भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ भक्तियोग
.. पतंजलि के 'ईश्वरप्रणिधानाद्वा' सूत्र की व्याख्या करते हुए भोज कहते हैं, "प्रणिधान वह भक्ति है, जिसमें इन्द्रियभोग आदि समस्त फलाकांक्षाओं का त्याग कर सारे कर्म उन परम गुरु परमात्मा को समर्पित कर दिए जाते हैं।" * भगवान व्यास ने भी इसकी व्याख्या करते हुए कहा है, "प्रणिधान वह भक्ति है जिससे उस योगी पर परमेश्वर का अनुग्रह होता है और उसकी सारी आकांक्षाएँ पूर्ण हो जाती हैं।" † शाण्डिल्य के मतानुसार "ईश्वर में परमानुरक्ति ही भक्ति है।" ‡ पर भक्ति की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या तो वह है, जो भक्तराज प्रह्लाद ने दी है—"जैसी तीव्र आसक्ति अविवेकी पुरुषों की इन्द्रिय-विषयों में होती है, (तुम्हारे प्रति) उसी प्रकार की (तीव्र) आसक्ति तुम्हारा स्मरण करते समय कहीं मेरे हृदय से चली न जाय !" § यह
भजताम् प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगम् तम् येन माम् उपयान्ति ते" इति, "प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम् अहम् स च मम प्रियः" इति च। अतः साक्षात्काररूपा स्मृतिः, स्मर्यमाणात्यर्थप्रियत्वेन स्वयम् अपि अत्यर्थप्रिया यस्य, स एव परमात्मना वरणीयः भवति इति तेन एव लभ्यते परमात्मा इति उक्तम् भवति। एवंरूपा ध्रुवा अनुस्मृतिः एव भक्तिशब्देन अभिधीयते।—ब्रह्मसूत्र, रामानुजभाष्य, प्रथम सूत्र का भाष्य।
* प्रणिधानं तत्र भक्तिविशेषविशिष्टम् उपासनम् सर्वक्रियाणाम् अपि तत्र अर्पणम्। विषयसुखादिकं फलम् अनिच्छन् सर्वाः क्रियाः तस्मिन् परमगुरौ अर्पयति।—पातंजल दर्शन, प्रथम अध्याय, समाधिपाद, २३ वें सूत्र की भोजवृत्ति।
† प्रणिधानात् भक्तिविशेषात् आवर्जितः ईश्वरः तम् अनुगृह्णाति अभिध्यानमात्रेण इत्यादि—पातंजल दर्शन, प्रथम अध्याय, समाधिपाद, २३ वां व्यासभाष्य।
‡ 'सा परा अनुरक्तिः ईश्वरे'—शाण्डिल्यसूत्र, १।२
§ या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी।
त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु॥—विष्णुपुराण, १।२०।१९