भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८१
नियुञ्जानैव पुरुषमवबोधयति । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलम्, अवबो-
भामती
विभजते ॐ या हि चोदना धर्मस्य इति ॐ । आज्ञादीनां पुरुषाभिप्रायभेदानामसम्भवादपौरुषेये वेदे चोदनोपदेशः । अत एवोक्तं “तस्य ज्ञानमुपदेशः” इति । सा च साध्ये च पुरुषव्यापारे भावनायां, तद्विषये च यागादौ, स हि भावनाविषयः, तदधीननिरूपणत्वात् प्रयत्नस्य भावनायाः । षिञ् बन्धन इत्यस्य धातोर्विषयपदव्युत्पत्तेः । भावनायास्तद्द्वारेण च यागादेरपेक्षितोपायतामवगमयन्तो तत्रेच्छोपहारमुखेन पुरुषं नियुञ्जानैव यागादिधर्ममवबोधयति नान्यथा । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलं न तु प्रवर्त्तयन्त्यवबोधयति । कुतः, अवबोध्यस्य प्रवृत्तिरहितस्य चोदनाजन्यत्वात् ।
भामती-व्याख्या
पुरुषमवबोधयति, ब्रह्मचोदना पुरुषमवबोधयत्येव केवलम् ।” प्रवर्त्तक वाक्य को चोदना कहते हैं, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं- "चोदनेति क्रियायाः प्रवर्त्तकं वचनमाहुः" (शाबर. पृ. १२) । लोक में वैसे वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-(१) आज्ञा, (२) प्रार्थना और (३) अनुज्ञा [जैसे—'गां नय' यह वाक्य जब बड़े पद का कोई व्यक्ति अपने से छोटे पदवाले को कहता है, तब इस वाक्य को आज्ञा वाक्य कहा जाता है, जब उसके विपरीत छोटी पदवी का व्यक्ति अपने से बड़ी पदवीवाले को कहता है, तब उस वाक्य को प्रार्थना वाक्य कहते हैं और उक्त दोनों विधाओं से भिन्न जब किसी कार्य का अनुमोदन या समर्थन मात्र किया जाता है, तब वह वाक्य अनुज्ञा वाक्य माना जाता है ] । पौरुषेय वाक्यों में ही आज्ञादि सम्भावित हैं, वेद में नहीं, अतः वेद में 'चोदना' शब्द का 'उपदेश' अर्थ माना जाता है । इष्ट-साधनता के प्रदर्शक वाक्य को उपदेश कहते हैं, जैसे श्री शबरस्वामी ने “श्येनेन अभिचरन् यजेत”— इस वाक्य के विषय में कहा है— “नैव श्येनादयः कर्त्तव्या विज्ञायन्ते, यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपाय इति हि तेषामुपदेशः” (शाबर पृ. १९) । महर्षि जैमिनि भी कहते हैं – “तस्य ज्ञानमुपदेशः” (जै. सू. १।१।५) । यहाँ 'तस्य ज्ञानमुपदेशः' का अर्थ है—धर्मस्य ( ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञापकं ) प्रमाणमुपदेशः ।
वह धर्म-चोदना [ “अग्निहोत्रं जुहुयात्”—इत्यादि वाक्यावली ] अपने साध्यभूत पुरुष-व्यापारात्मक आर्थीभावना और आर्थीभावना के विषयीभूत यागादि में पुरुष को नियुक्त करती हुई यागादि कर्म का ज्ञान कराती है, क्योंकि वह (यागादि कर्म) आर्थी भावना का विषय होता है। आर्थी भावना को नैयायिकों की भाषा में आत्मा का प्रयत्न (कृतिसंज्ञक गुण) कहा जाता है। जैसे ज्ञान का निरूपण विषय के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्न-रूप भावना का विषय के बिना निरूपण नहीं हो सकता, अत एव यागादि को भावना का विषय (नियत सम्बन्धी) माना जाता है, जो बन्धनार्थक 'षिञ्' धातु से निष्पन्न हुआ है, यह विगत पृ. ७ पर कहा जा चुका है । “यजेत स्वर्गकामः” इत्यादि चोदना (विधि) वाक्यों का प्रतिपाद्य है— आर्थी भावना, भावना का विषय है—याग, अतः याग में स्वर्गादिरूप इष्ट पदार्थ की साधनता का बोध कराता हुआ उक्त चोदना वाक्य यागानुष्ठान की इच्छा उत्पन्न कर देता है, उस इच्छा से यागादि के सम्पादन में पुरुष की प्रवृत्ति स्वतः हो जाती है [चोदना वाक्य केवल विषय वस्तु का अवबोध ही नहीं कराता, अपितु बोध्यमान पदार्थ में इष्ट-साधनता बताकर प्रवृत्त कर देता है, अत एव चोदना वाक्य को प्रवर्त्तक वाक्य भी कहा जाता है ] । “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—इत्यादि ब्रह्म-प्रतिपादक वाक्य केवल अज्ञात ब्रह्म का ज्ञानमात्र कराते हैं, विषय वस्तु के सम्पादन में प्रवृत्त नहीं करते, क्योंकि जो किसी प्रकार की प्रवृत्ति का जनक नहीं होता, ऐसा ही ब्रह्मावबोध केवल वेदान्त वाक्यों से उत्पन्न होता है।
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