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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

DevanagariHindipublished140 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ, भूमिका व प्रस्तावना

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भक्तियोग

स्वामी विवेकानन्द

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भक्तियोग

स्वामी विवेकानन्द

( पंचम संस्करण )

श्रीरामकृष्ण आश्रम,

धन्तोली, नागपुर-१.

प्रकाशक—
स्वामी भास्करेश्वरानन्द,
अध्यक्ष, श्रीरामकृष्ण आश्रम,
धन्तोली, नागपुर-१

अनुवादक—
प्राचार्य डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल,
एम. एससी., पीएच. डी.

श्रीरामकृष्ण-शिवानन्द-स्मृतिग्रन्थमाला

पुष्प १० वाँ

( श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित )

मूल्य रु. १.५० न. पै.

मुद्रक—
बा. गो. ओगले, बी. ए.
नक्षत्र प्रेस, ओगले रोड,
नागपुर-२

वक्तव्य

‘भक्तियोग’ का यह पंचम संस्करण पाठकों के सम्मुख रखते हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। स्वामी विवेकानन्दजी स्वयं भक्ति के महान् आचार्य थे। इस पुस्तक में स्वामीजी ने भक्ति के भिन्न भिन्न प्रकार के साधनों का विवेचन अनेकानेक धर्मग्रन्थों तथा आत्मानुभूति के आधार पर किया है। भक्तियोग के द्वारा मनुष्य किस प्रकार भगवत्प्राप्ति कर सकता है, भक्ति का सच्चा अर्थ क्या है, भगवान का स्वरूप क्या है, पराभक्ति किस प्रकार प्राप्त हो सकती है—आदि सब मौलिक बातें स्वामीजी ने बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत पुस्तक में दर्शायी हैं।

प्राचार्य डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल, एम. एससी., पीएच. डी., के हम बहुत कृतज्ञ हैं, जिन्होंने यह अनुवाद-कार्य सफलतापूर्वक किया है।

हमें विश्वास है कि इस पुस्तक द्वारा पाठकों का विशेष हित होगा।

<br>

नागपुर,
विजयादशमी
१९-१०-१९६१

प्रकाशक

अनुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
१. भक्ति के लक्षण... ... १
२. ईश्वर का स्वरूप... ... १४
३. भक्तियोग का ध्येय—प्रत्यक्षानुभूति...... ... २४
४. गुरु की आवश्यकता... ... २८
५. गुरु और शिष्य के लक्षण... ... ३३
६. अवतार... ... ४२
७. मंत्र... ... ४७
८. प्रतीक तथा प्रतिमा-उपासना... ... ५१
९. इष्टनिष्ठा... ... ५५
१०. भक्ति के साधन... ... ५९

पराभक्ति

११. पराभक्ति—त्याग... ... ६७
१२. भक्त का वैराग्य—प्रेमजन्य... ... ७२
१३. भक्तियोग की स्वाभाविकता और उसका रहस्य... ७८
१४. भक्ति के अवस्था-भेद... ... ८२
१५. सार्वजनीन प्रेम... ... ८५
१६. पराविद्या और पराभक्ति दोनों एक हैं...... ९२
१७. प्रेम—त्रिकोणात्मक... ... ९४
१८. प्रेममय भगवान स्वयं अपना प्रमाण हैं.... १००
१९. दैवी प्रेम की मानवी विवेचना... ... १०४
२०. उपसंहार... ... ११४

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स्वामी विवेकानन्द

भक्तियोग

C-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri/Sarayu Trust. Funding IKS-MoE-Grant

RaiGuru Math, Shivala, Varanasi Collection. Equipment: Heritage Foundation, Jalgaon

प्रार्थना

स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुः विद्यते ईशनाय॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥

"वह विश्व की आत्मा है, अमरणधर्मा और ईश्वररूप से स्थित है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत और इस भुवन का रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत् का शासन करता है; क्योंकि इसका शासन करने के लिए और कोई समर्थ नहीं है।"

"जिसने सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न किया और जिसने उसके लिए वेदों को प्रवृत्त किया, आत्मबुद्धि को प्रकाशित करनेवाले उस देव की मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ।"

श्वेताश्वतर उपनिषद्, ६।१७-१८

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