भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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८२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

धस्य चोदनाजन्यत्वान्न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते । यथाऽक्षार्थसंनिकर्षेणार्थावबोधे,

भामती

नन्वात्मा ज्ञातव्य इत्येतद्विधिपरैर्वेदान्तैस्तदेकवाक्यतयाऽवबोधे प्रवर्त्तयद्भिरेव पुरुषो ब्रह्मावबोध्यत इति समानत्वं धर्मचोदनाभिर्ब्रह्मचोदनानामित्यत आह ॐ न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते ॐ । अयमभि-सन्धिः—न तावद् ब्रह्मसाक्षात्कारे पुरुषो नियोक्तव्यः; तस्य ब्रह्मस्वाभाव्येन नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्युपासनायां, तस्या अपि ज्ञानप्रकर्षे हेतुभावस्यान्वयव्यतिरेकसिद्धतया प्राप्तत्वेनाविधेयत्वात् । नापि शाब्दबोधे, तस्याप्यधीतवेदस्य पुरुषस्य विदितपदतदर्थस्य समधिगतशाब्दन्यायतत्त्वस्याप्रत्यहमुत्पत्तेः । अत्रैव दृष्टान्तमाह ॐ यथाक्षार्था इति ॐ । दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ तद्वद् इति ॐ । अपि चात्मज्ञान-विधिपरेषु वेदान्तेषु नात्मतत्त्वविनिश्चयः शाब्दः स्याद्, नहि तदात्मतत्त्वपरास्ते, किन्तु तज्ज्ञानविधिपराः, यत्पराश्च ते त एव तेषामर्थाः । न च बोधस्य बोधनिष्ठत्वावपेक्षितत्वादन्यपरेभ्योऽपि बोध्यतत्त्वविनिश्चयः, समारोपेणापि तदुपपत्तेः । तस्मान्न बोधविधिपरा वेदान्ता इति सिद्धम् ।

भामती-व्याख्या

शङ्का—"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि विधि परक वेदान्त-वाक्य केवल ब्रह्मावबोध के जनक नहीं, अपितु उसमें प्रवर्तक भी होते हैं, क्योंकि 'तव्य' प्रत्ययरूप विधि से एकवाक्यतापन्न हैं, अतः उन वेदान्त-वाक्यों में प्रवर्तकता का रहना अनिवार्य है। इस प्रकार धर्म-चोदना की समानता ही ब्रह्म-चोदना में पर्यवसित होती है।

समाधान—उक्त आशङ्का का प्रतीकार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न पुरुषोऽ-वबोधे नियुज्यते"। आशय यह है कि यदि वेदान्त-वाक्यों को ब्रह्मावबोध में प्रवर्तक माना जाता है, तब क्या (१) ब्रह्मविषयक प्रत्यक्षात्मक ज्ञान में ? या (२) ब्रह्मोपासना में ? अथवा (३) परोक्षात्मक शाब्दबोध में ? प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि ब्रह्म-साक्षात्कार ब्रह्म-रूप होने के कारण नित्य है, किसी प्रकार की कृति के द्वारा निष्पादनीय नहीं होता। द्वितीय कल्प भी संगत नहीं, क्योंकि किसी वस्तु का निरन्तर दीर्घ समय तक अनुचिन्तन (उपासन) करने से उस विषय का साक्षात्कार सहजतः (अन्वय-व्यतिरेक से) सिद्ध है, अतः 'ब्रह्मो-पासनया ब्रह्मसाक्षात्कारं भावयेत्'—ऐसा विधान निरर्थक है। तृतीय कल्प भी सम्भव नहीं, क्योंकि जिस व्यक्ति को पद पदार्थ का संगति-ग्रहणादि हो गया है, उसे वेदान्त-वाक्यों का श्रवण करते ही ब्रह्म का शाब्द-बोधात्मक ज्ञान विधि के विना वैसे ही सम्पन्न हो जाता है, जैसे इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष के अनन्तर नियमतः अर्थ-ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

दूसरी बात यह भी है कि यदि वेदान्त-वाक्य ज्ञान-विधिपरक माने जाते हैं, तब वेदान्त-वाक्यों के द्वारा आत्मतत्त्व का शाब्दबोधात्मक निश्चय नहीं हो सकेगा, क्योंकि वेदान्त-वाक्य आत्मतत्त्वपरक न होकर ज्ञानविधिपरक माने जाते हैं। उस शब्द का वही मुख्य अर्थ माना जाता है, जो शब्द यत्परक होता है, फलतः इस पक्ष में वेदान्त-वाक्यों से जन्य आत्म-ज्ञानविषयक बोध ही उत्पन्न होगा, आत्मतत्त्वविषयक बोध नहीं। यदि कहा जाय कि आत्म-विषयक बोध की विधि में भी विधेयभूत बोध अपेक्षित है और उक्त बोध अपने विषयीभूत आत्मतत्त्व के बिना सम्भव नहीं, अतः बोधविधिपरक वेदान्तवाक्यों से भी आत्मतत्त्व का निश्चय क्यों न होगा ? तो वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विधेयभूत ज्ञान वास्तविक विषय की अपेक्षा वैसे ही नहीं करता, जैसे "वाचं धेनुमुपासीत" (बृह. उ. ५।८।१) यहाँ पर धेनु-भावना वास्तविक धेनु की अपेक्षा नहीं करती [ जैसा कि आगे चल कर कहा जायगा—"कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः" (ब्र. सू. १।४।१०)। श्रुति भी विस्पष्ट