भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वर का स्वरूप
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रहे, तो उपर्युक्त श्लोक फिर ब्रह्म का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके जगन्नियन्तृत्व-गुण से ही उसका लक्षण प्रतिपादित हुआ है। असाधारण गुणों के द्वारा ही किसी वस्तु की व्याख्या होती है, उसका लक्षण प्रतिपादित होता है। अतः निम्नलिखित शास्त्रवाक्यों में यह प्रतिपादित हुआ है कि परमपुरुष ही जगन्नियमन का कर्ता है, और इन वाक्यों में ऐसी किसी बात का उल्लेख नहीं, जिससे मुक्तात्मा का जगन्नियन्तृत्व स्थापित हो सके। शास्त्रवाक्य ये हैं—'वत्स, आदि में एकमेवाद्वितीय ब्रह्म ही था। उसमें इस विचार का स्फुरण हुआ कि मैं बहु सृजन करूँगा। उसने तेज की सृष्टि की।' 'आदि में केवल ब्रह्म ही था। उसकी उत्क्रान्ति हुई। उससे क्षत्र नामक एक सुन्दर रूप प्रकट हुआ। वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु, ईशान—ये सब देवता क्षत्र हैं।' 'पहले आत्मा ही थी; अन्य कुछ भी क्रियाशील नहीं था। उसे सृष्टि-सृजन का विचार आया और फिर उसने सृष्टि कर डाली।' 'एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा थे, न ईशान, न द्यावा-पृथिवी, नक्षत्र, जल, अग्नि, सोम और न सूर्य। अकेले उन्हें आनन्द न आया। ध्यान के अनन्तर उनके एक कन्या हुई—दश-इन्द्रिय।' 'जो पृथिवी में वास करते हुए भी पृथिवी से अलग हैं,...जो आत्मा में रहते हुए...' इत्यादि।'" ¶ दूसरे सूत्र की व्याख्या करते हुए रामानुज कहते
कि मुक्तस्य ऐश्वर्यम् जगत्सृष्ट्यादि परमं पुरुष असाधारणम् सर्वेश्वरत्वम् अपि, उत तद्रहितम् केवलपरमपुरुषानुभवविषयम् इति संशयः। किम् युक्तम् ? जगदीश्वरत्वम् अपि इति। कुतः ? "निरञ्जनः परमम् साम्यम् उपैति" इति परमपुरुषेण परमसाम्यापत्तिश्रुतेः सत्यसंकल्पत्वश्रुतेः च। न हि परमसाम्य-सत्यसंकल्पत्वे सर्वेश्वरासाधारणजगन्नियमनेन बिना उपपद्यते;
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