भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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८० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १

जिज्ञास्ययोः फलजिज्ञास्यभेदाच्च । अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, तच्चानुष्ठानापेक्षम् । निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मविज्ञानं, न चानुष्ठानान्तरापेक्षम् । भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति, पुरुषव्यापारतन्त्रत्वात् । इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् । चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये

भामती

क्रमो विवक्षितस्तयेहाप्येकजिज्ञास्यतया धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः क्रमो विवक्ष्येत, न चैतदुभयमप्यस्तीत्याह ॐ फलजिज्ञास्यभेदाच्च ॐ । फलभेदं विभज्यते ॐ अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम् इति ॐ । जिज्ञासाया वस्तुतो ज्ञानतन्त्रत्वाज्ज्ञानफलं जिज्ञासाफलमिति भावः । न केवलं स्वरूपतः फलभेदः, तदुत्पादनप्रकारभेदादपि तद्भेदे इत्याह ॐ तच्चानुष्ठानापेक्षं ब्रह्मज्ञानं च नानुष्ठानान्तरापेक्षम् ॐ । शाब्दज्ञानाभ्यासान्नानुष्ठानान्तरमपेक्षते, नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानसहभावस्यापास्तत्वादिति भावः ।

जिज्ञास्यभेदमात्यन्तिकमाह ॐ भव्यश्च धर्म इति ॐ । भविता भव्यः, कर्तरि कृत्यः । भविता च भावकव्यापारनिर्वर्त्यतया तत्तन्त्र इति ततः प्राग् ज्ञानकाले नास्तीत्यर्थः । भूतं सत्यं, सदेकान्ततो न कदा चिदसन्नित्यर्थः । न केवलं स्वरूपतो जिज्ञास्ययोर्भेदो ज्ञापकप्रमाणप्रवृत्तिभेदादपि भेद इत्याह ॐ चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च ॐ । चोदनेति वैदिकं शब्दमाह, विशेषेण सामान्यस्य लक्षणात् । प्रवृत्तिभेदं

भामती-व्याख्या

विचारणीय एक ब्रह्मतत्त्व को लेकर चारों अध्यायों का क्रम माना जाता है, वैसे ही प्रकृत में धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का क्रम माना जा सकता था। इन (एकफलोद्देश्यत्व और जिज्ञास्याभेद) दोनों का अभाव दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं—"फलजिज्ञास्यभेदाच्च ।" फलभेद का स्पष्टीकरण किया जाता है—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानम् । जिज्ञासा ज्ञान का अङ्ग होने के कारण ज्ञान के फल को ही जिज्ञासा का फल कह दिया गया है। स्वर्ग आदि अभ्युदय और मोक्षरूप फल का स्वरूपतः ही भेद नहीं अपितु उनके उत्पादन क्रम में भी स्पष्ट भेद होता है—तच्चानुष्ठानापेक्षम् । अर्थात् केवल धर्मज्ञान से स्वर्ग आदि फल की निष्पत्ति नहीं होती अपितु वेदार्थज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान अपेक्षित होता है, किन्तु ब्रह्मज्ञान के अनन्तर किसी प्रकार के कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं होती। शाब्दज्ञानाभ्यास को छोड़कर नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मानुष्ठान का सहभाव निराकृत हो चुका है। जिज्ञास्य-भेद प्रकट किया जाता है—भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति । 'भव्यः' इस पद में 'कृत्य' प्रत्यय का अर्थ कर्त्ता है। भावक के व्यापार से जनित होने के कारण ज्ञानकाल में उसकी सत्ता नहीं मानी जा सकती। प्रकृत में जिज्ञास्य है—"इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् ।" 'भूतम्' पद का अर्थ है—सत्यम् । सत्य कभी असत् नहीं हो सकता कि उसे सत् बनाने में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती। दोनों जिज्ञास्य पदार्थों का स्वरूपतः ही भेद नहीं, अपितु ज्ञापक (प्रमाणादि) का भेद भी है—चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । 'चोदना' पद के द्वारा सामान्य वैदिकशब्दों का ग्रहण किया गया है। चोदना, विधि या प्रवर्तक शब्द वैदिक शब्दों के एकदेशभूत हैं। अतः चोदना पद की लक्षणा समस्त वैदिकशब्दराशि में की गई है। [ "चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टमित्येवं जातीयकमर्थं शक्नोत्यव गमयितुम्" (शा० भा० पृ० १३) इस भाष्य की व्याख्या करते हुए श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है— "चोदनेत्यब्रवीच्चात्र शब्दमात्रविवक्षया । न हि भूतादिविषयः कश्चिदस्ति विधायकः ॥" (श्लो० वा० पृ० ४७)] प्रवृत्ति-भेद दिखाया जाता है—"या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये नियुञ्जानैव