भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के लक्षण १३
आसक्ति किसके प्रति ? उन्हीं परम प्रभु ईश्वर के प्रति । किसी-अन्य पुरुष (चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो) के प्रति आसक्ति को कभी भक्ति नहीं कह सकते । इसके समर्थन में एक प्राचीन आचार्य को उद्धृत करते हुए अपने श्रीभाष्य में रामानुज कहते हैं, "ब्रह्मा से लेकर एक तृण पर्यन्त संसार के समस्त प्राणी कर्मजनित जन्म-मृत्यु के वश में हैं, अतएव अविद्यायुक्त और परिवर्तनशील होने के कारण वे इस योग्य नहीं कि ध्येय-विषय के रूप में वे साधक के ध्यान में सहायक हों ।" * शाण्डिल्य के 'अनुरक्ति' शब्द की व्याख्या करते हुए भाष्यकार स्वप्नेश्वर कहते हैं, 'उसका अर्थ है--'अनु' यानी पश्चात्, और 'रक्ति' यानी आसक्ति, अर्थात् वह आसक्ति जो भगवान के स्वरूप और उनकी महिमा के ज्ञान के पश्चात् आती है। † अन्यथा स्त्री, पुत्र आदि किसी भी व्यक्ति के प्रति अन्ध आसक्ति को ही हम 'भक्ति' कहने लगें ! अतः हम स्पष्ट देखते हैं कि आध्यात्मिक अनुभूति के निमित्त किए जानेवाले मानसिक प्रयत्नों की परम्परा या क्रम ही भक्ति है, जिसका प्रारम्भ साधारण पूजा-पाठ से होता है और अन्त ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ एवं अनन्य प्रेम में ।
* आब्रह्मस्तंबपर्यन्ताः जगदन्तर्व्यवस्थिताः ।
प्राणिनः कर्मजनितसंसारवशवर्तिनः ॥
यतस्ततो न ते ध्याने ध्यानिनाम् उपकारकाः ।
अविद्यान्तर्गताः सर्वे ते हि संसारगोचराः ॥
† भगवन्महिमादिज्ञानादनु पश्चाज्जायमानत्वादनुरक्तिरित्युक्तम् ।
--शाण्डिल्यसूत्र, स्वप्नेश्वर टीका, १।२