कहा जाता है, तरंगका समुद्र है ऐसा नहीं! ठीक इसी तरह हमारा-आपका यद्यपि वास्तविक भेद नहीं है तथापि मायाकृत व्यवहार-सिद्ध भेद विद्यमान है। ऐसी दशामें भी हे प्रभो! मैं आपका हूँ, आप मेरे नहीं। यदि कहा जाय कि भक्तिके लिये पारमार्थिक भेद ही अपेक्षित है, अभेद-ज्ञान भक्तिका प्रतिबन्धक है तो यह भी उचित नहीं परिलक्षित होता, कारण यह कि प्रथम तो भेद लोकमें अनादिकालसे प्रसिद्ध ही है। लोक-प्रसिद्ध भेदको ही लेकर परमानर्थके हेतु तथा नश्वर भी कामिनी, कांचन आदि विषयोंमें अनिवार्य प्रेम देखा जाता है। यहाँतक कि भावुकोंने— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) —इत्यादि वचनोंसे भगवान्में तादृश प्रेम पानेकी बड़ी उत्कण्ठा प्रकट की है। अतः व्यावहारिक भेदसे प्रेम-सिद्धान्तके निर्वाहमें कोई अनुपपत्ति नहीं। दूसरे यह कि अभेद प्रथमोपस्थित ही नहीं है; क्योंकि अभेदज्ञान तो धर्मानुष्ठानपूर्वक भगवदाराधनादिद्वारा विशुद्ध स्वान्तः- करणको ही श्रवणादिमें बड़े प्रयाससे सिद्ध हो सकता है। फिर वह प्रेममें ही प्रतिबन्धक क्यों हो सकता है? इस वास्ते सिद्ध हुआ कि व्यावहारिक भेद या द्वैतको लेकर भगवत्प्रेम सम्यक् सम्पादन किया जा सकता है। यह प्रथम प्रसिद्ध ही है। प्रतिबन्धक भी उसका कोई उपस्थित नहीं। अतः द्वैतियोंका अद्वैतियोंके साथ भी कोई विरोध नहीं हो सकता। यदि द्वैतियोंका भगवत्प्रेममें परमतात्पर्य न होकर द्वैत या भेद-सिद्धमें ही तात्पर्य हो, तब अवश्य अद्वैतियोंके साथ विरोध अनिवार्य है; क्योंकि अद्वैतियोंका तो परमतात्पर्य या परमपुरुषार्थ निष्प्रपंच ब्रह्म अद्वैत- सिद्धिमें ही है। समान विषयमें विरुद्ध विकल्प अवश्य ही विरोधका प्रयोजक होता है; परंतु यह हो नहीं सकता; क्योंकि द्वैतभेद आबालगोपाल सर्वत्र प्रसिद्ध है। अतः उसके साधनका प्रयास व्यर्थ है। यदि द्वैतसिद्धि ही मोक्ष या परम पुरुषार्थकी हेतु होती तो अनायास ही समस्त प्राणी अबतक विमुक्त हो गये होते। नाना प्रकारके कर्मोपासना- ज्ञानादि साधनोपदेश करनेवाले वेदशास्त्रोंकी आवश्यकता ही नहीं होती। कठिनातिकठिन तप आदिकी भी कोई आवश्यकता न होती! इसीलिये सूरदासप्रभृति अर्वाचीन भक्तशिरोमणि भी निःसार संसारकी सत्यता- असत्यताके झगड़ेमें न पड़कर केवल भव-भयहारी भगवान्के प्रेममें ही निमग्न रहते थे। सर्वविध व्यवधानकी असहिष्णुता भगवत्प्रेमकी प्रगल्भता प्रेमतत्त्वपर भी यदि कुछ गम्भीर दृष्टिसे विचार किया जाय तो वस्तुतः प्रेमतत्त्व व्यवधानासहिष्णु होनेसे अभेदका ही पोषक है। जहाँ भावुकोंको अनुरागतिशयसे प्रियतमके संश्लेषकालमें रोमावलियोंकी भी उद्गति व्यवधायक होनेसे सहृदयहृदयवेद्य अनिर्वाच्य व्यथा पहुँचानेवाली होती
है, पुत्रवत्सला जननी प्रिय पुत्रको प्रेमसे हृदयमें लगाकर पुनः-पुनः चिपटानेका प्रयत्न करती है, तब क्या प्रेमको व्यवधानासहिष्णु नहीं कहा जा सकता ? वस्तुतः जहाँ जितनी मात्रामें प्रेम-तत्त्वका आधिक्य है, वहाँ उतनी ही मात्रामें व्यवधान या पार्थक्य असह्य है। इन्हीं अभिप्रायोंसे उत्तरोत्तर आचार्योंने जीव तथा परमेश्वरके असाधारण सम्बन्ध अर्थात् व्यवधानरहित सम्बन्धसिद्धिके लिये विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत इत्यादि अभेदानुगुण पक्ष स्वीकार किये हैं। श्रुति भी 'आत्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) इत्यादि वचनोंसे स्वभिन्न देवादिमें गौण प्रेम तथा व्यवधानशून्य स्वात्मामें ही सर्वातिशायी प्रेमको प्रदर्शितकर प्रेमको व्यवधानासहिष्णुत्व स्वाभाव्य सिद्ध करती है। प्रेमका स्वरूप ही वस्तुतः रसमय है। रसस्वरूप वस्तु परमात्मा ही है। 'रसो वै सः' (तैत्तिरीयोपनिषत् २।७) भावविशेषोंसे द्रुतचित्तपर अभिव्यक्त जो निखिल-रसामृत-सिन्धु भगवत्तत्त्व है, वही प्रेम- पदवाच्य होता है। प्रेम उक्त प्रकारसे स्वाश्रय-विषयमें व्यवधान मिटानेके अनुकूल है। जैसे रश्मिजाल या प्रकाश अपने उद्गमस्थल आदित्यमें ही निरतिशय तथा अव्यभिचारी भावसे रहता है, अन्यत्र सातिशय तथा व्यभिचारी भावसे ही रहता है। ठीक वैसे सर्वान्तरतम प्रत्यगभिन्न परम प्रेमास्पद रसस्वरूप भगवत्तत्त्वसे ही प्रादुर्भूत रसमय प्रेमतत्त्व निरतिशय तथा अव्यभिचारी भावसे अपने उद्गमस्थलमें ही होता है। अन्यत्र सातिशय एवं व्यभिचारी भावसे होता है। जैसे एक ही समुद्रमें समुद्र, तरंग एवं परस्पर सम्बन्ध वस्तुतः अविच्छिन्न होते हुए भी त्रिधा व्यवहृत तथा अनुभूत होते हैं, वैसे ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत निखिल सौख्य जिसके तुषारके समान हैं, उसी अचिन्त्यानन्त सौख्य-सुधासिन्धु परमतत्त्वमें परम विशुद्ध आह्लादिनी शक्तिके सम्बन्धसे प्रेम तथा उसके आश्रय विषयका अद्भुत चमत्कारी अनुपम विकास है। प्रेमतत्त्वके लिये जहाँ स्वाभिवृद्ध्यर्थ स्वाश्रय विषयका विप्रयोग अपेक्षित है, वहाँ उससे भी कहीं अधिक अव्यवधान लक्षण सम्प्रयोग भी अपेक्षित होता है; क्योंकि प्रथम किसी तरह सम्प्रयोग सम्पन्न होनेपर ही विप्रयोग भी रसका अभिव्यंजक होता है। विप्रयोगाग्नि-संतप्त भावुकका सम्प्रयोगामृत बिना जीवन ही असम्भावित है। यह बात दूसरी है कि बहिरंग अल्पदर्शी देशादिकृत व्यवधानराहित्यमें ही तृप्त हो जाते हैं। सूक्ष्मज्ञ तथा अन्तरंग भावुक देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत, समस्त व्यवधानराहित्य बिना नहीं तृप्त होते। स्वात्मसमर्पणसे ही भक्ति और भगवान्की पूर्णता यही बात स्वात्मसमर्पणरूप भक्तिके विषयमें भी समझनी चाहिये। अर्थात् कुछ महानुभाव वित्त, पुत्र, कलत्र, देहादि समर्पणकर स्वरूपका अस्तित्व रखते हुए भी तृप्त हो जाते हैं एवं कुछ महानुभाव अपरिच्छिन्न स्वप्रकाशात्मक परमतत्त्वमें अनेका- नर्थोपप्लुत जीवभावके पृथक् अस्तित्वकी कल्पना स्वप्रकाश सूर्यमें अन्धकारकी कल्पनाके समान अनुचित समझकर स्वस्वरूपको भी भगवान्में सर्वथा समर्पणकर भगवान्की पूर्णताके बाधकका अपनयन करते हैं। इसी वास्ते भगवान् भी अभेदका समर्थन करते हैं—'विभक्तमिव च स्थितम्'। (गीता १३।१६) परमतत्त्व वस्तुतः एक होता हुआ भी सुर, नर, तिर्यगादिरूपसे बहुधा स्थित है। 'विभक्तमिव' इत्यादि स्थलोंमें जो तटस्थ ईश्वरकी विभक्तवत् व्यवस्थिति मानते हैं, उनके यहाँ अप्रसिद्धरूपदोष अनिवार्य है; क्योंकि स्वरूपसे परमेश्वर विभक्तवत् अर्थात् वस्तुतः एक, परंतु पृथक्-पृथक् स्थितके समान होता है। यह अत्यन्त अप्रसिद्ध है। 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' (गीता १३।२) क्षेत्रज्ञ त्वंपदार्थको 'मां विद्धि' परमात्मस्वरूप ही समझना चाहिये। क्षेत्रज्ञ शब्दका जीव ही अर्थ है, परमेश्वर नहीं; क्योंकि जैसे मायाका असाधारण सम्बन्ध परमेश्वरके साथ है, अतः 'मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वेताश्वतर० ४।१०) के अनुसार मायी महेश्वर हैं, वैसे ही क्षेत्रका असाधारण सम्बन्ध जीवसे ही है। अन्यथा क्षेत्र
दुःखादिका सम्बन्ध भी परमेश्वरमें अनिवार्य होगा। 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'मां' का यदि एक ही अर्थ है, तब अभेद सम्बन्धसे शाब्दबोध भी असम्भव है, यदि पृथक् है तो भी उद्देश्य-विधेयमें लक्षण-लक्ष्यकी तरह ज्ञातता-अज्ञातता अपेक्षित है। 'रामं सीतापतिं विद्धि' इत्यादि स्थलोंमें भी ज्ञात रामको उद्देश्यकर अज्ञात सीतापतित्व विधेय है। यहाँ भी दोमें एकको उद्देश्यकर एकको विधेय मानना चाहिये। क्षेत्रज्ञ यदि ईश्वररूपसे प्रसिद्ध है तो उसे ईश्वरत्व-विधान व्यर्थ है, यदि अप्रसिद्ध है तो भी ईश्वरत्व-विधान निष्प्रयोजन है। ईश्वरको क्षेत्रज्ञातृत्व विवक्षित हो तो भी 'एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥' (गीता १३।१) इत्यादि वचनोंसे क्षेत्रज्ञ पृथक् निर्देश व्यर्थ होगा; क्योंकि क्षेत्रज्ञाताको सीधे ईश्वर बतलाया जा सकता था। फिर क्षेत्रज्ञ संज्ञा निर्धारणकर परम्परासे ईश्वरत्व कहना सर्वथा अपार्थक है। सर्वज्ञको क्षेत्रज्ञमात्र कथन प्रतिकूल ही है। क्षेत्रज्ञ शब्दसे यदि परमेश्वर कहा गया, तब जीवका स्वरूप पृथक् दिखलाना चाहिये। भोग्यवर्ग-प्रतिपादनानन्तर भोक्तृवर्गका निरूपण ही संगत होनेसे भोक्तृवर्गका लंघनकर नियन्ताका प्रतिपादन भी असंगत है। इस वास्ते 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान्' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध क्षेत्र तथा उसके ज्ञाताको अनुवादकर यथायोग्य बाध सामानाधिकरण्य तथा मुख्य सामानाधिकरण्यसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका परमात्मत्व- विधान ही भगवान्को अभिप्रेत है। अतएव 'पैङ्गी रहस्य' श्रुति भी 'अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञ' इत्यादि वचनोंसे शारीर अर्थात् शरीराभिमानी जीवको ही क्षेत्रज्ञ बतलाती है। यदि शारीर शब्दका अर्थ भी 'शरीरे भवः' इस व्युत्पत्तिसे परमेश्वर मानें तो शरीरमें होनेवाला व्यापक आकाश भी शारीर पदसे कहा जा सकता है, पर यह लोकाप्रसिद्ध है, अतः ठीक नहीं। सारांश यह निकला कि अद्वैत सिद्धान्त सर्वाविरुद्ध एवं भगवान् और उनके भक्तोंको सर्वथा अभिमत है। अतः सोपानारोह-क्रमसे सभी सिद्धान्त उक्त सिद्धान्तके अनुकूल हैं। कोई-कोई महानुभाव यह भी कहते हैं कि उक्त अद्वैत सिद्धान्तमें सगुण भगवान् भी व्यावहारिक या मिथ्या तत्त्व हैं, तब मिथ्यातत्त्वमें अनुरक्ति कैसे सम्भावित हो सकती है ? परंतु विचार करनेसे यह कथन निर्मूल है। जैसे प्राची दिक्-सम्बन्धसे पूर्णचन्द्रका सम्यक् प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही परम विशुद्ध अनिर्वाच्य दिव्य शक्तिके सम्बन्धसे परतत्त्वका दिव्य मंगलमय विग्रहरूपमें प्रादुर्भाव होता है। भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता व्यावहारिक कहनेका भी अर्थ अलीक या रज्जु-सर्पके समान नहीं हो सकता, जैसे पार्थिवत्व अंशमें बराबर होते हुए भी हीरकादिमें महद् वैषम्य है एवं व्यावहारिकत्व अंशमें बराबर होते हुए भी विष और अमृतमें महान् भेद है, वैसे ही जगदुपादानभूता माया शक्ति तथा भगवान्के मंगलमय विग्रहरूपमें विकासकी निमित्तभूत विशुद्ध शक्तिमें महान् प्रभेद है। जैसे मेघादि अस्वच्छ पदार्थके सम्बन्धसे यद्यपि सूर्य- स्वरूप समावृत है, परंतु विशुद्ध काँचादिके योगसे सूर्यस्वरूप समावृत न होकर प्रत्युत अधिक विशुद्ध रूपमें प्रकट होता है; ठीक वैसे ही अचिन्त्य विशुद्ध शक्तिके योगसे परतत्त्वका स्वरूप समावृत भी नहीं होता। प्रत्युत आत्माराम मुनीन्द्रोंके भी चित्तको आकर्षण करनेवाले दिव्य स्वरूपमें प्रकट होते हैं। इतना भेद अवश्य है कि अद्वैतसिद्धान्ती जहाँ एक ओर भगवान्को अचिन्त्यानन्त समस्त कल्याण- गुणगणास्पद मानते हैं वहाँ दूसरी ओर 'निर्गुणं, निष्क्रियं, शान्तम्' (अध्यात्मोपनिषत् ६२, श्वेताश्वत- रोपनिषत् ६।१९) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत्ता- भेदसे निर्गुण, निष्क्रिय, निष्कल भी मानते हैं। स्वरूपतः निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता अन्यान्य सिद्धान्ती केवल सगुणतत्त्वको ही
मानकर निर्गुणका सर्वथा अपलाप ही करते हैं। अर्थात् सगुणको ही प्राकृत गुणगणराहित्यके अभिप्रायसे निर्गुण भी कहते हैं। द्वैती लोग आदित्यतत्त्वके समान सगुण भगवान्को मानकर आतपके समान निर्गुणतत्त्वको मानते हैं। अद्वैतियोंका कहना है कि गुणादिकी आवश्यकता स्वाश्रयमें सौख्यातिशय या महत्त्वातिशय सम्पादनके लिये ही हो सकती है। परमतत्त्व अनन्त पद, समभिव्याहृत ब्रह्म 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' (बृहदारण्यक० ४।३।३२) इत्यादि श्रुतिसे निरतिशय आनन्दस्वरूप स्वतःसिद्ध है। अतः गुणकृत अतिशयता-राहित्य तथा निर्गुणत्व श्रुतिके अनुरोधसे स्वतः निर्गुणतत्त्वमें ही गुण स्वतः अपने गुणत्व- सिद्ध्यर्थ भगवत्तत्त्वका समाश्रयण करते हैं। इस वास्ते भगवान् स्वरूपसे निर्गुण होते हुए भी सगुण कहे जा सकते हैं। मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्। सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ (श्रीमद्भा० ११।१३।४०) आदित्यस्थानीय सगुणतत्त्वरूप देशमें आतपस्थानीय निर्गुण तत्त्व देशमें यदि अविद्यमान है, तब तो परिच्छिन्नता अनिवार्य है। यदि निरतिशय रूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है, तब नामान्तरसे निर्गुण परमतत्त्व ही हुआ; क्योंकि अतिशयताकी कल्पना जहाँ जाकर स्थगित हो जाती है, वहीं निरतिशय प्रज्ञानानन्दघन परमतत्त्व कहलाता है। नाममें कोई विवाद नहीं। यदि शून्यवादी या विज्ञानवादी इसी तत्त्वको शून्य या विज्ञानतत्त्व शब्दसे कहते हों तो अद्वैतियोंका नाममात्रमें कोई विवाद नहीं। यदि 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः' (छान्दोग्य० २।१) 'असदद्वा इदमग्र आसीत्' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुति तथा दार्शनिकोंसे प्रसिद्ध क्षणिक विज्ञान संतति या तत्क्षयरूप अत्यन्तासत् विज्ञान या शून्य मानते हों तो उक्त परम- तत्त्वसे महान् भेद सुस्पष्ट सिद्ध है। अतः उक्त प्रकारसे परमतत्त्व स्वरूपसे निर्गुण और निरपेक्ष होते हुए भी सगुण तथा साकार है। जैसे प्राची दिक् चन्द्राभिव्यक्तिमें, वायु तरंगाभिव्यक्तिमें निमित्तमात्र है, वैसे ही अचिन्त्यानिर्वाच्य परम विशुद्ध शक्ति भी भगवान्के सगुण स्वरूपके प्रादुर्भावके निमित्तमात्र है। जैसे प्राची या वायु स्वयं चन्द्र या तरंगरूप नहीं है, वैसे ही विशुद्ध शक्तिमात्र सगुण भगवान् नहीं हैं। भगवान् तो स्वतः नित्यशुद्धबुद्ध मुक्तस्वभाव ही हैं। इसी भाँति तत्त्वदर्शी सर्वस्वरूप प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न प्रज्ञानानन्दघन भगवान्में आत्मभावसे प्रतिष्ठित होकर भी व्यावहारिक भेदका समाश्रयणकर अपरिगणित कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् सौन्दर्य-सुधासिन्धुके मुनिमन- मोहक माधुर्यका भी समास्वादन करते हैं। इस तरहसे यद्यपि अकुटिल भावसे श्रुतिस्मृति तदनुकूल तर्कानुमोदितमार्गद्वारा समस्त विरुद्ध धर्म एवं सिद्धान्तोंका साक्षात् या परम्परया सामंजस्य वेदोंके परमतात्पर्य विषयभूत भगवान्में निर्विवाद सिद्ध है तथापि लीलाविशेष अभिनयके लिये वस्तुतः अनन्यपूर्विकाओंमें भी अन्यपूर्विकात्वके लोक-दृष्टि- सिद्ध आरोपवत् अभिप्राय-भेदसे सकल विवादा- स्पदत्व भी लीलामयके स्वरूपानुरूप नहीं है। सबके अभिमत स्वरूपकी वास्तविक भगवद्रूपता वेदान्तके इस अद्वैत सिद्धान्तसे नास्तिकोंतकका विरोध नहीं पड़ता। जो भगवान् भक्तोंके सर्वस्व एवं ज्ञानियोंके एकमात्र परम तत्त्व हैं, वे ही नास्तिकोंसे नास्तिकोंके (नास्तिकशिरोमणियोंके) भी सब कुछ हैं। यह बात असम्भव-सी प्रतीत होती है, परंतु विवेचन करनेसे अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। चाहे कैसा भी नास्तिक क्यों न हो, वह अपने अभावसे घबराता है, वह यही चाहता है कि मैं सदा बना रहूँ। साधारण-से-साधारण प्राणी भी आत्मरक्षाके लिये व्यग्र रहता है। कोई भी अपने अस्तित्वको मिटाना नहीं चाहता। इस तरह नास्तिक भी अपने अस्तित्वका पूर्णानुरागी है। अपने-आप (वास्तव आत्मस्वरूप) कौन है, जिसका अस्तित्व वह चाहता है, इसे वह न जानता हो, यह बात दूसरी है। यदि सौभाग्यवश कभी इस ओर भी उसकी दृष्टि फिर गयी, तब तो
सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७६७ वह समझ लेगा कि विनश्वर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार तथा ये सभी दृश्य मेरे हैं और मैं इनसे पृथक् तथा इनका द्रष्टा हूँ और मैं उसी निर्विकार, दृक्- स्वरूप स्वात्माका ही सदा अस्तित्व चाहता हूँ। विवेचन करनेसे यह भी विदित होता है कि स्वप्रकाश दृक्का अस्तित्व 'तत्' स्वरूप ही है। इसीलिये आत्मा स्वप्रकाश कहा जाता है। जगत्की अनेकानेक वस्तुओंमें चाहे जितना भी सन्देह हो, परंतु 'मैं हूँ या नहीं' ऐसा आत्मविषयक सन्देह किसीको भी नहीं होता। जगत्, परमेश्वर, धर्म, कर्म सभीका अभाव सिद्ध करनेवाले शून्यवादीको भी अनिच्छया स्वात्माका अस्तित्व मानना ही पड़ता है। कारण, जो सबके अभावका सिद्ध करनेवाला है, यदि वह रह गया, तब तो स्वातिरिक्त ही सबका अभाव सिद्ध होगा, अपना अभाव नहीं सिद्ध हो सकता। सर्वनिराकर्ता, सर्वनिषेधकी अवधि एवं साक्षीभूतके अस्वीकार करनेपर शून्य भी अप्रामाणिक होगा। अतः वही अत्यन्त अबाधित, सर्वबाधका अधिष्ठान एवं साक्षीभूत अस्तित्व या सत्ता भगवान्का 'सत्' रूप है। साथ ही बोध और प्रकाशके लिये प्राणिमात्रमें उत्सुकता दिखायी देती है। पशु-पक्षी भी स्पर्शसे, आघ्राणसे, किसी तरह ज्ञानके प्रेमी हैं। यह ज्ञानकी वांछा उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। हमें अब अमुक तत्त्वका ज्ञान हो, अब अमुकका हो, इतिहास, भूगोल, खगोल, अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव सभी तत्त्वोंको जाननेको मन चाहता है। किं बहुना, बिना सर्वज्ञताके, ज्ञानमें सन्तोष नहीं होता। पूर्ण सर्वज्ञता कहाँ हो सकती है, यह विवेचन करनेसे स्पष्ट हो जाता है कि सर्व पदार्थ जिस स्वप्रकाश, अखण्ड, विशुद्ध भान (बोध)-में कल्पित हैं, वही सर्वावभासक एवं सर्वज्ञ हो सकता है; क्योंकि प्रकाश या भान अत्यन्त असंग एवं निरवयव और अनन्त है। उसका दृश्यके साथ सिवा आध्यासिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध बन ही नहीं सकता। अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक, सर्वाधिष्ठान, विशुद्ध, अखण्ड बोध होनेकी ही वांछा है। यह अखण्ड बोध ही भगवान्का 'चित्' रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निज रूप है, वैसे ही यह अबाध्य, अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। संसारमें पशु, कीट, पतंग कोई भी ऐसा नहीं है, जो आनन्दके लिये व्यग्र न रहता हो। प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी भी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती। एक उन्मत्त भी चाहे भ्रम या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाओंको करता है। समस्त वस्तुओंमें भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे सन्देह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है? इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द बहुत प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही 'आनन्द' होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री, पुत्र आदिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही उनसे द्वेष हो जाता है। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी भी, किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह सभी आनन्दको चाहते हैं और उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील तथा लालायित रहते हैं। परंतु उसे पहचाननेकी कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्र, शब्द- स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है, परंतु विवेचनसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं, किंतु सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जगत्के सम्भोग-साधन पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णाप्रशमनके अनन्तर जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास
७६८ भक्तिसुधा
पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो अन्तरात्मा है, वही 'आनन्द' है। जो लक्षण आनन्दका, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और वही निरतिशय, निरुपाधिक परम प्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'मैं सुखी हूँ' ऐसा अनुभव होता है। इसीके लिये समस्त कार्य-करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है। यह सुख- दुःख-मोहात्मक, नानात्मक, संघातसे विलक्षण सुख- दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही भगवान्का 'आनन्द' रूप है। इस तरह सभी 'सच्चिदानन्द' भगवान्के उपासक हैं। प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहते हैं। एक चींटी भी पकड़ी जानेपर व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है। शुक, सारिका आदि पक्षी सोनेके पिंजड़ेमें रहकर सुन्दर मधुर भोजनकी अपेक्षा बन्धनमुक्त हो, स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन व्यतीत करनेमें ही सच्चे आनन्दका अनुभव करते हैं। इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित है। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा? परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्का ही स्वरूप है। बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्को प्राप्त किये बन्धन- मुक्ति और स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निराधार है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध बना है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी? भले ही कोई माता-पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है। कारण, जबतक कुछ स्वतन्त्रता त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूर करके शरीरत्रय-बन्धनसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता ही नहीं। इस विवेचनसे स्पष्ट होता है कि 'स्वतन्त्रता' भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न भगवान्का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रकी यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। ये सभी भाव भी जीवभावके रहते नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं। इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व— ये सब भगवान्में ही होते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, ये वही भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं? क्योंकि प्राणिमात्र किंवा तत्त्वमात्रका अन्तरात्मा भगवान् ही हैं। फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है—'लोके न हि स विद्येत यो न राममनुव्रतः।' लोकमें ऐसा कोई हुआ ही नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निज सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते ही नहीं। विश्वेश्वरयतीन्द्रस्य श्रीगुरोश्चरणाम्बुजयोः । कृतिरेषार्पिता भूयान्मुदे सुमनसां सदा ॥