भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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[७] ✿ भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है १७८ ✿ श्रीमद्भागवतमें दस प्रकारसे भगवान्‌का कीर्तन किया गया है १७८ ✿ भागवतमें दशमस्कन्ध सार है और उसका भी सारातिसार है रासपंचाध्यायी १८० ✿ रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है १८१ ✿ श्रीभगवान्‌के अवतारका प्रधान प्रयोजन— अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान करना १८२ ✿ भगवान्‌के सगुण दिव्य मंगलविग्रहमें विशेष आकर्षण है १८४ ✿ भगवान् विधिनिषेधातीत हैं १८८ ✿ भगवान्‌की रासक्रीड़ा कामजयके लिये १९४ ✿ रासलीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारीकी योग्यता १९८ ✿ श्रीवृषभानुनन्दिनीके कलवाक् नामक शुककी कथा २०० ✿ 'भगवान्' शब्दकी व्याख्या २०१ ✿ रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या २०५ ✿ रासलीलाका प्रयोजन २२० ✿ भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है २२९ ✿ नेत्रोंके साफल्यका रहस्य २३० ✿ व्रजांगनाओंके विविध भेद २३३ ✿ रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता २३५ ✿ भक्तोंके तीन भेद २३९ ✿ भगवान्‌की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये २४१ ✿ रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या २५० ✿ रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक अन्य व्याख्या २६१ ✿ दूसरे श्लोककी एक अन्य प्रकारकी व्याख्या २७० ✿ प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त २७१ ✿ विवेककी महिमा २७५ ✿ भगवान्‌का गोपांगनाओंको उपदेश २८० ✿ स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय २८२ ✿ अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है २८३ ✿ कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयके लिये शास्त्रका ही प्रामाण्य है २८४ ✿ शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है २८७ ✿ जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है २९२ ✿ वेदोंकी अपौरुषेयता २९४ ✿ समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं २९५ ✿ प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पद में ही होती है २९६ ✿ परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है २९८ ✿ इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार—सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है ३०० ✿ आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है ३०४ ✿ प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये ३०६ ✿ ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय ३०७ ✿ कर्म और उपासनाका समुच्चय ३०७ ✿ विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति ३११ ✿ चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त ३१२ ✿ लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव ३१४ ✿ इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ ३१५ ✿ प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं ३१८ ✿ इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है ३२० ✿ सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता ३२२ ✿ प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है ३२३ ✿ साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है ३२५ ✿ भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन—भगवत्- सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त ३२७ ✿ भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन ३२८ ✿ व्रजांगनाओंकी उच्चतम स्थिति ३३२ ✿ रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है ३३५ ✿ जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है ३३५