भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६ ] ✿ भगवान्में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभय- विध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा ....... ८२ ✿ भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा ..... ८४ ✿ भगवान्द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्र वेश धारण करना ............................................ ८६ ✿ भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण ................... ९१ ✿ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण ......... ९३ ✿ पीताम्बरधारणका रहस्य ........................... ९३ ✿ भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती-मालाकी शोभा .................................................... ९५ ✿ भगवान्की भूषणमयी शोभा ....................... ९६ ✿ वेणुवादन .............................................. ९६ ✿ रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है ..................................... ९८ ✿ भगवान्के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं... ९९ ✿ प्रथम भगवान्का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्में रमण ........................... १०० ✿ भगवान्का आत्माभिरमण ........................... १०२ ✿ भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें भगवान्का प्राकट्य ................................ १०३ ✿ भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र .... १०५ ✿ शरणागतिका स्वरूप ................................. १०५ ✿ भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्में पारतन्त्र्य ...... १०५ ✿ भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा ........ १०८ ✿ भगवान्के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी ......................... १०९ ✿ वृन्दाके आख्यानका रहस्य ........................ ११३ ✿ वेणुरव-श्रवणका प्रभाव ............................ ११६ ✿ वेणुरवमें भगवान्का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है .................................. ११९ ✿ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं ....................................................... १२१ ✿ इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों .................... १२१ ✿ ध्यान लगानेकी रीति ............................... १२४ ✿ व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव ..... १२६ ✿ आसक्तिकी महिमासे गोपांगनाओंको श्रीकृष्ण- बलरामके मनोहरभावयुक्त दर्शनकी अनुभूति ............................................. १२७ ✿ गोपांगनाओंद्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव .. १३१ ✿ वृन्दावनका सौभाग्य ...................................... १३७ ✿ वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन ............. १४१ ९. चीरहरण ..................................................... १४२ ✿ श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं ..................... १४४ ✿ श्रुतियोंके दो भेद ......................................... १४५ ✿ दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके रूपमें प्रकट हुए ........................................... १४६ ✿ गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके लिये देवी कात्यायनीका आराधन ........... १४६ ✿ यमुनास्नानका माहात्म्य .............................. १४८ ✿ कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता ..... १४९ ✿ भगवान्का व्रजकुमारिकाओंके साथ परिहास .................................................... १५० ✿ प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी याचना ...................................................... १५१ ✿ दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा ...................................................... १५१ ✿ दोषानुसन्धान करनेपर भी गोपांगनाएँ मनमोहन श्रीकृष्णको भूल नहीं पातीं ....................... १५३ ✿ सर्वव्यवधानशून्य निवारण हुए बिना जीवकी कृतकृत्यता नहीं होती ................................. १५५ ✿ सभी जीव भगवान्के परतन्त्र होते हैं ..... १५८ ✿ भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं ............ १५८ ✿ राग, तृष्णा, मोह आदि निन्द्यभाव भी भगवत्सम्बन्धसे अतिमूल्यवान् हो जाते हैं .... १५९ ✿ अद्वैतसे सुन्दर द्वैत ...................................... १६० ✿ श्रीकृष्ण-संस्पृष्ट वस्त्रोंको धारणकर व्रजांगनाएँ रसाक्रान्त हो उठीं ...................................... १६१ ✿ भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है ................................................. १६२ ✿ श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी दूसरेके लिये नहीं....................................... १६५ १०. व्रजभूमि ................................................. १६६ ✿ व्रजभूमिका अद्भुत वैभव ............................ १६६ ✿ नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक रसमयता ................................................. १७० ११. श्रीरासलीलारहस्य ................................. १७१ ✿ श्रीरासपंचाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित्जीका माहात्म्य ................................................... १७१