भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७९

भामती

❁ अधिकृताधिकारे च प्रमाणाभावाद् ❁ — इति योजना। स्वर्गकामस्य हि दर्शपूर्णमासाधिकृतरूप पशु-कामस्य सतो दर्शपूर्णमासक्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रिते गोदोहनेऽधिकारः। नो खलु गोदोहनद्रव्यमव्याप्रियमाणं साक्षात् पशून् भावयितुमर्हति। न च व्यापारान्तराविष्टं श्रूयते यतस्तदङ्गक्रममतिपतेत्। अप्रणयनाश्रितं तु प्रतीयते "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य" इति समभिव्याहारात्, योग्यत्वाच्चास्यापां प्रणयनं प्रति। तस्मात् क्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रितत्वाद् गोदोहनस्य तत्क्रमेण पुरुषार्थमपि गोदोहनं क्रमवदिति सिद्धम्। श्रुतिनिराकरणेनेवेष्टिसोमक्रमवदपि क्रमोऽप्यपास्तो वेदितव्यः।

शेषशेषित्वाधिकृताधिकाराभावेऽपि क्रमो विवक्ष्येत, यद्येकफलावच्छेदो भवेत्, यथाग्नेयादीनां षण्णामेकस्वर्गफलावच्छिन्नानां, यदि वा जिज्ञास्यब्रह्मांगोंऽशो धर्मः स्यात्, यथा चतुलंक्षणीव्युत्पाद्यं ब्रह्म केनचित्केनचिदंशेनेकेन लक्षणेन व्युत्पाद्यते तत्र चतुर्णां लक्षणानां जिज्ञास्याभेदेन परस्परसम्बन्धे सति


भामती-व्याख्या

का क्रम स्थिर हो सकता है [ सोमयाग का अनुष्ठान दो प्रकार से होता है—(१) अग्न्याधान करने के अनन्तर अथवा (२) अग्न्याधान करके दर्शपूर्णमास याग का अनुष्ठान कर लेने के पश्चात्। द्वितीय कल्प में दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम विवक्षित है। सोमयाग और दर्शपूर्णमास—दोनों स्वतन्त्र कर्म हैं, उनमें किसी प्रकार का अङ्गाङ्गिभाव नहीं होता, फिर भी आनन्तर्य काल का विधान माना गया है— "उत्पत्तिकालविशये कालः स्याद्, वाक्यस्य तत्प्रधानत्वात्" (जै० सू० ४।३।३७) ]।

समाधान— उक्त आशङ्का का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "अधिकृता-धिकारे वा प्रमाणाभावात्"। स्वर्गफलक दर्शपूर्णमास कर्म का जो अधिकारी पुरुष है, उसी का गोदोहन में जल-प्रणयन का अधिकार है, अन्य का नहीं। अर्थात् "गोदोहनेन पशुकामस्य"— यहाँ पर तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा जो गोदोहन पात्र में पशुरूप फल की करणता प्रतिपादित है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि गोदोहन पात्ररूप द्रव्य किसी व्यापार से युक्त नहीं हो जाता, उद्यमन-निपातनादि व्यापार से युक्त कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः प्रकृत में जल-प्रणयनरूप व्यापार से युक्त गोदोहन में फल-साधनता बन सकेगी। "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य"— ऐसा समभिव्याहार जलप्रणयनरूप व्यापार का ही समर्पण करता है और गोदोहन-व्यापार में उस जलप्रणयन की योग्यता निहित होती है। अतः क्रत्वङ्गभूत जलप्रणयन का आश्रयी होने के कारण गोदोहन पात्र का भी वही क्रम माना जाता है जो दर्शपूर्णमासगत जल-प्रणयन का है। इसी प्रकार सोम का अधिकारी व्यक्ति ही दर्शपूर्णमास का अनुष्ठान करता है। इस प्रकार कथित दोनों उदाहरणों में अधिकृताधिकार समानरूप से होने के कारण उनमें आनन्तर्य का नियम सम्भव हो जाता है। किन्तु प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्मजिज्ञासा में किसी प्रकार का अधिकृताधिकार नहीं, प्रत्युत दोनों जिज्ञासाओं के अधिकारी पुरुष अत्यन्त भिन्न होते हैं। अधिकृताधिकारभाव न होने के कारण धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का पौर्वापर्यभाव सम्भव नहीं। 'दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा'— यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा पौर्वापर्यभाव जैसा प्रतीत होता है वैसा धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का कोई श्रौतक्रम सम्भव नहीं है।

शेषशेषिभाव या अधिकृताधिकारभाव न होने पर भी क्रम माना जाता है जैसे दर्श-पूर्णमासगत आग्नेय आदि छः कर्मों का, क्योंकि वे सभी एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं। अथवा धर्म जिज्ञास्यभूत ब्रह्म का यदि अंश होता तब भी धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का वैसे ही क्रम विवक्षित हो सकता था, जैसे कि ब्रह्मसूत्र के चार अध्यायों का